भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 537, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 537

क्री०ख०-अ०१०९ ] * मयूरेशके विवाहके लिये कन्याका अन्वेषण * ५३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] पश्चात् आये हैं, अतः एक दिन आप यहाँ ठहरनेकी कृपा करें। हे अनघ ! हे विप्र ! आप चूँकि तीनों लोकोंमें भ्रमण करते रहते हैं, अतः अति सुन्दर शरीरवाले मेरे पुत्र मयूरेशके लिये किसी वधूकी खोज करें॥ ६-७॥ **ब्रह्माजी बोले—**उसी प्रकार माता पार्वतीने भी उनसे कहा—आप शीघ्र ही वधूके विषयमें विचार कीजिये॥ ७१/२ ॥ **नारद बोले—**हे स्वामिन्! मैं अपने कर्मके प्रति- फलस्वरूप अर्थात् दक्षशापके कारण कहीं भी एक स्थानपर दो मुहूर्तसे अधिक समयतक नहीं ठहर सकता हूँ। हे शिव! आपका यह कार्य सम्पन्न करनेके लिये ही ब्रह्माजीद्वारा प्रेषित होनेपर मैं यहाँ आया हूँ॥ ८१/२ ॥ आपके पुत्रके प्रभाव, लावण्य एवं अवस्थाको जानकर विधाता ब्रह्माजीने सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो कन्याओंको उन्हें प्रदान करनेकी अभिलाषा की है। उन दोनों कन्याओंके रूप-सौन्दर्यके सामने अनसूया तथा इन्द्रपत्नी शची भी लज्जित हो उठती हैं। उन दोनोंको देखकर सूर्यपत्नी संज्ञाने लज्जावश बड़वा (घोड़ी)-का रूप धारण कर लिया और वनमें गौतमपत्नी अहल्या शिलारूप हो गयी थी। हे हर! भगवान् विष्णुके मनको मोहित करनेवाली जालन्धरकी पत्नी वृन्दा भी जिन दोनोंको देखकर लज्जासे तुलसीवृक्ष हो गयी थी। हे पार्वती! [ऐसी उन कन्याओंके लिये] इन (मयूरेश)- के अतिरिक्त दूसरे वरोंकी बात ब्रह्माजीके हृदयमें उस समय नहीं आ सकी॥ ९-१२॥ हे देवि! इन दोनों (सिद्धि-बुद्धि एवं मयूरेश)-के समान सौन्दर्य एवं शौर्य अन्य किसी स्त्री-पुरुषमें नहीं है। उन दोनों सिद्धि एवं बुद्धिका संयोग होनेपर आपके पुत्र उसी प्रकार अत्यन्त शोभाको प्राप्त होंगे, जैसे कि रत्न एवं कांचनका संयोग होता है और जैसे मोती तथा मूँगेका संयोग अत्यन्त शोभासम्पन्न होता है॥ १३१/२ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**देवर्षि नारदजीके इस प्रकार कहनेपर वे भगवान् शिव एवं पार्वती अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ १४॥ **शिव बोले—**हे मुने! आपने हमारी मनोभिलाषाको पूर्ण करनेवाले शुभ और उचित वचन कहे हैं॥ १४१/२ ॥


[दायाँ स्तम्भ] **ब्रह्माजी बोले—**इसके अनन्तर भगवान् शिव भी तत्क्षण ही वृषपर आरूढ़ हुए और उन्होंने अर्धांगमें पार्वतीको बैठा लिया, तदनन्तर उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं तथा गौतम आदि मुनियोंको बुलाया और फिर वे सबके साथ बड़े हर्षित होते हुए निकल पड़े॥ १५-१६॥ देव मयूरेश अपने वाहन मयूरपर आरूढ़ होकर आगे-आगे चलने लगे। देवर्षि नारद अपनी तपस्याके प्रभावसे अन्तरिक्षमें होते हुए गये। सात करोड़ गण, जो नाना प्रकारके आयुधोंको धारण किये हुए थे, वे क्रीड़ा करते हुए तथा हर्षित होनेसे दसों दिशाओंको गुंजायमान करते हुए चल रहे थे॥ १७-१८॥ उस समय सभी प्रकारके वाद्य बज रहे थे। उन सबके चलनेसे उठनेवाली धूलिसे सूर्यमण्डल आच्छादित हो गया था। [उस विवाहयात्रामें] अट्ठासी हजार मुनिगण भी हर्षपूर्वक साथमें गये। जब वे सब गण्डकी नगरको जा रहे थे, तो उन्होंने मार्गमें सात करोड़ गणोंसे समन्वित राक्षसोंके सैन्यदलको देखा॥ १९-२०॥ उन राक्षसोंके मुख इतने विशाल थे कि वे आकाशको छू रहे थे। वे सभी सर्वदा कालको भी तिरस्कृत कर देनेवाले थे। जब उन निशाचरोंने मयूरेशकी सेनाके भयंकर शब्दको सुना तो वे सो करके उठे हुए निशाचर युद्ध करनेकी इच्छासे सन्नद्ध होकर निकल पड़े॥ २११/२ ॥ **राक्षस बोले—**तुम लोग किसके सैनिक हो, कहाँ जा रहे हो, तुम लोगोंका कहाँसे आगमन हुआ है? बिना अपने स्वामीकी आज्ञाके हम तुम लोगोंको नगरमें नहीं जाने देंगे॥ २२१/२ ॥ **मयूरेश बोले—**हम लोग स्वतन्त्र हैं, पराधीन नहीं हैं, दैत्यों तथा राक्षसोंका विनाश करनेवाले और सज्जनोंकी रक्षा एवं पालन करनेवाले हैं। अतः हम लोगोंको मार्ग दे दो, नहीं तो तुम लोगोंका नाश हो जायगा॥ २३१/२ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**उसी समय हेम नामक वह असुर वहाँ उपस्थित हुआ, जिसको पूर्वमें मयूरेशने नाक-कान आदि काटकर विकृत बना दिया था। वह असुर मयूरेशसे बोला—पहले तुमने मुझे अकेला पाकर [विकृत करके] वापस भेज दिया था, किंतु अब इस