श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 538, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 समय राक्षसोंके साथ मिलकर मैं तुम्हारे प्राण ले लूँगा। कोई मर सकता है? इस प्रकार उस समय उन बालकोंने फिर वह हेम नामक असुर राक्षसोंसे बोला-इस सभी राक्षसोंको मार डाला और मयूरेश! [आपकी जय मयूरेशने बलपूर्वक अनेक दैत्योंका वध किया है, इसने हो], मयूरेश! [आपकी जय हो]-ऐसा कहते हुए वे मेरे अंगोंको काटकर मुझे भी विकृत शरीरवाला बना गर्जना करने लगे। असुरोंपर विजय पाकर वे मयूरेशके दिया है। अतः इसे शीघ्र मार डालो ॥ २४-२६ ॥ पास गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने मयूरेशको प्रणाम किया ब्रह्माजी बोले-उसका वैसा वचन सुनकर मयूरेश्वर और उनसे कहने लगे- ॥ ३११/२ ॥ अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे और वे मुनिबालकोंसे कहने लगे- बालक बोले-हे गुणेश्वर! आपकी आज्ञा मेरी कृपाके बलसे तुमलोग इन असुरोंसे युद्ध करो ॥ २७ ॥ प्राप्तकर आपकी कृपासे हमने सभी राक्षसोंको मार तब कुशोंको हाथमें उठाकर वे मुनिबालक बड़े ही डाला है, अब आप हमें अन्य आज्ञा दें, हम उस हर्षसे युद्ध करनेके लिये उद्यत हो गये। पीछेसे देव कार्यको पूर्ण करेंगे। उस समय जो मुनि वहाँ आये मयूरेशने उनसे कहा-हे बालको! इन राक्षसोंका कुशोंके थे, वे सब यह देखकर परम आश्चर्यचकित हो गये द्वारा वध कर डालो ॥ २८ ॥ कि कुशसमूहोंके द्वारा इन बालकोंने सभी राक्षसोंको मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित किये गये उन कुशोंने मार डाला है। माता पार्वतीने वृषभसे उतरकर उन बहुतसे दैत्योंके मस्तकोंको काट डाला। मयूरेश्वरकी मयूरेशका आलिंगन किया ॥ ३२-३४ ॥ कृपासे उन राक्षसोंके शस्त्र कुण्ठित हो गये ॥ २९ ॥ भगवान् शिव भी कहने लगे-हे देव मयूरेश! मस्तक कटनेपर भी जो राक्षस पुनः उत्पन्न हो आज मैंने आपका पराक्रम देख लिया है। पहले तुमने जाते थे, उन राक्षसोंको वे मुनिपुत्र कुशोंसे पुनः मार इन दैत्योंको अपने शस्त्रोंसे मारा था। पुनः इन बालकोंने डालते थे। तब बाहु, जाँघ तथा घुटनोंसे रहित हुए वे उन्हें कुशोंसे मार डाला ॥ ३५ ॥ राक्षस खण्ड-खण्ड हो करके गिरने लगे ॥ ३० ॥ हे पार्वतीपुत्र मयूरेश! आपका प्रभाव ब्रह्मा आदि यह देखकर वे राक्षस अत्यन्त आश्चर्यचकित हो देवताओंके लिये भी अगम्य है, मैं भी यह ठीकसे नहीं उठे और यह कहने लगे कि क्या घासके तिनकोंसे भी जानता कि आप आगे क्या-क्या करनेवाले हैं? ॥ ३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सीमावर्ती चौकियोंमें नियुक्त राक्षसोंके वधका वर्णन' नामक एक सौ नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०९ ॥ एक सौ दसवाँ अध्याय सिन्धु दैत्यद्वारा गण्डकीनगरमें बन्दी बनाये गये देवताओंको मुक्त करनेके लिये मयूरेशका नन्दीश्वरको वहाँ प्रेषित करना ब्रह्माजी बोले-प्रसन्नतामें भरे हुए विजयी मयूरेश | मयूरेश अपने वाहन मयूरसे उतर पड़े और एक श्रेष्ठ सबसे आगे चल रहे थे और उनके पीछे वे मुनिबालक जा | आसनपर बैठ गये। तदनन्तर अन्य सभीको, भगवान् रहे थे, और फिर वृषभपर आसीन भगवान् शिव चल रहे | शिवको, उनके गणोंको तथा मुनीश्वरोंको बैठाकर वे थे। उनके पीछे गौतम आदि मुनिगण मयूरेशके विवाहके | मयूरेश उनसे कहने लगे, उस समय सभी प्रकारके वाद्य लग्नकी सिद्धि करनेके लिये जा रहे थे। अन्तमें [भगवान् | बज रहे थे ॥ ३-४ ॥ शिवके गण] गरजते हुए तथा दिशा-विदिशाओंको | दैत्य सिन्धुने अपने कारागारमें इन्द्र आदि सभी प्रतिध्वनित करते हुए चल रहे थे ॥ १-२ ॥ | देवताओंको बन्दी बनाकर रखा है। अतः बिना उन्हें गण्डकीनगर जब एक योजन दूर रह गया था, तब | वहाँसे छुड़ाये विवाहकार्य सम्पन्न नहीं हो सकता है ॥ ५ ॥