भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 543, कुल 656 में से

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पृष्ठ 543

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पूर्ण एवं सटीक देवनागरी पाठ्यान्तरण (transcription) दिया गया है:

क्री०ख०-अ०११२ ] * मयूरेशका गणोंकी सेनाके साथ सिन्धुदैत्यपर आक्रमण करनेहेतु प्रस्थान * ५४१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 आगे-आगे चलने लगे। वे सभी गण बलरूपी लक्ष्मीसे सम्पन्न, देदीप्यमान, वीर और मदोन्मत्त थे ॥ ७-८ ॥ वे सभी दिशाओंके अन्ततक सर्वत्र सबको आक्रान्त करते हुए, मेघके समान अत्यन्त गम्भीर गर्जना करते हुए तथा अपने भारसे धरतीको धारण करनेवाले शेषनागके फणोंको तथा पृथ्वीको भी झुकाते हुए जा रहे थे ॥ ९ ॥ क्रोधरूपी अग्निको उगलते हुए वे सभी वीर उस गण्डकीपुरीमें पहुँचे और दस करोड़ असुरोंसे समन्वित दैत्योंके गुल्म (सीमावर्ती चौकी)-पर टूट पड़े ॥ १० ॥ तदनन्तर दोनों पक्षोंमें अस्त्र-शस्त्रोंसे, बाणसमूहोंसे, भिन्दिपालोंसे तथा परशुओंसे परस्पर अत्यन्त रोमांचकारी भीषण युद्ध होने लगा। कुछ दैत्योंके मस्तक कट गये, किसीके पैर, किसीके हाथ, किसीकी ऊरु, किसीके घुटने, किसीकी जाँघें और किसीके टखने कट गये। कुछ वीरोंके प्राण निकल गये ॥ ११-१२ ॥ वे दैत्य युद्धभूमिमें गिरकर पुनः उठ पड़ते थे और अपनी सेनाके तथा शत्रुसेनाके वीरोंसे लड़ने लगते। इस प्रकार असंख्य दैत्य गिरकर मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ १३ ॥ कुछ दैत्य भागकर वहाँसे निकल गये और कुछ दैत्योंने वीर गणोंसे घिरे हुए तथा सभाके मध्यमें बैठे हुए दैत्य सिन्धुराजको वहाँका सम्पूर्ण समाचार बताया ॥ १४॥ शस्त्रोंके आघातसे रक्तको प्रवाहित करते हुए वे दैत्य फूले हुए पलाशके वृक्षके समान लग रहे थे। कुछ दैत्य वहाँ आकर मृत्युको प्राप्त हो गये और कुछ दैत्य धैर्य धारणकर दैत्यराज सिन्धुसे कहने लगे— ॥ १५ ॥ नगरके द्वारदेशमें स्थित सैन्यसमूहके जो दस करोड़ निशाचर थे, वे शत्रुओंसे युद्ध करनेके अनन्तर मृत्युको प्राप्त हो गये हैं। पर्वतोंके पंखोंका छेदन करनेवाले इन्द्रके साथ जब युद्ध हुआ था, तब तो हमारी विजय हुई थी, हे सिन्धुराज ! आप मौन धारणकर क्यों बैठे हुए हैं, आप अपनोंके हितका कार्य करें ॥ १६-१७ ॥ शत्रुओंके द्वारा नगरके उपवनों, भवनों तथा गलियोंको जला दिया गया है। उठी हुई धूलिराशिके द्वारा अन्धकार छा जानेपर लगी हुई आगके प्रकाशमें नगरनिवासी भाग रहे हैं। कुछ लोग भोजन करते-करते तथा कुछ सोये-सोये नगरसे बाहर निकल रहे हैं। कुछ लोग अपने बालकोंको लेकर भाग रहे हैं तथा कोई परोसा हुआ भोजन छोड़कर भाग रहे हैं ॥ १८-१९ ॥ हड़बड़ाहटमें दौड़ते हुए किसीके वस्त्र सरक रहे थे, कोई ध्यानमें निमग्न था तो कोई होम कर रहे थे। उस स्थितिमें भी वे विविध प्रकारके शस्त्रोंके प्रहारसे मारे जा रहे थे। सभी दिशाओंमें अग्निकी ज्वालाओंको देखकर पुरवासी भयसे अत्यन्त व्याकुल हो गये हैं, उनको यह लग रहा है कि प्रलय उपस्थित हो गया है और सम्पूर्ण नगरी दग्ध हो रही है ॥ २०-२१ ॥ ब्रह्माजी बोले—दूतोंके मुखसे इस प्रकारका समाचार सुनकर दैत्यराज सिन्धुने मुख खोलकर जँभाई ली, तब ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो बहुत बड़े पर्वतसे निकला हुआ सिंह मृगोंका भक्षण कर रहा हो और अपनी क्रोधरूपी अग्निसे उद्दीप्त होकर मानो तीनों लोकोंको निगल रहा हो ॥ २२१/२ ॥ तदनन्तर वह दैत्यराज सिन्धु उन दूतोंसे कहने लगा—यह जो दुर्गम सेना दिखलायी पड़ रही है, इसका क्या होगा ? सिंहके आगे भला खरगोशका पराक्रम क्या कर सकेगा ? सुमेरुपर्वतको पतिंगा अथवा सियार क्या हिला सकेगा ? मुझ कालरूपका वह छोटा-सा बालक मयूरेश क्या कर लेगा ? इस प्रकार कहनेके अनन्तर उसने अपनी सिंहगर्जनासे दसों दिशाओं तथा विदिशाओंको निनादित कर डाला ॥ २३-२५ ॥ फिर वह सिन्धुदैत्य क्षणभरके लिये मौन धारणकर वैसे ही स्थित हो गया, जैसे कोई मुनि मौन धारणकर स्थित हो जाते हैं। तदनन्तर वीरगण दैत्यराज सिन्धुसे क्रोधवश मूर्च्छित-से होकर कहने लगे। [हे राजन् !] आप हमें आज्ञा प्रदान कीजिये, हम क्षणभरमें उस मयूरेशपर विजय प्राप्त कर लेंगे। आपके प्रतापसे तो हम इस समय तीनों लोकोंको वशमें कर लेंगे ॥ २६-२७ ॥ सिन्धु बोला—हे महान् वीरो ! आप लोगोंने ठीक ही कहा। मेरा भी मन उस शत्रुको देखनेके लिये उत्कण्ठित हो रहा है। अतः आप लोग उसकी सेनाके साथ युद्ध करो ॥ २८ ॥