श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 542, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
व्यर्थ हो गयी हैं, जैसे दुष्टको दिया हुआ उपदेश व्यर्थ हो जाता है। यदि तुमने भगवान् शिव और मयूरेशकी निन्दा की, तो समझ लो कि आजसे ही तुम्हारी आयुके क्षीण होते जानेसे तुम युद्धमें विजय नहीं प्राप्त कर सकोगे। अरे मूर्ख दैत्य ! मैं तुम्हें अभी मार डालता, किंतु मेरे स्वामीकी इस प्रकारकी आज्ञा नहीं है। स्वामीको दूतका वध नहीं करना चाहिये और दूतको भी स्वामीका वध नहीं करना चाहिये ॥ ३१-३२१/२ ॥
इस प्रकार कहकर नन्दीश्वर अपनी निःश्वास वायुके द्वारा उन दैत्योंको गिराते हुए क्रुद्ध होकर बिना उस सिन्धुदैत्यसे पूछे ही हर्षित होते हुए वहाँसे निकल पड़े और वे शीघ्र ही मयूरेशके समीप आ गये ॥ ३३-३४ ॥
देव मयूरेश्वरने दूरसे ही नन्दीको देख लिया और वे कहने लगे, नन्दी आ गया है। तदनन्तर नन्दीने आकर उन मयूरेशको प्रणाम किया और आदिसे लेकर अन्ततक समाचार उन्हें बतलाया ॥ ३५ ॥
नन्दी बोले— मैंने बहुत प्रकारसे उस दैत्यको समझाया, किंतु उसने मेरी बात स्वीकार नहीं की, उसने बहुत प्रकारसे मेरी भर्त्सना की और मैंने भी उसे धिक्कारा; किंतु जिस प्रकारसे उलटे घड़ेमें जलकी बूँद नहीं अटकती, उसी प्रकार उस दैत्यके लिये सब कुछ समझाना व्यर्थ हो गया ॥ ३६१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले— इस प्रकारसे नन्दीश्वरकी बातें सुनकर और उनके वापस चले जानेपर उस दैत्यके मर्दनकी लालसासे मयूरेश अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। तब उन्होंने प्रमथ आदि गणोंको युद्धके लिये आज्ञा प्रदान की [और कहा-] सिन्धुदैत्यके बन्धनसे देवताओंको मुक्त करनेके लिये इस समय तुम सब उसके नगरमें युद्ध करनेके लिये अत्यन्त उत्सुक होकर भयंकर शब्दोंद्वारा गर्जना करो ॥ ३७-३९ ॥
सेनासहित उस सिन्धुदैत्यको मारकर सभी देवताओंको मुक्त करनेके लिये और अपने आश्रममें जानेके लिये त्वरा दिखानेवाले मुनियोंको भी [पौरोहित्य-सम्बन्धी दायित्वसे] मुक्त करनेके लिये तुम लोग युद्धके लिये जाओ ॥ ४० ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विचारवर्णन' नामक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १११ ॥
एक सौ बारहवाँ अध्याय मयूरेशका गणोंकी सेनाके साथ सिन्धुदैत्यपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान, गणोंद्वारा दैत्य सिन्धुकी सेनापर आक्रमण, पराजित हो सिन्धुसेनाका पलायन, क्रुद्ध दैत्य सिन्धुका स्वयं भी युद्धके लिये प्रस्थान
ब्रह्माजी बोले— दूसरे दिनकी बात है, मयूरेश अपने वाहन मोरपर आरूढ़ होकर अपने चारों करकमलोंमें चारों आयुधोंको धारणकर मेघके समान गम्भीर, भीषण गर्जना करने लगे और युद्ध करनेकी इच्छासे निकल पड़े। तभी भगवान् शिव भी वृषपर आरूढ़ होकर गर्जना करते हुए सहसा निकल गये ॥ १-२ ॥
उनके पीछे-पीछे सात करोड़ गण युद्धके लिये सुसज्जित होकर बड़े वेगसे चल पड़े। तब नन्दीश्वर बोले कि गणोंके नायक वीरभद्रके रहते हुए, मुझ नन्दीके होते हुए और देवशत्रु असुरोंका विनाश करनेमें समर्थ प्रमथगणोंके रहते हुए एकाएक आप लोगोंको उस सिन्धुदैत्यको मारनेके लिये वहाँ नहीं जाना चाहिये। एक दिन सेवकोंका पराक्रम देख लें, तदनन्तर ही युद्धके लिये जायँ ॥ ३-४ ॥
ब्रह्माजी बोले— नन्दीश्वरकी कही गयी इस प्रकारकी वाणी सुनकर देव मयूरेश्वर बड़ी ही प्रसन्नतासे कहने लगे— अच्छी बात कही है, बहुत अच्छी बात कही है। पहले अत्यन्त बलशाली दैत्य सिन्धुके बल- पराक्रमको परख लेना चाहिये ॥ ५-६ ॥
हे नन्दी ! मैं आगे-आगे चलता हूँ, आप सब लोग पीछे-पीछे मेरे साथ चलें। तदनन्तर भूतराज, अत्यन्त वीर्यशाली, पुष्पदन्त और कोटि-कोटि संख्यामें गण उन मयूरेश्वरके