श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 541, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०११९] * नन्दीश्वरका दैत्य सिन्धुकी सभामें प्रवेश * ५३९ स्वरूप ! आपकी बुद्धि तो पद्मयोनि ब्रह्माके समान प्रतीत होती है। हे वृषेश्वर ! आप किसके द्वारा प्रेषित हैं, कहाँसे आये हैं और आपके आगमनका क्या प्रयोजन है ? आप तेजमें अग्निसदृश हैं और पराक्रममें पंचानन शिवके समान प्रतीत होते हैं ॥ ११-१२ ॥ नन्दी बोले—आप मुझे सभी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाली गोमाता सुरभिका पुत्र समझें। मेरा नाम नन्दी है। मैं माता पार्वतीके स्वामी भगवान् शिवका वाहन हूँ और ब्रह्माण्डको भेद सकनेकी सामर्थ्य रखता हूँ। भगवान् शिवके भवनमें देव मयूरेशने अवतार ग्रहण किया है, वे पृथ्वीके भारका हरण करनेवाले और दुष्टोंका संहार करनेवाले हैं। वे बाल्यावस्थासे ही दैत्योंका वध करनेवाले हैं ॥ १३-१४ ॥ उन मयूरेशके पराक्रमका वर्णन करनेमें शेषनाग तथा कमलयोनि ब्रह्मा भी असमर्थ रहते हैं। समुद्र- मन्थनके द्वारा जिस प्रकारसे रत्नोंका समूह बाहर निकला, उसी प्रकार आज आप नीतिका मन्थन करके कार्यसिद्धिपर विचार करें। देव मयूरेशद्वारा आपके लिये प्रेषित अत्यन्त प्रबल आज्ञाका आप श्रवण करें ॥ १५-१६ ॥ जो कोई भी उनकी आज्ञाका उल्लंघन करता है, उसका निश्चित ही विनाश हो जाता है; क्योंकि वे ही इस चराचर जगत्की रचना करते हैं, इसका पालन करते हैं और इसका विनाश भी कर देते हैं ॥ १७ ॥ आपने बलपूर्वक अपने कारागारमें देवताओंको बन्दी बनाकर रखा है और उनके पदोंको स्वयं ग्रहण कर रखा है, इससे बड़े सौभाग्यकी बात और क्या हो सकती है। इस समय आप देवताओंसे वैर त्यागनेका विचार कर सकते हैं, अतः आप मेरे स्वामीकी आज्ञा मानकर सभी देवताओंको शीघ्र ही मुक्त कर दें ॥ १८-१९ ॥ त्रिपुरासुरने भगवान् शिवके साथ वैर किया था तो वह क्षणभरमें ही मारा गया। भगवान् विष्णुने स्तम्भसे प्रकट होकर हिरण्यकशिपुको मार डाला ॥ २० ॥ तारकासुरने देवताओंपर विजय प्राप्त की और उन सभी देवताओंके पदपर प्रतिष्ठित हो गया, किंतु कार्तिकेयने बलपूर्वक युद्धमें क्षणभरमें ही उसे मार डाला। अतः आप देवताओंको मुझे समर्पित करके सुखपूर्वक चिरकालतक अपने स्थानपर बने रहें ॥ २११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—नन्दीश्वरके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर दैत्यराज सिन्धु अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा। आँखें लालकर वह आँखोंसे अग्नि उगलता हुआ-सा बोल पड़ा ॥ २२१/२ ॥ सिन्धु बोला—हे वृषनन्दन ! मैंने तुम्हारी बहुत- सी चालाकी देख ली है, क्योंकि तुम प्रसंगानुकूल बात करना नहीं जानते हो, अज्ञानवश समयके अनुकूल बात न करनेवालेका वचन सर्वथा व्यर्थ हो जाता है, चाहे वह बृहस्पति ही क्यों न हो ॥ २३-२४ ॥ तुम-जैसे बालकके कहनेसे तथा तुम्हारे स्वामीके कथनानुसार मैं देवताओंको कैसे मुक्त कर सकता हूँ, जबतक कि वह भी जीत नहीं लिया जाता ॥ २५ ॥ वनमें विचरण करनेवाले तथा तृणका भक्षण करनेवाले तुम्हारे कथनका क्या प्रमाण ? तुम्हारा वह शिव कहाँ है और कहाँ उसका पुत्र है, तुम व्यर्थ ही मुझे भय दिखा रहे हो ॥ २६ ॥ यदि तुम दूत बनकर नहीं आये होते तो तुझ बैलको मैं आज ही हलमें जोत देता। हे वृष ! क्रोधके कारण यदि मेरी भृकुटियाँ टेढ़ी हो जायँगी तो तीनों लोक नष्ट हो जायँगे, फिर उन दोनों—शिव तथा मयूरेशकी क्या गणना है ! रुष्ट हुआ सियार भला सिंह अथवा हाथीका क्या बिगाड़ लेगा ? तुम उसकी कामना कर रहे हो, जो सम्भव ही नहीं है, अतः खिन्न होकर ही यहाँसे जा सकोगे ॥ २७-२८ ॥ ब्रह्माजी बोले—दैत्य सिन्धुके इस प्रकारके वचनरूपी बाणोंसे आविद्ध नन्दीश्वर क्रोध करते हुए बोले—॥ २८१/२ ॥ नन्दी बोले—अरे अधम दैत्य ! आज मैं तुम्हारी बुद्धि विपरीत ही देख रहा हूँ। तुम सन्निपात ज्वरसे व्याकुल हुए मरणासन्न व्यक्तिकी भाँति व्यर्थ ही बकवास कर रहे हो, 'पहले साम नीतिका प्रयोग करना' यह कह करके मेरे स्वामीने मुझे भेजा है ॥ २९-३० ॥ किंतु तुम्हारे सामने सामनीतिकी बातें उसी प्रकार