श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 540, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- नन्दी बोले—संसारमें जिसपर भी आपका अनुग्रह होता है, वह महान् हो जाता है। आपने मुझे श्रेष्ठ बनाया है, अतः मैं आपके प्रयोजनको सिद्ध करूँगा॥ २७॥ आपके अनुग्रहसे मैं सम्पूर्ण पृथ्वीको भी शीघ्र ही उलट दूँगा। शेषनाग तथा सूर्यको भी आपके पास ले आऊँगा, इसमें संशय नहीं है॥ २८॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार कहनेके अनन्तर नन्दीश्वर सेना लेकर दैत्य सिन्धुके समीप गये। धैर्य धारणकर वे नन्दी मनके समान तीव्र गतिसे सिन्धुके नगरके द्वारके पास पहुँचे॥ २९॥ उस समय उन्होंने गणेश, भगवान् शिव तथा सम्पूर्ण प्रयोजनोंको सफल बनानेवाली देवी पार्वतीका ध्यान किया, फिर वे अपनी प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेके लिये पार्वतीजीसे मन-ही-मन प्रार्थना करने लगे॥ ३०॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'नन्दीश्वरके दौत्यके प्रस्तावका वर्णन' नामक एक सौ दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ११०॥ एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय नन्दीश्वरका दैत्य सिन्धुकी सभामें प्रवेश करके मयूरेशका सन्देश सुनाना, किंतु दैत्य सिन्धुके द्वारा देवताओंको मुक्त करनेसे मना कर देना, नन्दीश्वरका वापस लौटकर मयूरेशको सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाना, मयूरेशद्वारा गणोंको युद्धकी आज्ञा देना ब्रह्माजी बोले—नन्दीश्वर द्वारपालद्वारा बताये जानेपर उस सिन्धुदैत्यकी अत्यन्त रमणीय सभामें गये, वहाँ सभामें विराजमान उस सिन्धु दैत्यको देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १॥ वह सिन्धुदैत्य अनेकों प्रकारके अस्त्र तथा शस्त्र हाथमें लिये हुए महान् वीरोंसे घिरा हुआ था। वह वारांगनाओंका नृत्य देखनेमें तल्लीन था। मनुष्य लोग हाथमें पंखा लेकर प्रसन्नतापूर्वक उसे झल रहे थे॥ २॥ उस समय वहाँ सभी प्रकारके बाजे बज रहे थे, जिनके नादसे सभी दिशाएँ निनादित हो रही थीं। उस सभामें उपस्थित कुछ दैत्योंने उन नन्दीश्वरको देखकर यह समझा कि साक्षात् सूर्य आये हुए हैं॥ ३॥ उन विशाल शरीरवाले तथा महान् वीरको देखकर कुछ दैत्य भयसे काँप उठे। कुछ अन्य दैत्य उन्हें डरानेके लिये बलपूर्वक भयंकर गर्जना करने लगे॥ ४॥ अपने पराक्रमके कारण निडर बने हुए नन्दीश्वर महान् धैर्यशाली होनेसे बिलकुल भी भयभीत नहीं हुए। उस दैत्य सिन्धुके द्वारा हाथसे संकेत किये गये एक उत्तम आसनपर नन्दी विराजमान हुए॥ ५॥ उन नन्दीको देखकर सभी दैत्य उसी प्रकार निष्क्रिय हो गये, जैसे कि चित्रमें अंकित पुत्तल आदिका दृश्य निष्क्रिय होता है। दैत्य सिन्धुका संकेत पाकर दूसरे बृहस्पतिके समान नन्दीश्वर कहने लगे—॥ ६॥ मैंने इससे पूर्वमें अनेकों सभाएँ देखी हैं, किंतु उनमें इस प्रकारके मूढ़जन मैंने कहीं नहीं देखे हैं। आप सभी लोग अत्यन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं और श्रीसे परम सुशोभित हैं॥ ७॥ आप सभी देखनेमें कामदेवके समान सुन्दर हैं, किंतु बुद्धिसे वैसे ही प्रतीत होते हैं, जैसे वृक होते हैं। क्योंकि सभामें जो कोई भी आये, चाहे वह साधु हो या असाधु, दुर्बल हो अथवा बलवान्; वह सम्माननीय होता है, उससे कुशल-क्षेम पूछना चाहिये—यही सनातन नीति है। मैंने ये सब बातें इस सभामें नहीं देखी हैं, इसलिये मेरे मनमें बड़ा आश्चर्य है॥ ८-९॥ ऐसी सभाके सभी सभासद् व्यर्थ हैं, सभी मन्त्रिगण व्यर्थ हैं और सभी उपस्थित नागरिकजन व्यर्थ हैं। यह न केवल राजाका धर्म है, अपितु राजसभामें उपस्थित सम्भ्रान्तजनोंका भी कर्तव्य है॥ १०॥ ब्रह्माजी बोले—नन्दीश्वरके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर दैत्यराज सिन्धु उनसे बोला—हे गुणोंके आकर