श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 544, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तदनन्तर वे श्रेष्ठ वीर दैत्य गर्जना करते हुए आगे | रणोन्मत्त दैत्यराज सिन्धु अपने मुख तथा आँखोंसे बढ़े। वे संख्यामें असंख्य थे, सभी वीर शस्त्रोंको धारण | क्रोधरूपी अग्निकी वर्षा करता हुआ मनकी गतिके किये हुए थे और वह सेना चतुरंगिणी थी ॥ २९ ॥ | समान वेगवाले अश्वपर सवार होकर युद्ध करनेके लिये क्रोध तथा हर्ष—दोनों भावोंसे समन्वित वह | रणभूमिमें गया ॥ ३० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'युद्धके लिये सिन्धुके प्रस्थानका वर्णन' नामक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११२ ॥
एक सौ तेरहवाँ अध्याय युद्धके लिये दैत्यराज सिन्धुकी चतुरंगिणी सेनाका प्रस्थान, मयूरेशकी सेना और दैत्यसेनाका भीषण संग्राम, सिन्धुसेनाके दो अमात्य वीर—मैत्र और कौस्तुभका वीरभद्र एवं कार्तिकेयसे युद्ध तथा दोनों अमात्य वीरोंके वधका वर्णन ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] सबसे आगे | निनादित कर दे रहे थे ॥ ६ ॥ पैदल सैनिक चल रहे थे, वे धरतीको कम्पित करते हुए | वे घोड़े स्वर्ण, अनेक प्रकारके रत्नों तथा मोतियोंकी जा रहे थे। उनके मुख बड़े ही भयंकर थे। वे सभी बड़े | मालाओंसे सुशोभित थे, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो ही पराक्रमी थे और उनके मस्तक सिन्दूरके समान अरुण | वे आकाशमें विचरण कर रहे हों। उन अश्वोंके ऊपर वर्णके थे। कुछ सैनिक कवच बाँधे हुए थे, उनके केश | महान् वीर योद्धा विराजमान थे, जो कवच धारण करनेसे खुले हुए थे। वे अत्यन्त भीषण लग रहे थे। किन्हीं- | सुशोभित हो रहे थे, उन्होंने विविध प्रकारके शस्त्र धारण किन्हीं वीरोंने अपनी कमर बाँध रखी थी, और कुछ | कर रखे थे और वे महायोद्धा शत्रुसेनाका मर्दन वीरोंने चन्दनका अनुलेपन किया हुआ था ॥ १-२ ॥ | करनेवाले थे ॥ ७ १/२ ॥ वे विविध प्रकारके शस्त्रोंको धारण किये हुए थे | घुड़सवार सेनाके पीछे रधारोही वीर सैनिक चल और अनेक प्रकारकी युद्धकलामें पारंगत थे। उन पैदल | रहे थे, जो अपने शस्त्रों तथा अस्त्रोंके द्वारा शत्रुओंका सैनिकोंके आगे [सिन्दूरादिसे अनुलिप्त] मतवाले हाथी | विनाश कर देनेवाले थे। वे रधारोही वीर युद्धमें युद्धके चल रहे थे, जो ऐसे प्रतीत हो रहे थे, मानो नाना | मार्गका समुचित ज्ञान रखनेवाले श्रेष्ठ सारथियोंसे समन्वित प्रकारकी धातुओंसे चित्रित किये गये पर्वत हों ॥ ३ ॥ | थे और मोतियों तथा मणियोंकी एवं सुगन्धित पुष्पोंवाली उनके लम्बे-लम्बे दाँत सुशोभित हो रहे थे, वे | मालाओंको धारण किये हुए थे ॥ ८-९ ॥ अनेक प्रकारके आभूषणोंसे सुसज्जित थे, वे हाथी अपने | उनके कन्धोंपर धनुष लटक रहा था। वे तूणीर भी घण्टानादके द्वारा सभी जनोंको तत्काल ही बधिर बना | धारण किये हुए थे। उनके हाथोंमें खड्ग तथा भाले थे, दे रहे थे। वे अपनी सूँड़के प्रहारसे पर्वतों तथा वृक्षोंको | वे उस महायुद्धमें अपने शस्त्रोंसे निकलनेवाली आभाके चूर-चूर बनाते हुए चल रहे थे। उन हाथियोंके मस्तक | द्वारा लोगोंके नेत्रोंको आच्छादित कर दे रहे थे, जो कि अनेक प्रकारकी पताकाओं तथा चित्र-विचित्र ध्वजोंसे | सूर्यके तेजसे मिलकर दोगुनी अधिक देदीप्यमान हो रही सुशोभित हो रहे थे ॥ ४-५ ॥ | थी। उस समय तूर्यघोष हो रहा था और बन्दीजन उन हाथियोंके पीछे घोड़े चल रहे थे, जो अपने | दैत्यपति सिन्धुका स्तवन करते हुए कह रहे थे कि हे खुरोंके आघातसे पृथिवीको चूर्ण-चूर्ण कर दे रहे थे। वे | सिन्धु ! आपके अतिरिक्त तीनों लोकोंमें कोई दूसरा अपने हिनहिनानेके नादसे आकाश तथा दसों दिशाओंको | बलिष्ठ वीर नहीं है। आपकी सम्पत्तिसे धनद कुबेरकी