श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 545, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०११३] * युद्धके लिये दैत्यराज सिन्धुकी चतुरंगिणी सेनाका प्रस्थान * ५४३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] भी सम्पत्ति समता नहीं कर सकती ॥ १०-१२ ॥ इस प्रकारसे वह सेना दसों दिशाओंको अपनी गूँजसे निनादित करती हुई आ रही थी। तब भूतराज तथा पुष्पदन्तने उस आती हुई सेनाको देखा तो भयभीत होकर भाग पड़े और मयूरेशके पास आये ॥ १३१/२ ॥ वे दोनों बोले-आपकी आज्ञासे हमने आगे जाकर सिन्धुदैत्यके नगरके द्वारपर बनी चौकीमें स्थित सेनाका संहार कर डाला और उस दैत्य सिन्धुके गण्डकी नामक नगरको भी बहुत प्रकारसे दग्ध कर दिया। तब हम दोनोंके पराक्रमको सुनकर वह दैत्यराज सिन्धु स्वयं चला आया है। उसके साथमें नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंसे सुसज्जित चतुरंगिणी सेना है। हे महाबल ! उसे देखकर हम दोनों भयभीत होकर आपके पास चले आये हैं॥ १४-१६॥ ब्रह्माजी बोले-वे दोनों अर्थात् भूतराज तथा पुष्पदन्त—इस प्रकार कह ही रहे थे कि पूर्व दिशामें सिन्धुदैत्यकी समुद्रके समान [अपरिमित] सेना आती हुई दिखायी दी, जिसका पार पाना शस्त्र धारण करनेवाले योद्धाओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है ॥ १७॥ तदनन्तर संक्षेपमें उस दैत्य सिन्धुराजके वृत्तान्तको जानकर हर्षित हुए मयूरेश नीले कण्ठवाले अपने वाहन मयूरपर आरूढ़ होकर आगे बढ़े ॥ १८ ॥ उन्होंने अपने चारों हाथोंमें चार आयुधोंको धारण कर रखा था। अपने हाथोंमें धनुष, बाण तथा तलवार लिये हुए करोड़ों गण युद्धके लिये सुसज्जित होकर वृषभपर विराजमान नीलकण्ठ भगवान् शिवको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। मुनीश्वरोंने मयूरेशकी स्तुति की और आशीर्वचन प्रदान किये ॥ १९-२० ॥ उस समय सिन्धुदैत्यकी सेना तथा मयूरेशकी सेना-दोनों सेनाओंके वाद्योंकी ध्वनिसे महान् कोलाहल होने लगा। वे दोनों सेनाएँ एक-दूसरेकी उस सैन्यसम्पदाको देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो रही थीं ॥ २१ ॥ वे मयूरेश दैत्य सिन्धुकी असंख्य सेनाको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो गये। नन्दीश्वरने पूर्वमें जो उन्हें
[दायाँ स्तम्भ] बतलाया था, वह सब उन्होंने आज प्रत्यक्ष देख लिया। तदनन्तर नन्दीश्वर मयूरेशको प्रणाम करके बार-बार गर्जना करते हुए युद्ध करनेके लिये आकाशमार्गसे चल पड़े और दैत्यसेनामें आकर उन्होंने अनेक दैत्यवीरोंके मस्तकोंको काट डाला ॥ २२-२३ ॥ उन्होंने अपने सींगोंके महान् आघातसे दैत्यराज सिन्धुके अश्वपर दृढ़ प्रहार किया और बिना क्षत-विक्षत हुए शीघ्र ही उड़ करके मयूरेशके पास चले आये ॥ २४ ॥ उस समय सभी गण अत्यन्त आश्चर्य करने लगे और 'साधु-साधु'- इस प्रकार कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे। तदनन्तर नन्दीश्वरने अपने सींगोंके प्रहारसे दैत्य सिन्धुराजके छत्रको गिरा डाला ॥ २५ ॥ घोड़ेके तथा छत्रके गिर जानेपर वह दैत्यराज सिन्धु दूसरे घोड़ेपर सवार हो गया और उसने एक अत्यन्त मूल्यवान् दूसरा छत्र धारण कर लिया। नन्दीश्वरके पराक्रमको देखकर सिन्धुदैत्यको अत्यन्त आश्चर्य हुआ। उसने अपने महान् वीरोंपर क्रोध करते हुए कहा-तुम लोगोंका बल-पराक्रम कहाँ चला गया है ? ॥ २६-२७॥ सिन्धुराजके इस प्रकारके वचन सुनकर उस दैत्यके कौस्तुभ तथा मैत्र नामवाले दो अमात्य, जो शत्रुंकी सेनाको मार गिरानेवाले थे, वे दैत्य सिन्धुको प्रणाम करके बोले-हे नाथ ! हे सिन्धु ! आप चिन्ता न करें, हम दोनों शत्रुओंका विनाश कर डालेंगे, अगर ऐसा नहीं हुआ, तो हम किसी प्रकार भी अपना मुख नहीं दिखलायेंगे। ऐसा कह करके वे दोनों चतुरंगिणी सेनाको साथ लेकर चल पड़े। ब्रह्माण्डका विदीर्ण कर डालनेमें तत्पर पैदल सैनिकोंके समूह भी उनके साथमें निकले ॥ २८-३०॥ वे रणोन्मत्त सैनिक पृथ्वीको उलट डालनेकी इच्छा रखते थे। कौस्तुभ तथा मैत्र नामक दोनों अमात्य मयूरेशके पास उन्हें गिरा डालनेकी इच्छासे गये ॥ ३१ ॥ जबतक वे दोनों अमात्य अपने बाणोंकी वर्षासे मयूरेशको आच्छादितकर उनके पास पहुँचते, उससे पहले ही वीरभद्र तथा कार्तिकेय उनसे युद्ध करने वहाँ आ पहुँचे। वे दोनों असंख्य सेनाके साथ थे और दसों दिशाओंको