श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 546, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अपनी गर्जनासे निनादित कर रहे थे। वे दोनों महाबली वीर वीरभद्र और कार्तिकेय क्रुद्ध होकर [अनेक प्रकारके प्रहारोंसे] दैत्य सिन्धुकी सेनापर आघात करने लगे ॥ ३२-३३॥ कौस्तुभ तथा मैत्रका भी उन दोनोंके साथ युद्ध हुआ। दोनों पक्षोंके वीर परस्पर प्रहार कर रहे थे और 'सहो' 'मारो' इस प्रकारसे आपसमें कह रहे थे ॥ ३४॥ कौस्तुभ तथा मैत्रने अनेकों अस्त्रों तथा शस्त्रोंसे उन दोनों वीरभद्र और कार्तिकेयके साथ युद्ध किया। बाणसमूहोंसे, भिन्दिपालोंसे, परिघोंसे तथा मुसलोंसे दोनों पक्षोंके वीर एक-दूसरेका वध करनेकी इच्छासे युद्ध कर रहे थे। जब सभी शस्त्र टूट गये और बाण भी समाप्त हो गये तो दोनों सेनाओंके वीर आपसमें मल्लयुद्ध करने लगे और एक-दूसरेको मार डालनेतक युद्ध करते रहे। कुछ वीर प्राणोंसे रहित होनेपर भूमिपर गिर पड़े और अपने मुखसे बहुत-सा रक्त प्रवाहित करने लगे ॥ ३५-३७॥ कुछ वीर पैरसे दूसरे पक्षके वीरके पैरमें चोट पहुँचा रहे थे, तो दूसरे वीर कन्धेसे कन्धेपर वार कर रहे थे। कुछ पीठके बल पीठपर चोट पहुँचा रहे थे, तो कुछ वीर हाथसे हाथमें मार रहे थे। कुछ सैनिक अपने मस्तकसे दूसरे पक्षके सैनिकके मस्तकपर आघात कर रहे थे तो कुछ कुहनीके द्वारा कुहनीपर प्रहार कर रहे थे। कुछ वीर गिर गये थे, कुछ दूसरेके द्वारा गिराये जा रहे थे, कुछ मृत हो गये थे, कुछ अंग-भंग हो गये थे तो कुछ वीर चूर-चूर हो गये थे ॥ ३८-३९॥ किसीके कण्ठ कट गये थे, किसीकी भुजाएँ अलग हो गयी थीं और कुछ जंघा, ऊरु तथा बाहुओंसे रहित हो गये थे। इस प्रकारसे मयूरेशकी सेनाके विनष्ट हो जानेपर दैत्यराज सिन्धुकी सेना विजयी हो गयी ॥ ४० ॥ तब जय-जयकारके शब्दोंसे स्तुति किये जाते हुए और बन्दीजनोंद्वारा वाद्योंकी ध्वनि सुनाये जाते हुए मित्र [मैत्र] तथा कौस्तुभ नामक वे दोनों अमात्य दैत्येश्वर सिन्धुके पास आये ॥ ४१ ॥ इधर वीरभद्र तथा कार्तिकेय भी मयूरेशके पास चले आये। तदनन्तर सूर्यके अस्त हो जानेपर युद्ध- विराम हो गया ॥ ४२ ॥ दूसरे दिन दानवोंने देवताओंकी सेनाके साथ पुनः युद्ध किया। सिन्धुराजके वीर दैत्योंने अपने बाणोंकी वर्षासे भागती हुई उस देवसेनापर प्रहार किया ॥ ४३ ॥ तब वीरभद्र तथा कार्तिकेय पुनः युद्धके आवेशमें आ गये और गर्जना करते हुए [उस] गर्जनाके द्वारा दसों दिशाओं तथा आकाशको निनादित करने लगे। यमराजके समान वे उस शत्रुसेनाको मार रहे थे और सेनाको दग्ध कर रहे थे। उस समय महान् भयंकर अन्धकारके छा जानेपर कहीं भी कुछ भी ज्ञात नहीं हो रहा था ॥ ४४-४५॥ फलतः दोनों पक्षोंके वे महाबलवान् वीर अपने पक्षके तथा शत्रुसेनाके वीरोंको भी मार डाल रहे थे। तदनन्तर दैत्य सिन्धुकी सेनाके छिन्न-भिन्न हो जानेपर वीरभद्र तथा कार्तिकेयने विजयघोष किया ॥ ४६ ॥ तब दैत्य सिन्धुराजके वे दोनों अमात्य मैत्र और कौस्तुभ मरनेका निश्चय करके युद्ध करनेके लिये पुनः आ पहुँचे और उन्होंने अपने-अपने घोड़ोंको शत्रुसेनाके मध्य जानेके लिये प्रेरित किया ॥ ४७ ॥ वे दोनों बाणोंकी वर्षा करते हुए और तलवारके वारसे वीरोंको मारते हुए आगे बढ़ रहे थे। तदुपरान्त जब कार्तिकेय और वीरभद्रने शत्रुवीरोंका वैसा पराक्रम देखा, तो बहुत जोरोंसे उनपर मुष्टि-प्रहार करके शीघ्रतापूर्वक अपनी सेनामें आ गये। उस प्रहारके कारण मैत्र अपने मुखसे बहुत-सा रक्त बहाता हुआ भूमिपर गिर पड़ा ॥ ४८-४९॥ मैत्रकी वह स्थिति देखकर कौस्तुभ युद्ध करनेके लिये आगे आया और क्रोधित होकर उसने अपनी तलवारके वारसे कार्तिकेयपर प्रहार किया ॥ ५० ॥ उस प्रहारसे कार्तिकेय मूर्च्छित हो गये, तब वीरभद्रने कौस्तुभके साथ युद्ध किया। कौस्तुभने अत्यन्त रोषमें भरकर अनेक बाणोंसे वीरभद्रपर आघात किया ॥ ५१ ॥ तब वीरभद्रने भी अपनी मुष्टिकाके प्रहारसे उसे भूमिपर गिरा दिया। उस कौस्तुभके मर जानेपर महाबली वीरभद्र अत्यन्त आनन्दित हो उठे ॥ ५२ ॥ इस प्रकार मैत्र तथा कौस्तुभ-दोनों अमात्य