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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 547, कुल 656 में से

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पृष्ठ 547

क्री०ख०-अ०११४] * दैत्यराज सिन्धुकी सेनाका मयूरेशकी सेनाके साथ भीषण संग्राम * ५४५ वीरोंके मारे जानेपर दैत्योंकी वह सेना पलायन कर गयी। पास उस सम्पूर्ण समाचारको बतानेके लिये गये और उन शस्त्राघातसे आहत एवं बहुत-सारा रक्त वमन करनेवाले सैनिकोंने शस्त्रोंकी आघातजनित पीड़ासे अत्यन्त पीड़ित असुर सैनिक नित्य ही मैत्र तथा कौस्तुभकी विजयकी होनेके कारण अस्पष्ट वाणीमें वह सारा वृत्तान्त उसे अभिलाषा रखनेवाले, देवताओंके शत्रु दैत्यराज सिन्धुके बतलाया॥ ५३-५४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मैत्र एवं कौस्तुभके वधका वर्णन' नामक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११३ ॥

एक सौ चौदहवाँ अध्याय दैत्यराज सिन्धुकी सेनाका मयूरेशकी सेनाके साथ भीषण संग्राम और सिन्धुसेनाकी पराजय

वीर बोले—[हे स्वामिन्!] नाना प्रकारके शस्त्रोंसे युद्धकी इच्छासे निकल पड़ा। वीरभद्र और षडानन असंख्य युद्ध करनेमें कुशल वे दोनों मैत्र तथा कौस्तुभ नामक वीर सेना लेकर चल पड़े। वे दोनों विविध प्रकारके शस्त्रोंको अमात्य मृत्युको प्राप्त हो गये हैं। उन दोनोंने शत्रु की सेनाके धारण किये हुए थे और युद्ध करनेमें अत्यन्त बलवान् थे। असंख्य वीरोंको रात-दिन मारा। तदनन्तर शत्रुसेनामें से दो देवसेनाके सात व्यूहों (नन्दीश्वर, पुष्पदन्त, भूतराज, विकट, दुष्ट वीर आगे उपस्थित हुए, उन दो बलशाली वीरोंने हमारी चपल, वीरभद्र और षडाननकी सेना)-को देखकर सेनाको मार गिराया और मर्दित कर डाला॥ १-२॥ दैत्यसैनिकोंने अनेकों व्यूहोंकी रचना की॥ ८-१०॥ उन दोनों वीरोंके हाथोंके प्रहारसे वे दोनों—मैत्र दैत्यसेनाके व्यूहमें गन्धासुर, मदनकान्त, वीर, ध्वज, और कौस्तुभ यमलोकको प्राप्त हुए हैं। हम लोगोंने महाकाय, शार्दूल तथा सातवें धूर्त नामक योद्धाओंके सात अनेक प्रकारकी सेनाएँ देखी हैं, किंतु उन दोनोंके समान व्यूह थे। इन सात व्यूहोंको आगे करके दैत्यसेनाने आये देवता नहीं देखे हैं॥ ३॥ हुए उन देवताओंके व्यूहोंमें स्थित वीरोंके साथ युद्ध किया। सिन्धु बोला—अरे सैनिको! जिन दोनों मैत्र और उन्होंने बाणोंकी वर्षा करके उस देवसेनाको ढक दिया कौस्तुभको देखकर समस्त प्राणियोंके प्राणोंका हरण और भालोंके अग्रभागसे उन्हें बींध डाला॥ ११-१२॥ करनेवाले यमराज भी डरते हैं, बताओ तो सही, कि वे किन्हींपर भिन्दिपालोंसे आघात किया, जिससे वे दोनों हाथोंके आघातसे कैसे मृत्युको प्राप्त हुए? अब इस पृथ्वीपर गिर पड़े। महान् बली गन्धासुरने बलपूर्वक समय सभी सैनिक मेरे बल-पराक्रमको देख लें। मैं कार्तिकेयके साथ युद्ध किया॥ १३॥ युद्धभूमिमें शत्रुके सिरको नचा डालूँगा, इसमें संशय नहीं मदनकान्तने युद्धस्थलमें वीरभद्रके साथ युद्ध किया। है। चूँकि मैं चक्रपाणिका पुत्र हूँ, अतः मैं चक्रयुद्ध नन्दीश्वर और असुर वीरराज परस्पर युद्ध करने लगे॥ १४॥ करूँगा। ऐसा कहकर वह दुष्ट अश्वपर आरूढ़ होकर ध्वजासुर और पुष्पदन्तमें विविध प्रकारके अस्त्र- मयूरेशसे युद्ध करनेके लिये चल पड़ा॥ ४-६॥ शस्त्रों तथा बाणसमूहोंसे आपसमें युद्ध होने लगा। असंख्य करोड़ वीर दैत्य, जो बड़े ही अपराजेय इसी प्रकार भूतराज तथा महाकायने आपसमें युद्ध योद्धा थे और महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे, वे किया। धूर्त और विकटने आपसमें द्वन्द्वयुद्ध किया। भगवान् शिवके पुत्र देवराज मयूरेशसे युद्ध करनेकी चपल ने रोषमें भरकर शार्दूलको मारा, जिससे वह इच्छासे दैत्य सिन्धुके आगे-आगे चलने लगे॥ ७॥ भूमिपर गिर पड़ा॥ १५-१६॥ इधर अत्यन्त बलशाली नन्दीश्वर और पुष्पदन्त भी पुनः चैतन्यको प्राप्तकर उस शार्दूलने अपने खड्गसे युद्ध करनेके लिये गये। भूतराज और विकट दस लाख चपलपर प्रहार किया, जिस कारण वह चंचल चपल योद्धाओंके साथ गये। चपल पचास हजार सेना लेकर युद्धमें महान् मूर्च्छको प्राप्त हुआ॥ १७॥