श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 548, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 द्वन्द्वयुद्ध प्रारम्भ होनेपर दोनों देवसेना और असुरसेना | दिखायी नहीं दे रहा था ॥ २८ ॥ परस्पर युद्ध करने लगी। दोनों ओरके सैनिक शस्त्रोंके | तदनन्तर हे देवताओ ! 'हम दैत्यसेनाके सैनिक हैं, समूहों तथा बाणोंके जालसे परस्पर युद्ध करने लगे ॥ १८ ॥ | हमें मत मारो, हे असुरो ! हम देवसेनाके सैनिक हैं, हमें उस समय दोनों ओरके वीर युद्ध करते हुए एक- | मत मारो' इस प्रकार कोलाहल करते हुए दोनों सेनाके दूसरेसे कह रहे थे—'लो, मेरे प्रहारको सहन करो, मारो, | वीरोंमें परस्पर युद्ध होने लगा। युद्धभूमिमें विद्यमान डरो मत, अगर मर जाओगे तो स्वर्ग प्राप्त करोगे।' | हिंसक जन्तु, भूत, राक्षस, सियार, पतंग तथा श्येन आदि शस्त्रों तथा बाणोंके समाप्त हो जानेपर पुनः सभी | (मांसाहारी जीव) [सैनिकोंके मांस आदिके भोजनसे] सेनानी, पैरोंके प्रहार तथा मुष्टियोंसे युद्ध करने लगे और | तृप्त होकर पार्वतीपुत्र मयूरेशको अनेक आशीर्वाद देने एक-दूसरेको मारने लगे। कोई सैनिक शत्रुसैनिकके दोनों | लगे। इस प्रकारसे तीन दिन और तीन राततक लगातार पैरोंको पकड़कर उसे पटकने लगा ॥ १९-२० ॥ | वह भयंकर युद्ध होता रहा ॥ २९-३१ ॥ कोई उछलकर दूसरेपर गिरकर उसे चूर-चूर कर | दोनों सेनाएँ रात्रिके वाद्योंको बजाकर अपनी- दे रहा था। किसीने दूसरेका सिर काट लिया तो किसीने | अपनी विजयकी जयध्वनि करने लगीं। इस प्रकार युद्धमें शत्रुकी बाहें काट लीं। किसीने दूसरेके पैर तथा | गन्धासुरने सेनानी कार्तिकेयके साथ बहुत विस्तारसे युद्ध जानुओंको काट डाला, तो किसीने दूसरेके गुल्फोंको | किया। मद्यपानसे मतवाले हुए उस गन्धासुरने शस्त्रोंका काट दिया। कुछ दूसरे सैनिक आपसमें बाणोंकी वर्षा | परित्यागकर बड़े वेगसे अपनी मुष्टिकाके प्रहारसे सहसा करने लगे ॥ २१-२२ ॥ | उन कार्तिकेयपर आघात किया ॥ ३२-३३ ॥ शस्त्रोंसे आहत कोई वीर रक्त बहाते हुए भी मृत्यपर्यन्त | फलस्वरूप वे कार्तिकेय भूमिपर उसी प्रकार गिर पड़े, युद्ध करने लगा। सिर कटे हुए धड़ोंने भी युद्ध किया, वे | जैसे वज्रके प्रहारसे पर्वत गिर पड़ता है। तदनन्तर शीघ्र ही अपने पक्षके तथा शत्रुपक्षके वीरोंको मार डाल रहे थे। | चेतना प्राप्तकर कार्तिकेय उसी प्रकार दौड़ पड़े, मानो पंखोंसे कुछ दूसरे लोग वक्षःस्थल विदीर्ण हो जानेसे सहसा गिर | युक्त कोई पर्वत दौड़ रहा हो। उन्होंने अपने बारह हाथोंसे पड़ रहे थे और कुछ उस युद्धभूमिमें परस्परके आघातसे | छह श्रेष्ठ धनुषोंद्वारा बाणोंके अनेक समूहोंको छोड़ते हुए आहत होकर मृत्युको प्राप्त कर रहे थे ॥ २३-२४ ॥ | उस महान् असुर गन्धको बींध डाला ॥ ३४-३५ ॥ कुछ वीर स्वर्ग प्राप्तकर एक अप्सराकी प्राप्तिके | कार्तिकेयके द्वारा छोड़े गये उन बाणसमूहोंको लिये युद्ध कर रहे थे। वहाँपर रक्तकी नदी प्रवाहित हो | रोककर गन्धासुरने अत्यन्त वेगपूर्वक उन अनामय चली, जो वीरोंके केशरूपी सेवारसे समन्वित थी, | कार्तिकेयको अपने बाणोंद्वारा आच्छादित कर दिया ॥ ३६ ॥ खड्गरूपी मत्स्योंसे युक्त थी, ढालरूपी बड़े-बड़े कछुओंसे | कार्तिकेयने भी उन बाणोंको रोककर उस गन्धासुरका युक्त तथा कठिनतासे पार होनेवाली थी। वह नदी अत्यन्त | पैर पकड़कर अकस्मात् घुमा डाला और फिर जमीनपर भयावह थी, उसमें प्रेतरूपी काष्ठ प्रवाहित हो रहे थे और | पटक दिया। दृढ़ आघात लगनेके कारण उस गन्धासुरके वह चँवररूपी तृणोंसे समन्वित थी ॥ २५-२६ ॥ | प्राण निकल गये और उसके सौ टुकड़े हो गये। उस वह नदी वीरोंके कवचरूपी मगरमच्छोंसे अत्यन्त | गन्धासुरके मारे जानेपर उसकी सेना व्याकुल होकर दसों शोभाको प्राप्त हो रही थी, युद्धोचित उपकरणरूप | दिशाओंकी ओर भाग गयी ॥ ३७-३८ ॥ मेढकोंवाली वह वीरोंको आनन्द प्रदान करनेवाली और | उस समय उसके पीछे जाते हुए षडाननने उस कायरोंके डरको अत्यधिक बढ़ानेवाली थी ॥ २७ ॥ | सेनाकी निन्दा की। तदनन्तर सेन, क्रोधन तथा शतघ्न अत्यन्त दुःखसे पारकी जानेवाली वह नदी वीरोंके | नामक असुर युद्धके लिये आ पहुँचे ॥ ३९ ॥ मेदरूपी जलसे तथा मांसरूपी कीचड़से समन्वित थी। | उस समय उन असुरोंने महान् शब्द किया, जिससे उस समय सूर्यके अस्त हो जानेपर कहीं भी कुछ भी | ऐसा प्रतीत हुआ मानो मेघ गर्जना कर रहे हों। वे कार्तिकेयसे