भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 549, कुल 656 में से

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पृष्ठ 549

क्री०ख०-अ०११५ ] * दैत्यराज सिन्धुका सुसज्जित होकर रणभूमिके लिये प्रस्थान * ५४७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बोले—अरे दुष्ट ! तुमने हमारी बहुत सारी सेनाको विनष्ट कर डाला है। अब इस समय हमारे द्वारा मारे जानेपर तुम सूर्यपुत्र यमराजके भवनको जाओ ॥ ४०१/२ ॥ तदनन्तर उन तीनोंने एक साथ ही उन कार्तिकेयको अपने बाणोंद्वारा उसी प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे बहुत-से बलवान् कुत्ते सिंहको घेर लेते हैं ॥ ४११/२ ॥ तब कार्तिकेयने अपने छहों धनुषोंसे छोड़े गये बाणोंके द्वारा उनको मारा। उन बाणोंके प्रहारसे वे मूर्च्छित तो हो गये, लेकिन मुहूर्तभरमें ही फिर उठ खड़े हुए। तब उन्होंने कार्तिकेयके गलेमें पाश डाला और वे तीनों उन्हें पशुके समान बाँधकर खींचते हुए ले गये ॥ ४२-४३ ॥ षण्मुख कार्तिकेयको राक्षसोंद्वारा ले जाया गया जानकर हिरण्यगर्भ, बलवान् श्यामल तथा रक्तलोचन नामक तीनों देवगण बड़े ही वेगसे पीछे-पीछे दौड़े, किंतु सेन, क्रोधन तथा शतघ्न नामक उन तीन असुरोंने अपनी मुष्टियोंके प्रहारसे उन देवगणोंको मारा, जिससे वे भूमिपर गिर पड़े। तदनन्तर असुर मदनकान्तने महाबलवान् वीरभद्रको अपने शस्त्रके आघातसे मारा, जिस कारण वे महान् मूर्च्छाको प्राप्त हो गये। तदुपरान्त उन्होंने मूर्च्छाका परित्यागकर अपने दण्डके आघातसे उस मदनकान्तको गिरा दिया ॥ ४४-४६ ॥ उस मदनकान्तको मरा हुआ जानकर महाबलशाली असुर वीरराज उन अत्यन्त बलशाली हिरण्यगर्भ आदि तीनों देवगणोंको मारनेके लिये निकल पड़ा ॥ ४७ ॥ तदनन्तर नन्दिकेश्वरने रोष करते हुए अपनी सींगोंसे उस वीरराजपर आघात किया, जिससे वह अपने मुखसे रुधिरकी धारा बहाते हुए सौ टुकड़ोंमें विभक्त होकर भूमिपर जा गिरा। उस वीरराजको मरा हुआ देखकर शीघ्र चार श्रेष्ठ असुर नन्दीको मारनेके लिये वहाँ आये, उनके नाम थे—शार्दूल, ध्वजासुर, धूर्त तथा महाकाय। वे युद्धमें सभी देवताओंको जीतनेका सामर्थ्य रखते थे। उन असुर वीरोंने विविध प्रकारके शस्त्रोंसे उन बलवान् नन्दिकेश्वरपर प्रहार किया ॥ ४८-५० ॥ जब नन्दीश्वर गिर पड़े तो पुष्पदन्त, भूतराज, विकट तथा चपल नामक युद्धोन्मादवाले चार देवसेनापति वहाँ आये। उन चारोंने बड़े-बड़े पर्वतोंको हाथोंमें उठाकर उन असुर वीरोंके ऊपर फेंका, जिससे सभीके मस्तक फूट गये और कुछ असुर चूर-चूर हो गये ॥ ५१-५२ ॥ पर्वतोंकी चोटसे वे सभी रणभूमिमें गिर पड़े। शस्त्रोंके आघातसे पीड़ित कुछ असुर दैत्यराज सिन्धुके समीप जा पहुँचे। उन्होंने अपनी सेनाकी पराजय तथा देवताओंकी विजयका समाचार उसे बतलाया। विजयी हुई देवसेना अनेक प्रकारके वाद्योंको बजाने लगी। वे सभी देवता 'हे मयूरेश ! हे मयूरेश ! आपकी जय हो, आपकी सर्वदा विजय हो'—इस प्रकार कहते हुए हर्षित हो रहे थे और अत्यन्त आनन्दमग्न हो नृत्य कर रहे थे ॥ ५३–५५॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुसेनाका पराजय-वर्णन' नामक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११४ ॥ एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय दैत्यराज सिन्धुका सुसज्जित होकर रणभूमिके लिये प्रस्थान, सिन्धुका मयूरेशकी सेनाके वीरोंको पराजितकर मयूरेशके साथ घोर संग्राम, मयूरेशका सर्वत्र चतुर्भुजरूप दिखाना, मोहित होकर सिन्धुदैत्यका अपने भवनमें वापस आना ब्रह्माजी बोले—अपनी सेनाकी पराजयका समाचार सुनकर दैत्यराज सिन्धु अत्यन्त चिन्तित हो उठा। उसका मुखमण्डल म्लान हो गया और वह दुःखके सागरमें निमग्न हो गया। तदनन्तर सन्तप्तचित्त-से वह दैत्यराज विचार करने लगा ॥ १ १/२ ॥ सिन्धु बोला—यह विपरीत परिस्थिति कैसे उत्पन्न हो गयी, मैं इसे जान नहीं पा रहा हूँ। लोगोंसे भरे हुए ब्रह्माण्डको क्या एक चींटी ग्रसनेमें समर्थ हो सकती है ? जिस मुझ सिन्धुके आगे इन्द्र आदि देवता भी एक मच्छरके समान लगते हैं, उसी सिन्धुराजकी सेनाको शिवके एक