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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 656 में से

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पृष्ठ 530

५२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

करते हुए और पृथ्वीतलको विदीर्ण करते हुए भूमिपर गिर पड़ा। तब वे बालक मयूरेशको देखकर कहने लगे—पार्वतीका पुत्र यह मयूरेश धन्य है! ॥ ९-१० ॥ इसने क्षणभरमें ही इस महान् बलशाली दैत्यको खेल-खेलमें ही मार डाला है। इसे देखकर हम तो दसों दिशाओंमें भाग खड़े हुए थे। इसने तो गिरते हुए यहाँ अनेक घरोंको चूर-चूर कर डाला ॥ १११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर भगवान् शिवने अपने मस्तकपर चन्द्रमाको नहीं देखा, तो क्रोधसे उनके नेत्र लाल हो गये। वे संसारको जलाते हुए-से क्रोधसे आविष्ट होकर अपने गणोंसे कहने लगे—तुम लोग कैसे रक्षा करते हो? मेरे मस्तकपर स्थित निर्मल चन्द्रमाका किस दैत्यके द्वारा हरण कर लिया गया है? ॥ १२-१३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तब भयसे व्याकुल होकर थर- थर काँपते हुए वे सभी गण वहाँसे भाग उठे। कुछ गण धैर्य धारणकर भगवान् शिवसे कहने लगे—हे उमापति! मयूरेश्वर नामवाले आपके पुत्र जब खेल खेलने बाहर आये तो उनके हाथमें हमने चन्द्रमाको देखा था। परंतु हे प्रभो! वे कब चन्द्रमाको ले गये, यह हम नहीं जानते ॥ १४-१६ ॥ गणोंका यह वचन सुनकर रुष्ट हुए महेश्वर बोले—तुम लोग तो भोजन करनेमें ही तत्पर रहते हो, तुम्हारे द्वारा किस प्रकारसे रक्षा की जा रही है? ॥ १७॥ चन्द्रमाको अथवा चन्द्रमाका हरण करनेवालेको यदि तुम लोग ले आते हो तो इसीमें भलाई है, अन्यथा मैं तुम सभीको यहीं भस्म कर डालूँगा, इसमें सन्देह नहीं है। तदनन्तर क्षुब्ध मनवाले वे सभी गण जल्दी-जल्दी दौड़ते हुए मयूरेशके पास पहुँचे और रुष्टमन होकर उनसे कहने लगे ॥ १८-१९॥ अरे तस्कर! या तो तुम भगवान् शिवके पास चलो या चन्द्रमाको हमें दे दो। गणोंका वचन सुनकर गणनायक मयूरेश क्रुद्ध हो उठे। वे बोले—अरे गणो! तीनों लोकोंकी जननी देवी पार्वतीके अत्यन्त प्रभावशाली पुत्र मुझ मयूरेश्वरकी दृष्टिमें तुम्हारी अथवा तुम्हारे स्वामी शिवकी कोई गणना नहीं है ॥ २०-२१॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर उनकी श्वाससे वे उसी प्रकार उड़ गये, जैसे हवाके द्वारा पत्तोंको उड़ा दिया जाता है और वे सभी दीन शिवगण शिवकी शरणमें आकर गिरे। तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर महादेवने प्रमथ आदि गणोंसे कहा कि उमाके उस छोटे-से दुष्टात्मा बालकको पकड़कर ले आओ ॥ २२-२३॥ वे गण अत्यन्त शीघ्रतासे वहाँ गये, जहाँ वे बालक मयूरेश क्रीडा कर रहे थे। उन्होंने देखा कि वे अन्य बालकोंके साथ निश्चिन्त होकर क्रीडा कर रहे हैं ॥ २४॥ अपनेको बन्धनमें डालकर ले जानेके लिये आये हुए उन गणोंको विनायक मयूरेश्वरने मोहमें डाल दिया और स्वयं अन्तर्धान हो गये। वे गण उन्हें चारों दिशाओंमें देखने लगे ॥ २५॥ उन्होंने घर-घर, जंगल-जंगल ढूँढ़ा, किंतु वे विनायकको कहीं नहीं देख पाये। फिर किसी स्थानपर उनको पाकर वे कहने लगे—हमारे सामने आनेके बाद तुम जा कैसे सकते हो, यदि तुम ब्रह्मलोक भी पहुँच जाओ, तो हम वहाँसे भी [पकड़कर] तुम्हें उन भगवान् शिवके पास ले चलेंगे। इस प्रकार वे मयूरेश कभी अन्तर्धान हो जाते, तो कभी प्रकट हो जाते। तब शिवगणोंको अत्यन्त खिन्न देखकर परमात्मा मयूरेश उनपर कृपा करते हुए उनके समक्ष खड़े हो गये। उन्हें भलीभाँति देखकर वे गण अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गये ॥ २६-२८॥ तब उन्होंने पार्वतीपुत्र उन मयूरेशको बाँध लिया और वे उन्हें शंकरके पास ले जाने लगे, किंतु पृथ्वीके समान भारवाले उन बैठे हुए मयूरेशको वे गण उठानेमें समर्थ नहीं हो सके, यह देखकर उनके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सभी गण मिलकर भी जब किसी प्रकार भी उन्हें उठानेमें समर्थ नहीं हो सके, तब उद्यमहीन हुए वे शिवके पास आकर कहने लगे ॥ २९-३०॥ हे शंकर! हम सभी मिलकर भी उस एक अकेले मयूरेशको यहाँ लानेमें समर्थ नहीं हो पाये हैं। तदनन्तर भगवान् शिवने अपने समक्ष स्थित नन्दीको आज्ञा देकर कहा—तुम जाओ और शीघ्रतासे उस तस्कर मयूरेशको