श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 529, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१०६ ] * मयूरेशद्वारा तेरहवें वर्षमें मंगल दैत्यका वध * ५२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[ऊपरी बायाँ स्तम्भ] कहींपर शेषशय्यापर विराजमान दिखायी दी। जब वे विश्वदेव अत्यन्त प्रसन्न होकर उस मूर्तिको प्रणाम करने गये तो उसी क्षण वह मूर्ति उन्हें बार-बार मयूरपर आरूढ़ दिखायी देने लगी। वे मयूरेश उन विश्वदेवको कहीं भोजन करते हुए, कहीं आनन्द-विहार करते हुए तो कहीं सोते हुए दिखायी दिये॥ ५९-६०॥ तदनन्तर खिन्नमन होकर विश्वदेव महर्षि वसिष्ठके आश्रमपर गये। उस समय उन मयूरेशने उनसे कहा- मेरे श्रेष्ठ भक्तका दर्शन करो॥ ६१॥ यह कहकर उन्होंने अपने समक्ष स्थित पराशरका दर्शन कराया। जो मिट्टीसे बने हुए उपचारोंके द्वारा उन गुणेश्वरकी पूजा कर रहे थे और उनके अभीष्ट देव उनके द्वारा नैवेद्यके रूपमें निवेदित किये गये मिट्टीके
[ऊपरी दायाँ स्तम्भ] लड्डुओंका भोग लगा रहे थे। तदनन्तर विश्वदेवने एक ही समयमें आकाशमें, जलमें तथा भूमिमें स्थित उन्हीं मयूरेश्वरको देखा॥ ६२-६३॥ वे उस मूर्तिको एक क्षणमें नारायणके रूपमें देखते तो दूसरे ही क्षण वह मूर्ति मयूरेशकी दिखलायी पड़ती। तब उन विश्वदेवने नारायण और मयूरेशमें स्थित हुई अपनी भेदबुद्धिको त्याग दिया और अपने भ्रमका भी निवारण कर लिया॥ ६४॥ फिर उन्होंने नारायण तथा मयूरेश—दोनोंमें एक बुद्धि करते हुए उन मयूरेश्वरको अत्यन्त भक्तिभावके साथ प्रणाम किया, उनकी स्तुति की और फिर उनकी आज्ञा प्राप्तकर वे विश्वदेव अत्यन्त प्रसन्नताके साथ अपने आश्रमको चले गये॥ ६५॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विश्वदेवकी भेदबुद्धिके निरसनका वर्णन' नामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०५ ॥
एक सौ छठवाँ अध्याय मयूरेशद्वारा तेरहवें वर्षमें मंगल दैत्यका वध और शिवके ललाटपर स्थित चन्द्रमाके हरणकी लीला, मयूरेशका गणोंका स्वामी होना
[निचला बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी बोले—मयूरेशके तेरहवें वर्षकी बात है, एक दिन उन मयूरेशने निद्रामें सोये हुए अच्युत भगवान् महेश्वरको प्रणाम करनेके अनन्तर उनके सिरमें स्थित चन्द्रमाको ले लिया, उस समय कल्याणकारी भगवान् शिव अपने समस्त अंगोंमें भस्मका अंगराग लगानेसे सुशोभित हो रहे थे, उनके पाँच मुख थे, दस भुजाएँ थीं। उन्होंने गलेमें रुण्डोंकी माला धारण की हुई थी और मस्तकपर चन्द्रमाको धारण कर रखा था॥ १-२॥ तदनन्तर वे मयूरेश हँसते, नाचते और परस्पर वार्तालाप करते बालकोंसे घिरे तथा खेल करते हुए बाहर चले आये। उसी समयकी बात है, मंगल नामवाला एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा। उसका मुख अत्यन्त भयंकर था, वह वीरोंपर विजय प्राप्त करनेवाला और परम अद्भुत था॥ ३-४॥ अत्यन्त पराक्रमी वह वराहरूपी दैत्य अपनी
[निचला दायाँ स्तम्भ] दाढ़ोंसे वृक्षोंको उखाड़ देनेवाला था, वह वज्रसारके समान अपने सुदृढ़ बालोंसे आकाशको और अपने पैरोंसे धरतीको भेद देनेवाला था॥ ५॥ वह काजलके पर्वतके समान काले रंगका था, उसकी आँखें अग्निकुण्डके समान [गहरी एवं दाहक] थीं और वह वर्षाकालीन मेघोंके समान गर्जना करनेवाला था, उसे देखकर वे सभी बालक भाग पड़े॥ ६॥ वे बालक आपसमें यह कहने लगे कि इस प्रकारका सूकर कहीं देखा नहीं गया। जबतक वह दैत्य बालकोंको मारता, उससे पहले ही मयूरेशने एक हाथसे उस सूकररूप दुष्ट दानवके दाँतोंको पकड़ लिया और दूसरे हाथसे उसके नीचेके थूथनको पकड़ लिया॥ ७-८॥ तदनन्तर बालक मयूरेशने बाँसके टुकड़ेके समान उस सूकरको फाड़ डाला। तब वह दैत्य दस योजन विस्तृत अपनी पूर्व देहको धारणकर वृक्षोंको चूर-चूर