श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 528, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- मयूरेश-महोत्सव हो रहा था। भगवान् मयूरेशकी मिट्टीकी अनेकों मूर्तियाँ बनायी गयी थीं, कोई मूर्ति मयूरपर विराजमान थी, कोई मूषकपर, तो कोई सिंहपर आसीन थी। विविध प्रकारके अलंकारोंसे वे शोभा पा रही थीं, उन्हें नाना रंगोंसे सुशोभित किया गया था॥ ३७-३८॥ अनेक मुनियों तथा मुनिबालकोंके द्वारा उन मूर्तियोंका भलीभाँति पूजन किया गया। कोई उन मूर्तियोंके सामने गीत गा रहे थे तो कोई भक्तिभावसे नृत्य कर रहे थे, कोई पुराणोंका पाठ कर रहे थे, तो कोई मयूरेशकी प्रदक्षिणा करनेमें निरत थे॥ ३९१/२ ॥ उसी समयकी बात है, महात्मा वसिष्ठजीके पौत्र [और शक्तिके पुत्र], जो पराशरके नामसे विख्यात थे, वे मुनि स्वेच्छासे भ्रमण करते हुए वहाँ आये। जब वे चार वर्षकी अवस्थाके थे, तब उन्होंने भक्तिपरायण होकर मयूरेशकी एक मूर्ति बनायी॥ ४०-४१ ॥ सूखे पत्तोंसे माला बनायी और वह माला उन्हें पहनायी, कीचड़में गन्धका भाव रखकर उससे उस मूर्तिका आदरपूर्वक विलेपन किया। उन्होंने अनेक प्रकारके पत्तों तथा गीली मिट्टीसे मिष्टान्न तथा लड्डू बनाकर उन्हें भोग लगाया और उन्हीं (पत्रादि)-से दक्षिणा तथा फल भी समर्पित किये॥ ४२-४३ ॥ खेल-खेलमें ही पूजाका संकल्प लिया और अपनी जंघाको वाद्यके रूपमें धीरे-धीरे बजाया। फिर वे मुहूर्तभर मूर्तिके सम्मुख नृत्य करनेके अनन्तर 'मेरे द्वारा निवेदित इस नैवेद्यका भक्षण करो' इस प्रकारसे उस मूर्तिसे बार-बार प्रार्थना करते हुए रोने लगे। तब वह मिट्टीकी मयूरेशकी प्रतिमा सजीव हो उठी॥ ४४१/२ ॥ उन बालक पराशरने जिस-जिस प्रयोजनसे जो-जो भी वस्तुएँ उनके समक्ष रखी थीं, वे सब वैसी ही हो उठीं अर्थात् मिट्टीके बनाये गये पदार्थ चन्दन, नैवेद्य आदि यथार्थरूपमें हो गये। तदनन्तर उस सजीव प्रतिमाने उन लड्डुओं, मोदकों और पायससे समन्वित विविध पक्वान्नोंका भोग लगाया॥ ४५-४६ ॥ पराशरने उन सब मिथ्याके पदार्थों-मिट्टी, अन्न, पुष्प, फल आदि सबको सत्यरूपमें तथा उस मिट्टीकी मूर्तिको सजीव-साकार रूपमें छः भुजा धारण किये हुए देखा, फिर दूसरे ही क्षण उसे चार भुजाओंसे सुशोभित भगवान् विष्णुके रूपमें देखा। तब (पराशरकी इस कथाको सुनकर) वे (विश्वदेव) उन देवेश्वर (नारायण)-से बोले-मिट्टीका भोग लगानेका रहस्य क्या है?॥ ४७-४८१/२ ॥ विष्णुस्वरूप गुणेश बोले-मुझे श्रद्धाभक्तिसे जो कुछ भी समर्पित किया जाता है, वह अमृतरसके समान हो जाता है और श्रद्धाभक्तिसे रहित अभक्तके द्वारा अर्पित किया गया अमृत भी मेरे लिये विषके समान हो जाता है॥ ४९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-उनका इस प्रकारका वचन सुनकर विश्वदेव पुनः बोले-हे सुरेश्वर! आपका भक्त कौन है, उसका मुझे दर्शन कराइये। तदनन्तर उन विश्वदेवका हाथ पकड़कर [विष्णुरूप] मयूरेश्वर बाहर आये॥ ५०-५१ ॥ उन्होंने घर-घरमें पूजित हो रहे उन देव मयूरेश्वरका उन्हें दर्शन कराया, जो मयूरपर विराजमान थे। वहाँ भी उन विश्वदेवने अपने सहित उन मयूरेश्वरको देखा। ये मेरे स्वामी नहीं हो सकते, ऐसा निश्चय करके वे जब उस मूर्तिको छोड़कर अन्यत्र गये तो विश्वदेवने घर- घरमें नारायण विष्णुको देखा। फिर उन्होंने [विष्णुके स्थानपर] सर्वत्र गुणेश्वरको ही पूजित होते हुए देखा॥ ५२-५४॥ कहीं-कहीं उन्होंने विष्णुका स्वरूप धारण किये हुए मयूरेशका दर्शन किया। पुनः देखनेपर वह मूर्ति मयूरेशकी दिखलायी पड़ी॥ ५५॥ तदनन्तर वे मयूरेश अपनी लीला दिखाते हुए विश्वदेवका हाथ पकड़कर बाहर ले आये, किंतु वे विश्वदेव हाथ छुड़ाकर 'मेरे स्वामी ये नहीं हैं' - ऐसा कहते हुए वहाँसे चले गये॥ ५६॥ फिर प्रत्येक घरमें भ्रमण करते हुए उन्होंने विविध वाद्योंकी ध्वनि तथा नृत्य एवं गीतोंके गायनके साथ मयूरेशको पूजित होते हुए देखा॥ ५७॥ कहीं उन्होंने विष्णुरूपमें उस मूर्तिको देखा तो जब वे उसे प्रणाम करने गये तो वह मूर्ति उन्हें मयूरेशकी दिखलायी दी, जो मयूरपर आरूढ़ थी॥ ५८॥ कहींपर वह मूर्ति गरुड़पर आसीन दिखायी दी, तो Kalyana Visheshank 2021_Section_18_2_Back