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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 527, कुल 656 में से

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पृष्ठ 527

क्री०ख०-अ०१०५] * मयूरेशकी बारहवीं जन्मतिथिके महोत्सवमें विश्वदेवका वहाँ आना * ५२५ द्विज बोले-मैं क्षीरसागरमें निवास करनेवाले शेषशायी भगवान् विष्णुका दर्शन करके ही भोजन करता हूँ और तभी पानी भी पीता हूँ, यह मेरा नित्यका नियम है, किंतु आज मोहवश वह नियम मैं भूल गया हूँ॥ १६ १/२ ॥ उमा बोलीं-हे द्विजश्रेष्ठ! आपने अपने नियमके विषयमें पहले क्यों नहीं बतलाया? हे सत्यनिष्ठाको झुठलानेवाले विप्र! भोजनपात्रको छोड़कर आप क्यों जाते हैं, इससे भगवान् शंकर क्षुब्ध होकर न जाने क्या कर बैठेंगे ॥ १७-१८॥ उसी समय मयूरेश बोल पड़े-यदि आपके हृदयमें दृढ़ भावना है, तो यहींपर आपको शीघ्र ही उन पद्मनाभ विष्णुका दर्शन हो जायगा ॥ १९ ॥ यह आपका महान् अभाग्य ही दिख रहा है कि जो आप पक्वान्न तथा पायसका परित्यागकर जा रहे हैं अथवा हे द्विज! मोहवश आप कहाँ जा रहे हैं? ॥ २० ॥ हे सुव्रत! अनेक जन्मोंकी तपस्याके परिणामस्वरूप जिन भगवतीका कृपाकटाक्ष लोकमें लोगोंको प्राप्त होता है, उन्हींके द्वारा परोसे गये अन्नका आप क्यों परित्याग कर रहे हैं? जो भगवती जगदम्बा ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी सुलभ नहीं हैं, उन्हीं शिवाका आपको साक्षात् दर्शन हुआ है, वे समस्त लोकोंकी जननी और सभी स्त्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं॥ २१-२२॥ वे परम अद्भुत हैं और सभी देवताओंकी शक्ति हैं। उनके दर्शनसे ही भगवान् विष्णुके दर्शन हो पाते हैं। अग्निका भोजन करनेवाले पक्षी चकोरको जैसे मिष्टान्न अच्छा नहीं लगता है, वैसे ही अमृतोपम देवान्न भी क्या आपको अच्छा नहीं लग रहा है? अथवा विश्वस्वरूप मेरे दर्शनसे भी आपको श्रीविष्णुके दर्शन हो सकते हैं॥ २३-२४॥ द्विज बोले-मैं लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका दास हूँ, उनके अतिरिक्त और किसीका मैं वन्दन नहीं करता, यदि आप सर्वस्वरूप हैं और यदि आपमें सामर्थ्य है तो मुझे उन अविकारी विश्वेश्वर नारायणका दर्शन कराइये ॥ २५ १/२ ॥ वे मयूरेश्वर उन विप्रका उस प्रकारका दृढ़ निश्चय जानकर अन्तर्धान हो गये और फिर दूसरे ही क्षण नारायण विष्णुके रूपमें प्रकट हो गये। उन्होंने पीताम्बर धारण कर रखा था, उन सर्वसामर्थ्यसम्पन्न विभुने शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे॥ २६-२७॥ विविध प्रकारके अलंकारोंसे वे मनोरम लग रहे थे। सभी अलंकारोंके धारण करनेसे वे अत्यन्त सुन्दर प्रतीत हो रहे थे। उनका वक्षःस्थल कौस्तुभमणि तथा वनमालासे अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥ २८ ॥ वे शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहे थे और देवी महालक्ष्मी उनके चरणकमलोंका संवाहन कर रही थीं। उन (विष्णुरूप मयूरेश)-का दर्शन करके द्विज विश्वदेवने उन्हें प्रणाम किया और उनकी पूजा की ॥ २९ ॥ वे अपने शरीरका भान भूलकर अनन्य भक्तिभावके कारण उनमें तन्मय हो गये। चिदानन्दसे परिपूर्ण होकर वे द्विजश्रेष्ठ कहने लगे। आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया। आज मेरा जीवन जीना सफल हो गया, आज यह नगरी धन्य हो गयी, आज मेरे माता तथा पिता-दोनों धन्य हो गये॥ ३०-३१॥ मयूरेश्वरके उपदेशसे तथा भवानी पार्वतीके दर्शनसे आप चराचरस्वरूप, परात्पर, सर्वान्तर्यामी एवं प्रभु विष्णुके साक्षात् दर्शन मुझे यहीं प्राप्त हुए हैं ॥ ३२ १/२ ॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुने भी अपने उस भक्तका बाहुओंमें भरकर आलिंगन किया और प्रसन्न मनवाले वे आँसुओंसे गद्गद वाणीमें कहने लगे- [हे द्विज!] आपने मेरे लिये भोगका परित्याग कर दिया, मैं आपके निश्चय तथा दृढ़ एवं अविचल भक्तिको देखकर क्षीरसागरसे यहाँ आया हूँ॥ ३३-३४ १/२ ॥ मैं अपने भक्तके मार्गके काँटोंको हवाके द्वारा उड़ाकर उस मार्गको जलसे सिंचित कर देता हूँ। भक्तकी प्यासको शान्त करनेके लिये मैं जलका रूप धारण कर लेता हूँ। भक्तोंके कष्टोंका निवारण करनेवाला मैं अनेक रूपोंको धारण कर लेता हूँ। भक्त मुझे जिस प्रकारसे प्रिय होते हैं, वह मैं आपको बतलाता हूँ॥ ३५-३६ १/२ ॥ एक बारकी बात है, भाद्रपदमासकी चतुर्थी तिथिको