भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 526, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 526

५२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- एक सौ पाँचवाँ अध्याय मयूरेशकी बारहवीं जन्मतिथिके महोत्सवमें विष्णुभक्त ब्राह्मण विश्वदेवका वहाँ आना, पार्वतीद्वारा उनका आतिथ्य, किंतु विश्वदेवद्वारा यह कहकर उनका आतिथ्य स्वीकार नहीं करना कि वे केवल विष्णुको ही भगवान् मानते हैं अन्यको नहीं, तब मयूरेशका अपनी मायाद्वारा उनकी भेदबुद्धिको दूर करना, इस प्रसंगमें गणेशभक्त पराशरकी कथा ब्रह्माजी बोले- भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिकी बात है, वे सभी मुनिबालक गणेशजीकी मूर्ति बनानेके लिये मिट्टी लानेहेतु गये और वहाँसे स्वयं मिट्टी ले आये। उन मुनिबालकोंने अपनी-अपनी रुचिके अनुसार नाना प्रकारकी गणेशमूर्तियोंका निर्माण किया। किसीने सिंहपर आरूढ़ मूर्ति बनायी, किसीने मयूरपर स्थित मूर्ति बनायी और किसीने मूषकपर विराजमान गणेशजीकी मूर्ति बनायी ॥ १-२॥ गणेशजीकी वे मूर्तियाँ विविध प्रकारके आयुधोंको धारण किये हुए थीं, नाना प्रकारके दिव्य अलंकारोंसे समन्वित थीं, वे चार भुजाओंवाली थीं और दिव्य गन्ध तथा दिव्य वस्त्रोंसे सुशोभित थीं, देखनेमें वे अति सुन्दर थीं। उन बालकोंने पुष्पों [से शोभित] तथा दर्पणोंकी आभासे सम्पन्न मण्डपमें उन मूर्तियोंको स्थापित करके पृथक्-पृथक् उपचारोंके द्वारा अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिके साथ उनका पूजन किया ॥ ३-४॥ उन्होंने कमलके पुष्पोंसे निर्मित अत्यन्त मनोहर मालाएँ उन्हें पहनायीं। उस समय बजती हुई तुरहीकी ध्वनिसे वह मयूरेशकी नगरी अत्यन्त हर्षित हो उठी थी। उस जन्मतिथिको जब बालक मयूरेश बारह वर्षके हुए, माता गौरीने उन्हें विधिवत् स्नान कराया और नानाविध अलंकारों तथा अन्य प्रसाधन-द्रव्योंके द्वारा उन्हें मण्डित किया, तदुपरान्त हरिद्रा, कुमकुम आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक सौभाग्यवती स्त्रियोंका पूजन करके उनको अनेक प्रकारके उपहार प्रदान किये ॥ ५-६१/२॥ उसी समय विश्वदेव नामसे प्रसिद्ध एक [ब्राह्मण-] देवता वहाँ उपस्थित हुए, वे भगवान् विष्णुका-सा रूप धारण किये हुए थे। उनका शरीर श्रीमुद्रासे सुशोभित था और शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमालासे अलंकृत था। वे कण्ठमें अत्यन्त मनोहर तुलसीमाला धारण किये हुए थे। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण किये हुए थे, दिव्य अनुलेप लगाया हुआ था। उन्होंने अपने हाथोंमें जलपूर्ण कमण्डलु तथा वेणुदण्ड धारण किया हुआ था॥७-९॥ घरके द्वारपर स्थित उन अतिथिसे देवी गौरीने बड़ी ही श्रद्धा-भक्तिके साथ कहा- हे ब्रह्मन्! आपका आगमन कहाँसे हुआ है, मैं आपके तेजको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हूँ ॥ १० ॥ इस प्रकारसे कहे गये वे विप्र उन गौरीसे बोले- पहले मैंने तुम्हारे विषयमें जो सुन रखा था, उस सबको आज अपनी आँखोंसे देखकर मेरा मन बहुत सन्तुष्ट हो गया है। तीर्थोंमें भ्रमण करता हुआ मैं मानसिक श्रान्तिका अनुभव कर रहा हूँ और भूखसे पीड़ित हूँ, इसीलिये आपके घर आया हूँ॥ १११/२ ॥ पार्वती बोलीं- आप आसनपर विराजमान हों और प्रसन्नमन होकर भोजन करें। तब वे विप्र वहाँ आसनपर बैठ गये ॥ १२ ॥ आसनपर बैठे हुए उन ब्राह्मणदेवके चरणोंका मयूरेशने प्रक्षालन किया और उस निर्मल तीर्थतुल्य जलको सर्वत्र छिड़ककर [अपने भवन आदिको] पवित्र किया। उनका पूजन करके उन्हें पायस तथा पक्वान्नोंको समर्पित किया। वे द्विज आचमन करनेके अनन्तर मौन तथा चिन्तामें मग्न हो गये ॥ १३-१४ ॥ यह देखकर पार्वती बोलीं- आप भोजन करें, भोजन करें। यदि यह अन्न आपके मनोन्कूल नहीं है, तो जो आपको सबसे अधिक प्रिय हो, उसे प्रदान करूँगी। अतः आप शीघ्र बतायें, भगवान् शंकरके प्रभावसे मैं वह अन्न शीघ्र ही प्रस्तुत करूँगी ॥ १५१/२ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_18_1_Back