श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 525, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१०४] * ब्रह्माजीद्वारा मयूरेशकी स्तुति * ५२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सागरस्वरूपी, मनुष्य, किन्नर, लता, वृक्ष और नाग स्वरूपवाले उन विश्वरूप मयूरेश्वरका इस प्रकार दर्शन करके उदात्त बुद्धिवाला होकर उन्हें प्रणाम किया और उनसे क्षमायाचना की॥ ३९-४११/२॥ मैंने उन मयूरेशका बार-बार दर्शन किया। उस समय वे मुकुट धारण किये हुए थे, कानोंमें कुण्डल, पैरोंमें नूपुर तथा बाहुओंमें बाजूबन्द धारणकर सुशोभित हो रहे थे। उनकी नाभिमें शेषनाग, कण्ठदेशमें वासुकि सर्प विराजमान था। वे दिव्य मालाओं और वस्त्रोंको धारण किये हुए थे॥ ४२-४३॥ वे मयूरेश दिव्य सिंहासनपर विराजमान थे, सभी देवता उनकी स्तुति कर रहे थे, वे सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो पत्नियोंसे समन्वित थे। अणिमादि अष्ट सिद्धियाँ तथा नौ निधियाँ उनकी सेवामें उपस्थित थीं ॥ ४४॥ समग्र चराचर जगत्को मैंने मयूरेशके रूपमें देखा। [जगत्के] प्रत्येक पदार्थ और स्वयं अपने-आपको भी मैंने मयूरेशके ही रूपमें अवलोकन किया ॥ ४५॥ तदनन्तर मैंने उन मयूरेश्वरको प्रणाम किया, बार- बार उनकी स्तुति-प्रार्थना की और कहा-हे देव! आपकी मायासे मोहित होकर अभिमानके वशीभूत हुए तथा आपके प्रभावको देखनेकी इच्छावाले, मुझ दीन तथा शरणमें आये हुए-के अपराधको आप क्षमा करनेकी कृपा करें। क्षणभरमें ही अनन्त ब्रह्माण्डोंकी संरचना करनेवाले आप परमात्माको बार-बार नमस्कार है॥ ४६-४७॥ मैं इस प्रकार कह ही रहा था कि उन्होंने अपनी नासिकासे श्वास लेते हुए उस श्वास-वायुके साथ मुझे अपने उदरमें प्रविष्ट करा दिया। वहाँ भी मैंने वैसे ही सम्पूर्ण विश्वको देखा, जैसा कि मैंने बाहर देखा था ॥ ४८॥ वहाँ मैंने उन देव मयूरेश्वरको भी उसी रूपमें देखा, उनके एक-एक रोमकूपमें करोड़ों-करोड़ ब्रह्माण्ड स्थित थे। सम्पूर्ण चराचर विश्वको भी उसी रूपमें देखा, जैसा कि वह भूमिमें था और जैसा द्युलोकमें था ॥ ४९॥ उनके उदरमें स्थित मैं ऐसे ही जब एक ब्रह्माण्डसे दूसरे ब्रह्माण्डमें प्रविष्ट हुआ तो वहाँ भी मैंने सम्पूर्ण चराचर जगत्को उसी रूपमें देखा। इसी प्रकार अनेकों ब्रह्माण्डोंमें प्रविष्ट होनेपर मैंने वहाँ भी सम्पूर्ण विश्वको देखा, स्वयं अपनेको भी देखा और देवदेव मयूरेशको भी देखा। तब अत्यन्त खिन्न हुआ मैं उन देवेश्वरसे बोला-मैं कहीं भी आपका अन्त नहीं देख रहा हूँ। हे प्रभो! मुझपर कृपा कीजिये, आप अपनी इस मायाको समेट लीजिये। तदनन्तर करुणाके वशीभूत हुए उन देव मयूरेशने क्षणभरमें ही अपनी सम्पूर्ण मायाका तिरोधान कर लिया ॥ ५०-५२॥ तब मैंने मयूरेशको पूर्वकी भाँति देखा, वे बालकोंसे घिरे हुए थे और क्रीडा कर रहे थे। मैं उन्हें प्रणामकर बोला-मैं आपकी मायाको जान नहीं पाया ॥ ५३॥ जैसे माता अपने बच्चेके हजारों अपराधोंको क्षमा कर देती है, वैसे ही आप भी माताके समान मेरे हजारों अपराधोंको क्षमा कर दें। तब मयूरेश मेरे सिरपर हाथ रखकर मुझसे बोले ॥ ५४॥ देव बोले-मुझमें न क्रोध है और न किसीके प्रति भेदबुद्धि ही है, यह अपना है, यह पराया है-ऐसा भ्रम भी मुझमें नहीं है। मुझे किसीसे भी किंचित् भय नहीं है और न मुझसे ही किसीको अणुमात्र भय होना चाहिये ॥ ५५॥ ब्रह्माजी बोले-उनके इस प्रकारके वचन सुनकर मैंने मयूरेशपुरमें स्थित भगवान् शिवको, माता पार्वतीको और मुनिबालकोंके साथ पार्वतीपुत्र मयूरेशको देखा ॥ ५६॥ उनसे अनुमति लेकर मैं अत्यन्त आनन्दित होता हुआ अपने स्थानको चला आया। पार्वती बालक मयूरेशको लेकर अपने स्थानपर चली गयीं और वे मुनिबालक भी अपने-अपने आश्रमोंको चले गये ॥ ५७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विश्वरूपदर्शन' नामक एक सौ चारवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०४॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_18_1_Front