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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 524, कुल 656 में से

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पृष्ठ 524

५२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

[बायाँ स्तम्भ] सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और सभी प्रकारके उपद्रवोंको विनष्ट करनेवाला है॥ २०॥ हे ब्रह्मा! इस स्तोत्रका पाठ कारागृहमें गये बन्दीजनोंको सात दिन में मुक्त कर देता है। यह स्तोत्र सभी शारीरिक तथा मानसिक व्याधियोंको दूर करनेवाला तथा भोग और मोक्षको प्रदान करनेवाला है ॥ २१ ॥ हे ब्रह्मन्! आप निश्चिन्त हो जायँ, [आपके कमण्डलुसे निर्गत] यह (जलधारा) सभीको पवित्र करनेवाली और लोकमें 'कमण्डलुभवा' इस नामसे विख्यात नदी होगी ॥ २२ ॥ यह नदी अपने दर्शनसे वाचिक पापोंको, स्पर्श करनेसे मानस पापोंको तथा इसमें स्नान करनेसे यह सभी प्रकारके शारीरिक पापोंका विनाश करनेवाली होगी। यह नदी निरन्तर सेवित होनेपर मोक्ष प्रदान करेगी ॥ २३१/२॥ ब्रह्माजी बोले—उन मयूरेशके द्वारा इस प्रकारका वरदान दिये जानेपर उन सभी मुनीश्वरोंने अपनी पत्नियों तथा परिवारके साथ, सात करोड़ गणोंने तथा स्वयं मैंने [भी] उस कमण्डलुभवा नामक नदीमें स्नान किया। साथ ही उन मुनियोंने मेरे साथ वहाँपर तप किया॥ २४-२५॥ तदनन्तर मैं उन मयूरेशकी मायासे मोहित हो गया और तब मैंने बहुत जनोंसे कहा—मैं तो जगत्की सृष्टि करनेवाला, जगत्के द्वारा वन्दनीय तथा इन्द्र आदि सभी देवताओंद्वारा पूजित हूँ, फिर मैंने ग्यारह वर्षके उस बालकको क्यों प्रणाम किया? वह तो अन्य बालकोंके साथ क्रीडा कर रहा था और आचार-विचारसे रहित एक बालक था ॥ २६-२७॥ मेरे ज्ञानको धिक्कार है, मेरी महिमाको धिक्कार है और मेरे पितामहपदको भी धिक्कार है! अब मैं अपने बनाये इस सृष्टि-प्रपंचको छिपाकर स्वयं भी गोपनीय रूपसे रहूँगा ॥ २८ ॥ यदि यह मयूरेश परमात्मा होगा तो पुनः दूसरी सृष्टि कर लेगा—ऐसा मनमें निश्चय करके मैंने अपनी बनायी सृष्टिको तथा स्वयं अपनेको भी अन्तर्धान कर लिया, फिर जब गजाननने अपने मित्र बालकोंको वहाँ नहीं

[दायाँ स्तम्भ] देखा, तो वे उनके घरोंमें उन्हें देखने गये ॥ २९-३०॥ किंतु उन सभी घरोंको लोगोंसे रहित देखकर वे खिन्न हो उठे और उन्होंने जब वृक्षोंकी ओर देखा तो वहाँ वृक्षोंको भी नहीं देखा, न जन्तुओंको देखा और न पशु-पक्षियोंको ही देखा। फिर जब वे मयूरेश स्वर्गलोक गये तो उन्होंने वहाँ उन देवताओंको भी नहीं देखा। न तो गन्धर्व दिखायी पड़े और न किन्नर, यक्ष तथा पितृगण। सूर्य, चन्द्रमा भी नहीं दिखायी पड़े ॥ ३१-३२॥ उस समय अत्यन्त घना अन्धकार छा जानेके कारण कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था। तदनन्तर जब उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो उन्हें यह सब [मुझ] ब्रह्माद्वारा किया गया है, ऐसा ज्ञात हुआ ॥ ३३ ॥ तदनन्तर अखिल जगत्के आत्मरूप देव मयूरेश्वरने अपने सामर्थ्य और अपनी मायाको प्रकट किया, फिर उन्होंने अपनी लीलासे एक दूसरे ही ब्रह्माण्डकी संरचना कर डाली। तब प्रभु मयूरेशने उस ब्रह्माण्डमें स्थावर-जंगमात्मक विश्व तथा सम्पूर्ण त्रैलोक्य और मयूरेशकी पुरीको, जैसे पहले था, उसी रूपमें दिखलाया ॥ ३४-३५ ॥ उन विभु मयूरेशने बालकोंसे घिरे हुए स्वयं अपनेको, वैसे ही दूसरे ब्रह्माजीको, शंकर-पार्वती तथा उसी प्रकारसे तपस्यानुष्ठानमें निरत मुनियों, सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह-नक्षत्रों, अनेक स्वर्गों, देवगणों, पृथिवी, सब प्रकारके वृक्षों, समुद्रों, नदियों तथा पातालोंको भी पहलेके समान ही दिखलाया ॥ ३६-३७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] तब उन चिदात्मा मयूरेशका दर्शनकर मुझे स्मृति प्राप्त हुई। उन मयूरेश्वरके द्वारा इस प्रकारसे अन्य सृष्टिकी संरचना देखकर तुच्छ बुद्धिका परित्याग करके मैंने उन्हें प्रणाम किया और उनसे क्षमा-याचना की ॥ ३८१/२ ॥ उस समय मैंने कला, काष्ठा, मुहूर्त आदि और दिन, पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष, कल्प आदि समयरूपी स्वरूप धारण करनेवाले तथा चराचर स्वरूपवाले और असंख्य ब्रह्माण्डोंको अपने रोमकूपोंमें धारण करके सुशोभित होनेवाले, देवता, ऋषि, यक्ष, गन्धर्व, सरित् एवं