श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 523, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१०४ ] * ब्रह्माजीद्वारा मयूरेशकी स्तुति * ५२१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करनेवाले देव मयूरेशको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५ ॥ जो इन्द्र आदि देवताओंके द्वारा रात-दिन वन्दित होते रहते हैं, जो सत् तथा असत् रूप हैं और व्यक्त तथा अव्यक्त हैं, उन मयूरेशको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६ ॥ जो अनेकों दैत्योंका वध करनेवाले हैं, विविध प्रकारके स्वरूपोंको धारण करनेवाले हैं और नाना प्रकारके आयुधोंको धारण करते हैं, उन मयूरेशको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥ जो सभी प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न हैं, सभी रूपोंमें अभिव्यक्त हैं, सब प्रकारसे समर्थ हैं और सभी विद्याओंके उपदेष्टा हैं, उन देव मयूरेशको मैं प्रणाम करता हूँ। जो माता पार्वतीके पुत्र हैं, भगवान् शंकरके आनन्दकी अभिवृद्धि करनेवाले हैं और भक्तोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं तथा नित्य हैं, उन मयूरेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ८-९ ॥ जो मुनियोंके द्वारा ध्येय हैं, मुनियोंके द्वारा वन्दित हैं, मुनिजनोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, ऐसे उन आप समष्टि-व्यष्टिरूप मयूरेशको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सभी प्रकारके अज्ञानका निवारण करनेवाले हैं, सभी प्रकारका ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं, सर्वथा पवित्र हैं, सत्य एवं ज्ञानमय हैं तथा सत्यस्वरूप हैं, उन मयूरेशको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १०-११ ॥ जो अनेकों करोड़ ब्रह्माण्डोंके अधिनायक हैं, जगत्के ईश्वर हैं, अनन्त विभवस्वरूप हैं और विष्णुरूप हैं, उन मयूरेशको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १२ ॥ [हे देव !] आपका दर्शन प्राप्तकर मैं सर्वथा पवित्र हो गया हूँ और परमानन्दमें निमग्न हो गया हूँ। आपके द्वारा उस कमलासुर नामक दैत्यके मारे जानेपर मैं परम आश्चर्यान्वित हो गया हूँ* ॥ १३ ॥ जिस दैत्य कमलासुरने देवराज इन्द्र, यमराज, सभी देवता और लोकपालोंको बलपूर्वक जीत लिया था, जो हजारों, सैकड़ों वीरोंसे एक साथ युद्ध करनेवाला तथा असंख्य देह धारण करनेवाला था, उसे आपने युद्धमें मार गिराया है, और वह कमलासुर तीन टुकड़ोंमें विभक्त होकर तीन अलग-अलग स्थानोंपर गिरा है ॥ १४ १/२ ॥ ऐसा कहकर उन मयूरेशका मैंने पूजन किया। मैंने अपने कमण्डलुमें स्थित सभी तीर्थोंके पापनाशक एवं पवित्र जलोंसे उनका अभिषेक किया। दिव्य दो वस्त्रोंको धारण कराया, दिव्य गन्धका अनुलेपन किया, अत्यन्त शुभ दिव्य पुष्पोंसे निर्मित वनमाला उनके कण्ठमें पहनायी और सब प्रकारके मंगलोंका जनक 'वनमाली' यह सभी लोकोंमें विख्यात नाम मैंने उनका रखा ॥ १५-१७ ॥ इस प्रकारसे पूजाकी विधि सम्पन्न करनेके अनन्तर मैंने उनकी प्रदक्षिणा की। प्रदक्षिणा करते समय मेरे चरणोंकी ठोकर लगनेसे वहाँपर जो कमण्डलु था और जो नाना तीर्थोंके जलसे पूर्ण था, एकाएक उलट गया। मैं उस जलको कमण्डलुमें भरनेका प्रयत्न करने लगा, किंतु तभी वे प्रभु मयूरेश मुझसे बोले ॥ १८-१९ ॥ मयूरेश बोले- ब्रह्माजीद्वारा किया गया यह स्तोत्र सभी प्रकारके पापोंका नाश करनेवाला है। यह मनुष्योंकी
- पुराणपुरुषं देवं नानाकीडाकरं मुदा। मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ परात्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदि स्थितम् । गुणातीतं गुणमयं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया । सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ इन्द्रादिदेवतावृन्दैरभिष्टुतमहर्निशम् । सदसद्व्यक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ नानादैत्यनिहन्तारं नानारूपाणि बिभ्रतम् । नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरूपधरं विभुम् । सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ पार्वतीनन्दनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम् । भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपूरकम् । समष्टिव्यष्टिरूपं त्वां मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ सर्वाज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम् । सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ अनेककोटिब्रह्माण्डनायकं जगदीश्वरम् । अनन्तविभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ त्वद्दर्शनेन पूतोऽहं परमानन्दनिर्भरः । आश्चर्यं परमं प्राप्तस्तस्य दैत्यस्य मारणात् ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १०४। ३-१३)