भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 522, कुल 656 में से

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पृष्ठ 522

५२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 शत्रु Host विनाश किया है, जो इन्द्र आदि देवताओंको भी | कामनाओंको पूर्ण करने लगे और समस्त विघ्नसमूहोंका भय प्रदान करनेवाला था; वज्र, चक्र आदि आयुधोंसे भी | निवारण करने लगे। तदनन्तर देवशिल्पी विश्वकर्माने अभेद्य था और जो मुनिजनोंको भी भयभीत करनेवाला | वहाँपर एक सुन्दर मन्दिरका निर्माण किया ॥ ३१-३२ ॥ था* ॥ २६-२७ १/२ ॥ | वह मन्दिर असंख्य द्वारों, असंख्य शिखरों तथा ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर | असंख्य आश्चर्योंसे समन्वित था। वहाँपर एक सुन्दर गौतम आदि महर्षियोंने उन मयूरेश्वरका पूजन किया। | नगर भी बस गया, जिसमें सभी प्रकारके लोग निवास भगवान् शिवने भी अपने दस हाथोंके द्वारा मयूरेशका | करते थे ॥ ३३ ॥ आलिंगनकर उनकी पूजा की। तदनन्तर वे मुनिगण | महर्षियोंने उस नगरका नाम मयूरेशपुर रखा और मयूरेश्वर तथा भगवान् शिवसे बोले— ॥ २८-२९ ॥ | नाना प्रकारके भवनों (आश्रमों)-में स्थित होकर मुनिजनोंने सभी देवताओंके साथ आप यहाँपर भक्तोंके | वहाँपर तपस्या की ॥ ३४ ॥ मनोरथोंको सिद्ध करते हुए तथा सभी विघ्नसमूहोंका | भगवान् शिव भी देवी पार्वती तथा गणोंके साथ निवारण करते हुए सर्वदाके लिये विराजमान रहें ॥ ३० ॥ | वहाँपर तप करने लगे। वे द्विजगण भगवान् शिवका भी इस प्रकारसे प्रार्थना किये गये लोककल्याण | ध्यान-पूजन तथा स्मरण वहाँपर करने लगे। देव मयूरेश करनेवाले वे दोनों भगवान् शंकर और देव मयूरेश्वर सभी | पहलेकी ही भाँति मुनिबालकोंके साथ [वहाँ पर] क्रीडा देवताओंके साथ वहाँपर स्थित हो गये। वे भक्तोंकी | करने लगे ॥ ३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कमलासुरके वधका वर्णन' नामक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०३ ॥ एक सौ चारवाँ अध्याय ब्रह्माजीद्वारा मयूरेशकी स्तुति, स्तुतिका माहात्म्य, 'कमण्डलुभवा' नामक नदीका प्राकट्य, मयूरेशकी मायासे ब्रह्माका मोहित होना, मयूरेशकी परीक्षाके लिये ब्रह्माद्वारा सृष्टिका तिरोधान, मयूरेशद्वारा पुनः सृष्टि कर लेना और ब्रह्माजीको अपने विश्वरूपका दर्शन कराना ब्रह्माजी बोले—हे द्विजश्रेष्ठ व्यासजी! मैं भी | और सर्वथा अचिन्त्य हैं, उन देव मयूरेशको मैं प्रणाम गुप्तरूपसे उन मयूरेश्वरका दर्शन करने गया था, वहाँ | करता हूँ। जो परसे भी परे हैं, चिदानन्दस्वरूप हैं, मैंने पार्वतीके साथ उन प्रभु मयूरेश्वरका दर्शन किया ॥ १ ॥ | निर्विकार हैं, भक्तजनोंके हृदयमें निवास करनेवाले हैं, वे स्नान करनेके अनन्तर आसनपर बैठे हुए थे और | गुणातीत हैं, और गुणमय हैं, उन मयूरेशको मैं प्रणाम सनातन परब्रह्म (गायत्रीमन्त्र)-का जप कर रहे थे। तब | करता हूँ ॥ ३-४ ॥ मैंने उन मयूरेश्वर नामवाले देवकी स्तुति की ॥ २ ॥ | जो अपनी इच्छाके अनुसार इस जगत्की सृष्टि जो पुराणपुरुष हैं, प्रसन्नतापूर्वक नाना प्रकारकी | करते हैं, उसका पालन-पोषण करते हैं और पुनः उसका क्रीडाएँ करते हैं, अनेक प्रकारकी माया रचनेवाले हैं | संहार भी कर डालते हैं, उन सब प्रकारके विघ्नोंका नाश

  • कमलाकान्तहृदयहृदयानन्दवर्धन । कमलाकान्तनमित कमलासुरनाशन ॥ कमलासेवितपद जय त्वं कमलाप्रद । कमलासनवन्द्येश कमलाकरशीतल ॥ कमलाङ्कुसुपादाब्ज कमलाङ्गितसत्कर । कमलाबन्धुतिलक भक्तानां कमलाप्रद ॥ कमलासुनुरिपूज कमलासुनुसुन्दर । कमलापितुरत्नानां मालया जय शोभित ॥ कमलासुरबाणानां कमलेन निवारक । कमलाकान्तकमलकोशाजितकरपङ्कज ॥