श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 521, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१०३ ] * कमलासुर और मयूरेशका भीषण युद्ध * ५१९ था, वहीं एक दूसरा असुर उत्पन्न हो जाता था, जो उसी कमलासुरके समान रूपवाला और उसीके समान बल- पराक्रमसे सम्पन्न रहता था, इस प्रकार वहाँ असंख्य असुर उत्पन्न हो गये। विविध प्रकारके अस्त्रों तथा शस्त्रोंसे तथा बाणोंकी वर्षासे वे मयूरेशपर आघात करने लगे। तदनन्तर क्रोधाग्निमें जलते हुए देव मयूरेशको उन असुरोंने घेर लिया ॥ ८-९ ॥ उसी समय साढ़े तीन करोड़ सैनिकोंके साथ देवी सिद्धि एवं बुद्धि अत्यन्त क्रुद्ध होकर वहाँ उपस्थित हुईं और फिर युद्ध होने लगा ॥ १० ॥ सिद्धि एवं बुद्धि नामक वे दोनों देवियाँ गणराजसे कहने लगीं-क्षुधाको दूर करनेवाला भक्ष्य पदार्थ हमें प्रदान कीजिये। तब देव गणराज बोले-आप लोग दैत्योंके रक्तसे उत्पन्न उन बहुत-से असुरोंका भक्षण करें। मयूरेशके द्वारा इस प्रकार कही गयी उन देवियोंने उस समय भूतगणोंके साथ मिलकर शीघ्र ही उन सभी दैत्योंको खा डाला। देव मयूरेशने अपने खड्गसे उस दैत्य कमलासुरपर प्रहार किया तो उसके रक्तसे पुनः सैकड़ों दैत्य उत्पन्न हो गये ॥ ११-१३ ॥ तब देवियोंने तथा उनके सैनिकोंने कमलासुरके रक्तसे उत्पन्न उन सभी दैत्योंका फिर भक्षण कर लिया तथा चारों ओर प्रवाहित रक्तको भी पी डाला। तदनन्तर अत्यन्त खिन्न हुए मयूरेशने अत्यन्त शीघ्रगामी शूलको उठाकर उस दैत्य कमलासुरपर छोड़ा। वह शूल दसों दिशाओंको जलाता हुआ, पर्वतोंको चूर-चूर करता हुआ, आकाशको निनादित करता हुआ और ग्रह- नक्षत्रोंको गिराता हुआ बड़े ही वेगसे गिरा और उसने उस दैत्यके शरीरका भेदन करते हुए उस शरीरके तीन टुकड़े कर डाले ॥ १४-१५ १/२ ॥ उस कमलासुर दैत्यका कटा हुआ मस्तक भीमा नदीके दक्षिणी तटपर गिरा। उसके दोनों पैर कृष्णा नदीके उत्तरी तटपर गिरे और वक्षःस्थल वहाँपर गिरा, जहाँ गुणेश्वर खड़े थे। उस समय सभी लोग अत्यन्त प्रसन्न मनवाले हो गये और वे गुणेश्वरकी जय-जयकार करने लगे ॥ १६-१७ ॥ वे बोले- हे देव मयूरेश ! आपकी जय हो, आपने दुष्टोंका विनाश किया है। उसी समय अपने गणोंसे घिरे हुए गौरीपति भगवान् शंकर वहाँ आये ॥ १८ ॥ उनके साथमें गौतम आदि मुनिगण तथा देवी पार्वती भी थीं। उस समय सभी वाद्य बज रहे थे और आकाशसे पुष्पवृष्टि हो रही थी। तब देवी पार्वतीने मयूरेशका आलिंगनकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उन्हें अपना स्तनपान कराया और वे मुनिगण देवताओंके ईश उन मयूरेश्वरकी स्तुति करने लगे ॥ १९-२० ॥ मुनिगण बोले- लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके हृदयमें विराजमान होकर जो हृदयके आनन्दको बढ़ानेवाले हैं, रमाकान्त विष्णुके द्वारा वन्दित हैं, कमलासुरका विनाश करनेवाले हैं, देवी लक्ष्मीके द्वारा जिनके चरण सदा सेवित होते रहते हैं, उन लक्ष्मी प्रदान करनेवाले आप मयूरेशकी जय हो ॥ २१ १/२ ॥ हे ईश ! आप कमलके आसनपर विराजमान रहनेवाले ब्रह्माद्वारा सदा वन्दित होते रहते हैं, आप कमलाकर अर्थात् चन्द्रमाके समान शीतलता प्रदान करनेवाले हैं, कमलके चिह्नसे सुशोभित चरणकमलोंवाले हैं, आपके श्रेष्ठ हाथ कमलके चिह्नसे सुशोभित हैं, आप लक्ष्मीके भाई चन्द्रमाको तिलकके रूपमें धारण करनेवाले हैं, भक्तजनोंको आप लक्ष्मी प्रदान करनेवाले हैं, आप कमला लक्ष्मीके पुत्र कामदेवके शत्रु भगवान् शिवके पुत्र हैं, कमलाके पुत्र कामदेवके समान सुन्दर हैं और लक्ष्मीके पिता समुद्रसे उत्पन्न होनेवाले रत्नोंकी मालासे सुशोभित हैं, आपकी जय हो। कमलासुरके द्वारा चलाये गये बाणोंका आपने अपने कमलके द्वारा निवारण किया है, कमलाकान्त श्रीहरिके द्वारा धारित कमलके कोशकी शोभाको जीत लेनेवाले करकमलसे युक्त-आपकी जय हो ॥ २२-२५ ॥ सभी प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाले हे मयूरेश ! आप लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके हाथमें विराजमान रहनेवाले कमलकोशके समान नेत्रोंवाले हैं और सभीके हृदयरूपी कमलको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं, आपकी जय हो। हे देव ! आप अपने करकमलोंमें कमल तथा अंकुश धारण करते हैं, समस्त विघ्नोंके विनाशक हैं और अविनाशी हैं, आपकी जय हो। आपने ऐसे पापरूपी