श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 507, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०९८ ] * आठवें वर्षमें गुणेश्वरद्वारा विचित्र दैत्यका वध * ५०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अट्ठानबेवाँ अध्याय आठवें वर्षमें गुणेश्वरद्वारा विचित्र दैत्यका वध और विनताके गर्भसे उत्पन्न अण्डका भेदन, उसमेंसे मयूर नामक पक्षीका प्राकट्य, विनताद्वारा गुणेश्वरकी स्तुति, गुणेश्वरका मयूरको अपना वाहन बनाना और मयूरेश्वर नामसे प्रसिद्ध होना ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे जब गुणेश्वरका | पार्वतीके प्रमथ आदि गण, पार्वतीजी एवं उनकी सखियाँ- सातवाँ वर्ष व्यतीत हुआ और आठवाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ, | ये सभी आनन्दमग्न हो गये थे। उस समय भगवान् तब वे गुणेश एक दिन उषाकालमें स्नान करनेके अनन्तर | शिवके मस्तकमें स्थित चन्द्रमा अमृत प्रवाहित करने गायत्रीमन्त्रका जप तथा चारों वेदोंका स्वाध्याय कर रहे | लगे। उस अमृतका संयोग होनेसे शिवजीके गलेमें स्थित थे। उन्होंने कस्तूरीका तिलक लगाया हुआ था, अनेक | रुण्डमालाके रुण्ड जीवित पुरुष हो गये थे। गुणेशके उस प्रकारके आभूषणोंसे वे भलीभाँति सुसज्जित थे। उन्होंने | वेदगानकी ध्वनिके श्रवणसे सभी किन्नर तथा गन्धर्व दिव्य वस्त्रोंको धारण किया हुआ था, वे दिव्य गन्ध | लज्जित हो गये थे ॥ ९-११ ॥ तथा दिव्य मालाओंसे विभूषित थे ॥ १-२ ॥ | उस समय जो स्त्रियाँ कामके उद्वेगसे सन्तप्त थीं, उसी समय तपस्वियोंके वे बालक उन गुणेश्वरके | वे शान्त हो गयी थीं और वे गुणेशकी आरती करने लगी पासमें आये, उन गुणेश्वरकी दीप्तिसे वे बालक उसी | थीं। उसी समय वहाँ एकाएक एक दैत्य आ पहुँचा, जो प्रकार कान्तिमान् हो गये, जैसे सूर्यकी दीप्तिसे बादल | बड़ी ही विचित्र आकृतिवाला था। उसकी आवाजसे उस प्रकाशित हो उठते हैं। उन मुनिबालकोंको देखकर | समय मन्दर आदि पर्वतोंकी गुफाएँ विदीर्ण हो गयी थीं, गुणेश्वरमें स्वतः ही उन बालकोंके साथ अध्ययन | वह दैत्य हलके समान दाँतोंवाला था, उसके नासाछिद्र करनेकी बुद्धि उत्पन्न हुई। उस समय विभु गुणेश्वरने उन | वापीके समान थे, वह तड़ागके समान नेत्रोंवाला था और सभीके मस्तकपर अपना हाथ रखा ॥ ३-४ ॥ | शत्रुओंका विनाश करनेवाला था ॥ १२-१३ ॥ उसके प्रभावसे तीन-चार तथा पाँच वर्षके उन | वह दैत्य एक हिंसा करनेवाले पशुका स्वरूप बालकोंको भी वेदमन्त्रोंका स्फुरण हो आया। बिना | बनाकर वहाँपर जहाँ-तहाँ भ्रमण कर रहा था। उसके किसी चेतन प्राणीके उन्हें आकाशध्वनि सुनायी पड़ी। | पाँच नेत्र थे, चार सींग थे, आठ पैर थे और चार कान तदनन्तर उन सभीने चारों वेदोंका पारायण किया। उस | थे। वह तीन मुखोंवाला था तथा उसकी दो पूँछें थीं। वेदध्वनिको सुनकर उस समय पशुओंने मुखमें रखा हुआ | वे गुणेश उसे देखकर बड़े जोरसे हँसने लगे और प्रभु ग्रास भी भक्षण करना बन्द कर दिया ॥ ५-६ ॥ | गुणेश उन शिशुओंसे बोले-अरे बालको! तुम लोग इस वे वेदका पारायण कर रहे उन बालकोंकी वेदध्वनिको | कौतुकको देखो ॥ १४-१५ ॥ सुननेमें तत्पर थे। ऋग्वेद तथा यजुर्वेद-इन दो वेदोंके | तब उन बालकोंने गुणेश्वरसे कहा-आज हमने पारायणके अनन्तर उन्होंने सामवेदका गान प्रारम्भ | इस अत्यन्त अद्भुत पशुका दर्शन किया है। तदनन्तर किया। अनेक हरिण, सिंह, शार्दूल, सर्प तथा पक्षियोंकी | वह दैत्य नृत्य करने लगा और [सहसा] ऊँचा उछलकर अनेक जातियाँ उस वेदगानके श्रवणमें अनुरक्त थीं, | वह भूमिपर गिरा ॥ १६ ॥ उनके नेत्रोंसे आनन्दाश्रु प्रवाहित होने लगे ॥ ७-८ ॥ | वह क्षणभरमें अदृश्य हो जाता था और अगले ही उस वेदगानकी ध्वनिको श्रवण करनेमें आसक्त | क्षण सामने स्थित हो जाता था। वह दृश्य एवं अदृश्य अट्ठासी हजार मुनिगण आनन्दसरोवरमें उसी प्रकार | स्वरूप धारण करने लगा। विभु गुणेशने उन बालकोंसे निमग्न होकर सो गये, मानो कि वे रातमें सोये हों। | कहा-'इसे पकड़ लो-पकड़ लो'। ऐसा कहकर वे