श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 506, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 विष उगलने लगा। यह देखकर गरुड़ने उसे अपने | बाजको बलपूर्वक ले जाकर पातालके एक विवरमें पंखोंके आघातसे जमीनपर पटक दिया॥ ३४-३५॥ | छिपाकर दृढ़तापूर्वक उस बिलको बन्द कर दिया उस समय स्वस्थ होकर विनता बड़े वेगसे अपने | है॥ ४४॥ श्रेष्ठ स्थानको निकल पड़ी। वासुकि नागका वैसा | हे मुने! उनके बिना मेरे प्राण निश्चित ही चले पराक्रम देखकर गरुडने सूक्ष्मरूप बना लिया और वह | जायेंगे। प्रभो! आप-जैसे स्वामीके होनेपर भी मैंने इतना विनताकी रक्षाके लिये गया, उसके जानेपर वासुकि नाग | दुःख प्राप्त किया है॥ ४५॥ अत्यन्त क्रुद्ध हो गया तथा उसने संसारको जलाते हुए | ब्रह्माजी बोले-प्रिया विनताके इस प्रकारके बहुत-सारा विष उगल डाला॥ ३६-३७॥ | वचनोंको सुनकर मुनि कश्यप उनसे बोले॥ ४५१/२ ॥ वह वासुकि नाग उन (जटायु आदि पक्षियों)- | मुनि बोले-हे कल्याणि! तुम चिन्ता मत करो, को बन्धनमें डालकर शीघ्र ही नागलोकको ले गया | तुम्हारा मानसिक सन्ताप दूर हो जायगा। मैं तुम्हें और उन्हें एक विवरमें छोड़ दिया। तदनन्तर उस | ऋतुदान प्रदान करूँगा, जिससे तुम्हें अन्य पुत्रकी प्राप्ति विवरके द्वारको ढककर वह माता कद्रूके पास चला | हो जायगी। अण्डके रूपमें उत्पन्न तुम्हारा वह गर्भ आया॥ ३८॥ | वज्रके द्वारा भी अभेद्य होगा, किंतु जब पार्वतीका पुत्र वासुकि नागने वह सारा वृत्तान्त माता कद्रू तथा | खेल-खेलमें उस अण्डेका भेदन कर डाले, तभी तुम्हें शेषनागको बताया। इधर विनता अपने उन पुत्रोंको | उस अण्डेमेंसे एक पुत्रकी प्राप्ति होगी॥ ४६-४७१/२ ॥ बाँधकर ले जानेका समाचार सुनकर अत्यन्त शोकमें पड़ | उसका कण्ठ नीले वर्णका होगा, वह बलवान् गयी॥ ३९॥ | होगा और दूसरे नीलकण्ठ भगवान् शिवके समान होगा। वे शीघ्र ही महर्षि कश्यपके पास गयीं और उन्हें | उसकी केवल शब्दध्वनिको सुनकर ही वे सभी सर्प प्रणामकर इस प्रकार कहने लगीं- यह एक ऐसी ही | पराजित हो जायेंगे और गुणेश भी उस नीलकण्ठ पक्षीपर विपरीत घटना हो गयी है, जो पश्चिमसे सूर्य उदय | सवार होकर पृथ्वीके भारका हरण करेंगे। तब तुम्हारे होनेके समान है॥ ४०॥ | पुत्र भी नागोंके बन्धनसे मुक्त हो जायेंगे। ऐसा कहनेके मैं घरमें स्थित थी, किंतु एकाएक ही शत्रु | अनन्तर एकान्तमें ले जाकर मुनि कश्यपने विनताको वासुकि नागने मेरा हरण कर लिया। मुझे छुड़ानेके | ऋतुदान दिया॥ ४८-५०॥ लिये बाज, जटायु और सम्पाति मेरे पीछे-पीछे आये। | इसके पश्चात् वह विनता प्राणियोंसे रहित एक उन्होंने अपने बल-पराक्रमसे उन सर्प-समूहोंको मारा, | काननमें चली गयी और यथासमय उसने एक अण्डको परंतु हे मुने! बहुत-से सर्पोंके द्वारा शीघ्र ही उन | उत्पन्न किया, जो वज्र तथा पर्वतोंके प्रहारसे भी बाज, जटायु तथा सम्पातिको पराजित कर दिये जानेपर | अभेद्य था॥ ५१॥ मैंने गरुड़का स्मरण किया। गरुड़ने वहाँ अणु (के | विनताने वृक्षके पत्तों तथा छालसे लपेटकर उस समान सूक्ष्म)-रूपमें आकर उन सभी सर्पगणोंको जीतकर | अण्डेको एक मिट्टीके पात्रमें छिपा दिया और वह उस मुझे उनके बन्धनसे मुक्त किया और वह स्वयं भी मेरे | पात्रके ऊपर उसी प्रकार बैठ गयी, जिस प्रकार कि साथ वापस आया॥ ४१-४३॥ | भूमिमें गाड़े हुए द्रव्यके ऊपर कोई अत्यन्त बलवान् सर्प तदनन्तर उस वासुकि नागने जटायु, सम्पाति तथा | बैठा रहता है॥ ५२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मयूरोपाख्यानमें अभेद्य अण्डकी उत्पत्तिका वर्णन' नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९७॥