भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 656 में से

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पृष्ठ 514

५९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- कर रहे थे॥ १०-११॥ उस अत्यन्त अभिमानी और महाबलशाली वासुकीको देखकर मयूरेश्वर उड़ करके उसके फणोंपर जा बैठे और फणोंपर स्थित मणिको शीघ्र ही ले लिया॥ १२॥ उस मणिके प्रकाशसे पाताललोकमें कभी कहीं कोई अन्धकार नहीं होता था। उस समय उसने अपने सिरको हिलाते हुए सातों पर्वतों, सातों समुद्रों, पातालों तथा रसातलको आन्दोलित कर डाला था। तदनन्तर मयूरेशने खेल-खेलमें ही अपने एक हाथसे उस वासुकि नागको पकड़कर अपने गलेमें बाँध लिया। इसी कारण स्वर्गलोकमें वे मयूरेश 'सर्पभूषण' इस नामसे विख्यात हुए। तदनन्तर अत्यन्त आनन्दित होते हुए विभु मयूरेश्वरने गर्जना की॥ १३-१५॥ उस भीषण गर्जनाको सुनकर तीनों लोक क्षुब्ध हो उठे। तदनन्तर सर्पगणोंने वासुकीको वापस लानेके लिये शेषनागसे कहा॥ १६॥ तब अत्यन्त क्रोधमें आविष्ट होकर उस शेषनागने अपने सभी फणोंको फैलाकर उनसे विषाग्नि उगलते हुए तीनों लोकोंको दग्ध करना प्रारम्भ कर दिया॥ १७॥ वह कहने लगा—मेरे बन्धु उस वासुकीको जीतनेमें कौन समर्थ हो सकता है? यह कहकर वह जैसे दावाग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार क्रोधके आवेशमें जलता हुआ-सा गया॥ १८॥ वह शीघ्र ही गया और उसने मयूरेशको 'ठहरो- ठहरो' इस प्रकारसे कहा। तदनन्तर नागोंके अन्य कुल भी शीघ्र ही उस शेषनागके पीछे-पीछे गये॥ १९॥ तदनन्तर उस नागसमूहको देखकर देव मयूरेश वहीं ठहर गये और उन्होंने अपने वाहन मयूरके मस्तकपर हाथ रखा और उसे सर्पोंके साथ युद्ध करनेके लिये प्रेरित किया॥ २०॥ अत्यन्त अद्भुत वह मयूर मयूरेश्वरको प्रणाम करके सर्पोंको निगलता हुआ-सा आगे बढ़ा। मयूरने अपने पंखोंको फड़फड़ाया, फड़फड़ानेकी उस हवाने बड़े-बड़े सर्पोंको उड़ाकर घुमा डाला॥ २१॥ उस मयूरने किन्हीं-किन्हीं सर्पोंका भक्षण कर लिया और दूसरे सर्पोंको चूरा-चूरा बना डाला। किन्हीं- किन्हीं अत्यन्त बलवान् सर्पोंको उसने मार डाला॥ २२॥ कुछ सर्प उसे देखते ही भयसे विह्वल होकर मृत हो गये। तदनन्तर उस मयूरका वैसा बल-पराक्रम देखकर शेषनागने विषैली श्वास-वायु छोड़ी॥ २३॥ उस विषैले श्वाससे वह मयूर मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़ा। तब वह शेषनाग क्रोधसे तीनों लोकोंको जलाता हुआ-सा मयूरेशकी ओर दौड़ा॥ २४॥ तीनों लोकोंको विषकी अग्निसे परिव्याप्त देखकर गुणेश्वरने अपना विराट् रूप बना लिया और वे उस शेषनागके फणोंके ऊपर चढ़ बैठे॥ २५॥ बालसुलभ चंचलतावश वे उछलकर दूसरे मेघके समान गर्जना करने लगे और अपने चरणोंके प्रहारसे आघात करते हुए ताली बजाकर नृत्य करने लगे॥ २६॥ मात्र एक ब्रह्माण्डके भारको सहन करनेवाला वह शेषनाग अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके भारवाले उन मयूरेशके भारसे अत्यन्त पीड़ित हो गया, भला वह कैसे उस भारको सहन कर सकता था?॥ २७॥ उन मयूरेशने उस शेषनागको अपनी कमरमें वैसे ही बाँध लिया, जैसे बालक क्रीडा करता हुआ अपनी कमरमें रस्सी बाँध लेता है। तदनन्तर युद्धकी इच्छा करनेवाले वे सभी नाग उन मयूरेशके समीपमें आये॥ २८॥ विघ्नराज मयूरेशने अपने हुंकारमात्रसे उन्हें गिरा डाला। कुछ सर्पोंको विभु मयूरेशने अपने मस्तकमें बाँध लिया और कुछको अपने कानोंमें लपेट लिया। तदनन्तर शेषनाग अत्यन्त थक गया और उसने गुणेश्वरकी स्तुति करनी प्रारम्भ की॥ २९१/२॥ शेषनाग बोला—[हे प्रभो!] आपके यथार्थ स्वरूपको न तो ब्रह्मा आदि देवता जानते हैं और न मुनिगण ही जानते हैं॥ ३०॥ आप ही इस विश्वकी सृष्टि करते हैं, आप ही इसकी रक्षा करते हैं और इसके संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप नाना अवतारोंको धारण करनेवाले हैं और अनेकों दैत्योंका मर्दन करनेवाले हैं॥ ३१॥ आप ही सबके साक्षी हैं, आप ही सबके अन्तर्यामी