भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 513, कुल 656 में से

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पृष्ठ 513

क्री०ख०-अ०१००] * नागलोकमें नागकन्याओंद्वारा मयूरेश्वरका स्वागत-सत्कार * ५११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

और न कुछ खाया ही है। अब आजके बाद तुम उस | देखकर उनका आलिंगन करनेके अनन्तर उनसे पूछा कि मयूरेश्वरके साथ कहीं नहीं जाओगे ॥ ६१ १/२ ॥ | तुमने वनमें क्या भोजन किया था? तुम्हारे वियोगसे ब्रह्माजी बोले-बालकोंको इस प्रकारसे भलीभाँति | उत्पन्न दुःखके कारण मैंने कुछ भी नहीं खाया है। हे समझाकर माताओंद्वारा अपने-अपने बालकोंका आलिंगन | वत्स ! दूधसे भरे हुए मेरे स्तनोंका पान करो और भलीभाँति किया और अत्यन्त सुखका अनुभव किया॥ ६२ ॥ | भोजन करो। तदनन्तर माताने जो-जो कहा, गुणेश्वरने उन शिवा पार्वतीने भी मयूरेशको सामने आया हुआ | सभी (बातों)-का पालन किया ॥ ६३-६४॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'बालचरितमें अश्वासुरके वधका वर्णन' नामक निन्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९९ ॥

सौवाँ अध्याय नागलोकमें नागकन्याओंद्वारा मयूरेश्वरका स्वागत-सत्कार, नागराज वासुकिको मयूरेश्वरद्वारा आभूषणके रूपमें धारण करना, सर्पों तथा मयूरका युद्ध, शेषनागको आभूषणके रूपमें धारण करना, शेषनागद्वारा मयूरेशकी स्तुति, शेषनागद्वारा सम्पाती आदिको बन्धन- मुक्त करना, मयूरेश्वरका नागलोकसे धरतीपर आना, बगासुरसे बालकोंको मुक्त कराकर वापस घरमें आना और अपनी माया दिखाना

ब्रह्माजी बोले-सम्पूर्ण विश्वके स्वामी और | वह सब आप यहाँ ग्रहण करें। आप कुछ दिनोंतक यहाँ अनेक स्वरूप धारण करनेवाले भगवान् मयूरेश अत्यन्त | ठहरनेके अनन्तर ही अपने घरको जायँ ॥ ६ ॥ सौन्दर्यसम्पन्न स्वरूपवाले थे। नागकन्याएँ उनके साथ | मयूरेश बोले-मैं तुम सबकी अभिलाषाको अवश्य आनन्दक्रीड़ा करनेके लिये उन्हें अपने घर नागलोकमें ले | पूर्ण करूँगा, परंतु मेरी माता पार्वती मेरी प्रतीक्षा कर रही गयीं और वहाँ उन्होंने बहुत विस्तारसे पूजन किया। | हैं, मेरे वियोगके कारण वे अत्यन्त दुखी हैं और कुछ भी उन्होंने सुगन्धित तैलसे उन्हें उबटन लगाकर गरम जलसे | भोजन नहीं ग्रहण कर रही हैं। तुम सब किसकी पुत्रियाँ स्नान कराया ॥ १-२ ॥ | हो, उनका दर्शन मुझे होता तो उचित होता ॥ ७ १/२ ॥ दिव्य वस्त्रों, अलंकारों तथा विविध प्रकारके | ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर नागकन्याओंद्वारा कहा चन्दनोंसे उनकी पूजाकर, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, | कि हे प्रभो! हम उन वासुकि नागकी कन्याएँ हैं, जिनके ताम्बूल तथा सुवर्ण उपचार उन्हें समर्पित किये ॥ ३ ॥ | घरमें ब्रह्मा आदि देवता तथा अन्य मुनिगण सर्वदा आते- तदनन्तर वे नागकन्याएँ दोनों हाथ जोड़कर कहने | जाते रहते हैं और जिनके विषसे उत्पन्न ज्वाला तीनों लगीं-हे प्रभो ! हम लोग धन्य हैं, जो कि आज आपके | लोकोंको दग्ध कर सकती है ॥ ८-९ ॥ उन चरणोंका हमने दर्शन किया है, जिनके दर्शनकी | ब्रह्माजी बोले-ऐसा कहनेके अनन्तर उन अभिलाषा ब्रह्मा आदि देवता भी रखते हैं ॥ ४ ॥ | गुणेश्वरको आगे करके वे कन्याएँ पिता वासुकिके पास आज यह नागलोक अत्यन्त धन्य हो गया है, हम | पहुँचीं। नागराज वासुकि अनेक नागोंसे समन्वित थे और लोगोंका जीवन जीना सफल हो गया है। आज हमारे | एक अत्यन्त प्रदीप्त रत्नमय सिंहासनपर विराजमान थे। मनके आनन्द-सरोवरमें निमग्न होनेसे उसका सन्ताप | वे करोड़ों सूर्योंकी आभासे कान्तिमान् थे, रत्नोंकी सर्वथा दूर हो गया है ॥ ५ ॥ | मालासे सुशोभित हो रहे थे, अपने सिरमें स्थित हे देव मयूरेश ! आपको जो-जो भी अभीष्ट हो, | मणिरत्नकी किरणोंसे वे समस्त दिशाओंको प्रकाशित