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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 656 में से

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पृष्ठ 511

क्री०ख०-अ०१९ ] * नौवें वर्षमें गुणेश्वरका बालकोंके साथ जलक्रीडा करना * ५०९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] कैसे हो गये, तदनन्तर कुछ निराश-से हुए वे मुनियोंके बालक उनसे कहने लगे— हे प्रभो ! कहाँ तो हम दो हाथ- वाले और कहाँ आप बल तथा ओजसे सम्पन्न असंख्य भुजाओंवाले भुवनेश्वर। पुनः वे सभी कुछ रुष्ट-से होकर उन मयूरेशके ऊपर जल फेंकने लगे ॥ २३-२४ ॥ तदनन्तर अनन्त स्वरूप धारण करनेवाले वे गणनायक मयूरेश अपने तेजके प्रभावसे एक-एक बालकके सामने छः भुजावाला होकर उन सभीको जलसे सींचने लगे। दूसरे ही क्षण वे मयूरपर आरूढ़ होकर चार आयुधोंवाले रूपमें दिखायी दिये। तब उन बालकोंने दोनों हाथ जोड़कर उन देव गुणेश्वरको प्रणाम किया ॥ २५-२६ ॥ तदनन्तर उन्होंने उन गुणेश्वरके मुखके भीतर सभी स्वर्गोंसे समन्वित विश्वको देखा। इसके साथ ही गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों, नदियों, समुद्रों, वृक्षों और देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसे युक्त समस्त चराचर विश्वका दर्शन किया। इस प्रकारका दृश्य देखकर वे बालक भयसे व्याकुल हो उठे और उन प्रभुकी इस प्रकार प्रार्थना करने लगे ॥ २७-२८ ॥ बालक बोले— हे अखिल विश्वके स्वामी ! इस समय हम न अपनेको जान पा रहे हैं और न किसी दूसरेको ही जान पा रहे हैं, हे विभो ! हमपर कृपा करके आप एक रूपवाले हो जायँ ॥ २९ ॥ ब्रह्माजी बोले— उन सबकी इस प्रकारकी प्रार्थनाको सुनकर वे प्रभु अपने पूर्ववत् स्वरूपमें हो गये। इसी समयकी बात है, वहाँ कुछ नागकन्याएँ क्रीड़ा करने लगीं। जिनको देख लेनेमात्रसे आठ प्रकारकी नायिकाएँ अत्यन्त लज्जित हो उठती थीं और जिनके नेत्रोंको देखकर हरिणियाँ अत्यन्त लज्जित होकर भाग जाती थीं ॥ ३०-३१ ॥ उनका शरीर अतिसुन्दर था, वे सभी प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित थीं, वे मयूरेशको देखकर कामाग्निसे जलती हुई अत्यन्त विह्वल हो उठीं ॥ ३२ ॥ वे सभी नागकन्याएँ एक साथ कहने लगीं कि यदि ये हमारे स्वामी हो जाते तो हमारा जन्म लेना सफल हो जाता, हमारा जीवन सफल हो जाता और हमारी

[दायाँ स्तम्भ] तरुणावस्था भी सफल हो जाती ॥ ३३ ॥ तब उन्होंने धैर्य धारणकर उन गुणेशसे पूछा— आपका आगमन कहाँसे हुआ है, आपके मुखमण्डलको देखकर हम लोगोंके चित्तमें अत्यन्त व्याकुलता हो उठती है। हे नरश्रेष्ठ ! आप अपने शरीरका सम्पर्क कराकर हमारे चित्तको शान्ति प्रदान कीजिये ॥ ३४ १/२ ॥ देव गुणेश बोले— मैं भगवान् शिवका पुत्र हूँ और मेरा 'मयूरेश' यह नाम विख्यात है। मुनियोंके बलवान् बालकोंने मुझे सरोवरमें डुबा दिया था, संयोगवश मुझे आपके चरणकमलोंका दर्शन हुआ है ॥ ३५-३६ ॥ वे नागकन्याएँ बोलीं— आप हमारे घरमें क्षणभर ठहरकर विश्राम करनेकी कृपा करें ॥ ३६ १/२ ॥ देव गुणेश बोले— चूँकि मेरे वियोगमें मेरी माता पार्वती अत्यन्त दुखी हो उठेंगी, अतः मैं आपके स्थानपर नहीं आऊँगा। आप सभी नागकन्याएँ वापस चली जायँ ॥ ३७ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— वे ऐसा कह ही रहे थे कि उसी समय वे नागकन्याएँ उन्हें पकड़कर अपने घरोंको ले चलीं। उस समय पुनः उन गुणेशको न देखकर वे सभी मुनिबालक शोक करने लगे ॥ ३८ १/२ ॥ बालक बोले— दयालु होनेपर भी आज वे गुणेश्वर न जाने क्यों निष्ठुर हो गये हैं? ॥ ३९ ॥ अमृतवर्षिणी किरणोंवाला चन्द्रमा कभी भी उष्णताको प्राप्त नहीं होता, अपराधी होनेपर भी पिता अपने पुत्रोंका परित्याग नहीं करता। आप कहाँ चले गये हैं, आपके बिना हमारे प्राण चले जायँगे ॥ ४० १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— इस प्रकारसे कहते हुए कुछ बालक भूमिपर गिर पड़े। कुछ अपना सिर पीटने लगे और कुछ बालक अपने आश्रमको चल पड़े। मार्गमें उन बालकोंने गुणेश्वरके चरणकमलोंका चिह्न देखा तो उन्होंने उन पदचिह्नोंको प्रणाम किया और वे रो पड़े। उसी समय उन बालकोंने एक भगासुर नामक दैत्यको देखा ॥ ४१-४२ ॥ उस दैत्यके बालोंके आघातसे आकाशमण्डलके ग्रह-नक्षत्र जमीनपर गिर जाते थे। उसके पैर सौ