श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 510, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
हुए थे। कुछ बालक चँवर डुला रहे थे, उनके दर्शनसे बालकोंको महोत्सवकी प्रतीति हो रही थी। क्रीडा करते हुए वे सभी एक सरोवरके पास जा पहुँचे, जो पाँच योजन विस्तारवाला था ॥ ३-४॥ वह सरोवर अगाध जलवाला था और मगर, मत्स्य, कछुआ तथा मेढकोंसे समन्वित था। वह चारों ओरसे लताओं तथा वृक्षोंसे घिरा हुआ था, वहाँ नाना प्रकारके पक्षीगण रहते थे। कुछ बालक उछलकर उस सरोवरके जलमें कूद पड़े और कुछ धीरे-धीरे उस सरोवरके जलमें उतरे। उस सरोवरके तटप्रदेशपर फलोंसे लदा हुआ एक विशाल आमका वृक्ष देखकर मयूरेश उसपर चढ़ गये और अन्य बालक भी आमके फलोंको खानेकी इच्छासे उसपर चढ़े ॥ ५-६१/२ ॥ आमके फलोंके द्वारा वे बालक परस्परमें एक- दूसरेको मारते हुए इस प्रकारसे क्रीड़ा करने लगे कि किसीका अंग-भंग न हो। इस क्रीड़ामें पलायित कुछ बालक उस वृक्षकी डालियोंको तोड़ते हुए उस सरोवरके जलमें गिर रहे थे। इस प्रकार वे सब खेल खेल ही रहे थे कि एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा, वह घोड़ेका रूप बनाया हुआ था ॥ ७-८॥ उस दैत्यके पावोंके प्रहारसे पर्वत भी चूर-चूर हो जाते थे और उसके हिनहिनानेके शब्दसे तीनों लोक काँप उठते थे। वह अपनी पूँछकी चंचलतासे अनेक प्राणियोंको मार डालता था। अश्वरूपी वह दैत्य उस आमके वृक्षके तनेपर अपने कन्धेको रगड़ने लगा। उस दैत्यके [दारुण] गर्जनसे वृक्षके कम्पित हो जानेपर बालक गुणेश गिर पड़े ॥ ९-१०॥ जब गुणेश वृक्षसे सरोवरके जलमें गिर पड़े तो कुछ बालक भयभीत होकर भाग गये और वृक्षसे गिरनेसे कुछ बालकोंके सिर फूट गये, कुछ बालक जल्दी- जल्दी उस वृक्षसे उतरने लगे ॥ ११॥ जब गुणेशको जलके भीतर रहते हुए दो मुहूर्तका समय व्यतीत हो गया, तो वे सभी मुनिबालक रोने लगे। वे आपसमें कहने लगे कि हम माता उमासे क्या कहेंगे और कैसे उन्हें अपना मुख दिखलायेंगे ? ॥ १२॥
भगवान् शंकर भी क्रुद्ध होकर हमें भस्म कर डालेंगे। सरोवरके इस अगाध जलके भीतर प्रवेश करनेमें हम समर्थ नहीं हैं। वे गुणेश तो हमारे माता-पिता, पालन करनेवाले, भाई, रक्षा करनेवाले तथा सखा हैं॥ १३१/२॥ ब्रह्माजी बोले-वे बालक इस प्रकार जब शोक कर रहे थे, उसी समय मयूरेशने उस अश्वरूपी दैत्यके दोनों कान पकड़ लिये और उसे जलके भीतर खींचा। वे बलवान् प्रभु मयूरेश बलपूर्वक उस दैत्यके ऊपर आरूढ़ हो गये और अपने भारसे उस दैत्यको बार-बार जलके भीतर डुबाने लगे ॥ १४-१५ ॥ वह अश्वरूपी दैत्य अपने नेत्रोंसे तथा मुखसे बार- बार बहुत-सा जल उगलने लगा। उसके कानोंमें तथा श्वासमार्गमें जल भर गया और भीषण शब्द करते हुए उसने प्राण त्याग दिये। मयूरेशने अपने एक हाथसे पकड़कर हिला-डुलाकर उस दैत्यको जलसे बाहर फेंक दिया। यह देखकर वे सभी बालक अत्यन्त हर्षित हो गये और बार-बार नृत्य करने लगे ॥ १६-१७॥ उन्होंने उस महान् दैत्यको भूमिपर सौ टुकड़ोंमें विभक्त हुआ देखा। उन सभी बालकोंने महान् बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न उन मयूरेशकी प्रशंसा की। तदनन्तर वे सभी उन देव मयूरेशसे कहने लगे-हम आपको मृत जानकर बहुत रोने लगे, किंतु तभी हमने दैत्यको मारकर सरोवरसे बाहर आते हुए आपको देखा ॥ १८-१९॥ इसके अनन्तर वे सभी बालक उस सरोवरके जलमें प्रविष्ट होकर अपनी-अपनी अंजलिमें जल भरकर पुनः एक-दूसरेको भिगोने लगे। तदनन्तर उन सभीने एक साथ ही गणनायक मयूरेशको जलसे उसी प्रकार भिगो डाला, जैसे कि वर्षाकालमें मेघ पृथ्वी तथा पर्वतोंको भिगो डालते हैं ॥ २०१/२ ॥ अपनी छः भुजाओंके द्वारा भी जब वे मयूरेश उन बालकोंको भिगोनेमें सफल न हो सके, तब उन्होंने उन बालकोंपर अपने असंख्य हाथोंसे जल छिड़का। उस समय उस प्रकारका आश्चर्य देखकर वे सभी बालक परस्परमें एक-दूसरेसे कहने लगे ॥ २१-२२ ॥ ये छह भुजाओंवाले मयूरेश असंख्य भुजाओंवाले