भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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पृष्ठ 509

क्री०ख०-अ०९९] * नौवें वर्षमें गुणेश्वरका बालकोंके साथ जलक्रीडा करना * ५०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गुणेशकी स्तुति करनी प्रारम्भ की॥ ३७-३८१/२ ॥ विनता बोली-[हे प्रभो!] आप रजोगुणका आश्रय लेकर सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा हैं, सत्त्वगुणका आश्रय लेकर आप ही सृष्टिका पालन करनेवाले विष्णु हैं और तमोगुणका आश्रय लेकर सृष्टिका संहार करनेवाले शंकर भी आप ही हैं। जब आपके सगुण स्वरूपको भी यथार्थ रूपमें देवता अथवा ऋषिगण नहीं जान पाते, तो फिर चराचर जगत्‌के एकमात्र गुरु आपके निर्गुण स्वरूपको कौन जान सकता है? ॥ ३९-४०१/२॥ इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर भक्तिपरायण वह विनता उन्हें प्रणाम करते हुए बोली। [हे देव!] आप मुझे मुनि कश्यपकी भार्या विनता समझें, उन महर्षिका पुत्र यह मयूर आपका सेवक होगा॥ ४१-४२॥ मुनि कश्यपजीने पूर्वमें मुझसे कहा था कि जो तुम्हारे गर्भरूप अण्डका भेदन करेगा, वही इसका स्वामी होगा और वही तुम्हारे पुत्रोंको बन्धनसे मुक्त करायेगा- इसमें कोई संदेह नहीं है। बहुत समयतक प्रतीक्षा करनेके अनन्तर मुझे आपके चरणकमलोंका दर्शन हुआ है, कद्रूके पुत्रोंके द्वारा मेरे जटायु, बाज तथा सम्पाती नामके तीन पुत्रोंका हरण हुआ है। हे जगन्नाथ! आप मेरे उन तीनों पुत्रोंको बन्धनमुक्त करके मुझे उनका दर्शन शीघ्र करानेकी कृपा करें॥ ४३-४४१/२॥ गुणेश बोले-हे माता! आप चिन्ता न करें, मैं आपको आपके पुत्रोंका दर्शन अवश्य कराऊँगा॥ ४५॥ ब्रह्माजी बोले-विनतासे इस प्रकार कहनेके अनन्तर अत्यन्त हर्षसे समन्वित होकर गुणेश्वरने मयूरसे कहा-तुम मुझसे वर माँगो ॥ ४६ ॥ मयूर बोला-हे सर्वेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो मेरा 'मयूर' यह नाम आपके नामके आगे लगकर संसारमें प्रसिद्धिको प्राप्त हो जाय। आप यह वर मुझे प्रदान करें और अपनी दृढ़ भक्ति भी मुझे प्राप्त करायें॥ ४७१/२॥ देव गुणेश बोले-अपने मनमें किसी भी प्रकारका लोभ न रखनेवाले तुम्हारे द्वारा बहुत ही सुन्दर और अच्छी बातें कही गयी हैं, तुम्हारा मयूर यह नाम मेरे नामके पूर्वमें लगेगा और तब 'मयूरेश्वर' मेरा यह नाम तीनों लोकोंमें विख्यात होगा और मुझमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति होगी ॥ ४८-४९॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे वह सब सुनकर विनता अपने आश्रममें चली गयी और मयूरपर आरूढ़ होकर मयूरेश्वर गुणेश भी अपने घरको गये ॥ ५० ॥ 'मयूरेश, मयूरेश, मयूरेश'-इस प्रकारसे नामका बार-बार उच्चारण करते हुए उन मुनिबालकोंसे समन्वित होकर और सभी दिशाओंको सुशोभित करते हुए गुणेश्वर जा रहे थे। उन्होंने माता पार्वतीको प्रणामकर शीघ्र ही सम्पूर्ण वृत्तान्त उनको निवेदन कर दिया, इधर मयूरेशकी महिमाका गुणगान करते हुए मुनियोंके बालक अपने-अपने घरोंको गये। इस प्रकार इन गुणेश्वरने 'मयूरेश' यह नाम प्राप्त किया ॥ ५१-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शिखण्डिवरप्रदान' नामक अठानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९८ ॥ निन्यानबेवाँ अध्याय नौवें वर्षमें गुणेश्वरका बालकोंके साथ जलक्रीडा करना, गुणेशद्वारा अश्वरूपी दैत्यका वध, नागकन्याओंका गुणेशको नागलोक ले जाना, भगासुर नामक दैत्यके वधकी कथा ब्रह्माजी बोले-गुणेश्वरने नौवें वर्षकी अवस्थामें एक अद्भुत कार्य किया। एक बार वे अपने वाहन मयूरपर विराजमान होकर चारों हाथोंमें पाश, अंकुश, पद्म और परशु-इन चार आयुधोंको धारणकर बालकोंके साथ क्रीड़ाके लिये निकल पड़े। उस समय उन्होंने विविध अलंकार धारण किये हुए थे, वे मृगकी नाभिसे प्राप्त होनेवाली कस्तूरीका तिलक लगाये हुए थे और उन्होंने दिव्य वस्त्रोंको धारण किया हुआ था॥ १-२॥ पूर्णिमाके चन्द्रमाकी कान्तिके समान वे सुशोभित हो रहे थे, श्रीसम्पन्न वे गुणेश्वर बालकोंके द्वारा जय- जयकारके साथ स्तुत हो रहे थे। कुछ बालक उनको प्रणाम कर रहे थे और कुछ उनका छत्र और ध्वज पकड़े