श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 489, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०९२] * चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध * ४८७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वैसे ही वह दैत्य आकाशमें उड़कर भूमिपर गिर पड़ा। उस दैत्य शैलके हजारों टुकड़े हो गये, उसने गिरते समय अनेकों वृक्षोंको चूर-चूर कर डाला ॥ ६० ॥ तदनन्तर वे मुनिगण कहने लगे- हे गुणेश्वर ! आपको साधुवाद है, साधुवाद है। आपने हमारा अरिष्ट दूर कर दिया है, आपकी कृपासे अब हम अपने-अपने आश्रममें सुखपूर्वक रह सकेंगे और अपने-अपने नित्यकर्मोंको पूर्ववत् पुनः कर सकेंगे ॥ ६१ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर उन्हें प्रणाम करके और उनसे अनुमति लेकर तथा उनका पूजन करके वे सभी मुनिगण चले गये ॥ ६२ ॥ देवी पार्वतीने उन गुणेशको लेकर अपने भवनमें प्रवेश किया, उनकी सखियाँ तथा मुनिपत्नियां भी उनकी आज्ञा लेकर अपने घरोंको गयीं। जो मनुष्य इस आख्यानका श्रवण करता है, वह सर्वत्र सुख, दीर्घ आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य तथा सर्वत्र विजय प्राप्त करता है ॥ ६३-६४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कूटासुर, मत्स्यासुर तथा शैलासुरके वधका वर्णन' नामक इक्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९१ ॥ बानबेवाँ अध्याय चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध, गुणेशद्वारा माता पार्वतीको अपने मुखके भीतर समस्त विश्वका दर्शन कराना, माताद्वारा गुणेशकी स्तुति ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] तदनन्तर किसी दिनकी बात है, जिस समय प्रातःकाल चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेश सोये हुए थे और देवी पार्वती शीघ्रतापूर्वक स्नान करके शिवलिंग-पूजा कर रही थीं ॥ १ ॥ वे अपने बायें हाथमें भगवान् शिवका पार्थिव लिंग रखकर उस श्रेष्ठ लिंगकी दाहिने हाथसे पूजा कर रही थीं। उसी समय बालक गुणेश जग गये और रोने लगे तथा स्तनपान करानेका हठ करने लगे ॥ २ ॥ तब माताने 'क्षणभर रुक जाओ-क्षणभर रुक जाओ'- इस प्रकार कहते हुए उन्हें रोका तो रुष्ट होकर बालक गुणेशने अपने हाथके प्रहारसे माताके हाथमें रखे पार्थिव लिंगको नीचे गिरा दिया ॥ ३ ॥ माताने भी अत्यन्त रुष्ट होकर बालकको हाथसे मारा। तब बालक गुणेशने भी क्रुद्ध होते हुए पुनः समीपमें आकर माताकी अंगुलिमें जोरसे दाँतसे काट लिया ॥ ४ ॥ 'मुझे छोड़ो-मुझे छोड़ो'- यह कहते हुए वे बोलीं- 'मेरे प्राण निकल जायँगे।' तब दाँत काटी हुई अंगुलिको छोड़कर बालक गुणेश दूर भाग गये ॥ ५ ॥ माता पार्वतीकी अँगुलीसे बहुत-सा रक्त भूमिपर उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे कि जोरसे चोट करनेपर मदारके वृक्षसे दूध निकलकर गिरने लगता है ॥ ६ ॥ तब माता पार्वती एक छड़ी लेकर पुत्र गुणेशको मारनेके लिये दौड़ीं। उन्होंने दौड़कर बालकको पकड़ लिया। उस समय उन्होंने बालकको भगवान् शिवके स्वरूपवाला देखा ॥ ७ ॥ उनके पाँच मुख थे, दस भुजाएँ थीं, तीन नेत्र थे, वे शेषनागसे सुशोभित थे। उन्होंने त्रिशूल, डमरु, भस्म तथा रुण्डोंकी माला धारण की हुई थी ॥ ८ ॥ वे हस्तिचर्म तथा व्याघ्रचर्म पहने हुए थे और उनके मस्तकपर चन्द्रमा सुशोभित था। यह देखकर पार्वती लज्जित हो गयीं। उन्होंने छड़ीको फेंक दिया और वे शिवा मुख नीचेकर खड़ी हो गयीं ॥ ९ ॥ उस समय वे न तो आगे बढ़ सकीं और न वापस भवनको जानेमें ही समर्थ हो पा रही थीं। उनकी चिन्ताको समझकर भगवान् गुणेश [शिवरूपको त्यागकर] पुनः बालकके स्वरूपमें हो गये ॥ १० ॥