श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 488, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उसका घमण्ड चूर-चूर हो गया ॥ ३८-३९ ॥ तदनन्तर वह मत्स्यरूपधारी दैत्य जलके अन्दर चला गया, मत्स्यरूपधारी उमापुत्र वे गुणेश भी उसके पीछे-पीछे जलके अन्दर चले गये। वह दैत्य जहाँ-जहाँ जाता, वे गुणेश भी वहीं-वहीं उसके पीछे जाते ॥ ४० ॥ उस दैत्यको कहीं छिपा हुआ जानकर मत्स्यरूपी गुणेशने अपनी पूँछसे उसपर प्रहार किया और वे उसकी पूँछको अपने मुखसे पकड़कर वहाँसे बाहर निकल पड़े। तदनन्तर गुणेशने उसे अपने भारसे दबाकर चूर-चूर कर दिया। अपने मुखसे रक्त बहाता हुआ और महान् चीत्कार करता हुआ वह दैत्य प्राणहीन हो गया, तब गुणेशने उसे छोड़ दिया ॥ ४१-४२ ॥ उस दैत्यके द्वारा की गयी भयंकर ध्वनिने तीनों लोकोंको प्रकम्पित कर डाला। तदनन्तर वे गुणेश जलसे बाहर आ गये। उस समय देवी पार्वती ने उनका आलिंगन किया। आनन्दमें निमग्न पार्वती ने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्तनपान कराया और वे कहने लगीं—मुझसे पूछे बिना तुम बालकोंके साथ कहाँ चले गये थे ? ॥ ४३-४४ ॥ तुम्हारे ऊपर जो-जो भी विघ्न आता है, वह सौभाग्यवश महर्षिद्वारा किये गये रक्षा-विधानके द्वारा और जगदीश्वर भगवान् शम्भुकी कृपासे विनष्ट हो जाता है। तुम इतने चंचल क्यों हो गये हो, मैं तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ ? हे प्रिय पुत्र ! तुम्हारे वियोगमें तो मेरे प्राण ही निकल जायँगे ॥ ४५-४६ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर मुनिगणोंने कहा—हे प्रभो ! आपके बिना हम बड़े ही दुखी थे, अब इस समय आपका दर्शन प्राप्तकर हमें पहले-जैसा ही आनन्द प्राप्त हो रहा है। तदनन्तर सभी मुनियों, देवी पार्वतीकी सखियों तथा अन्य स्त्रियोंने भी अनेक प्रकारके द्रव्योंसे उनका पूजन किया, फिर गुणेशको प्रणाम करके वे सभी उनकी प्रार्थना करने लगे ॥ ४७-४८ ॥ हे देवेश्वर ! हम सब आपके शरणागत हैं, आप हमारा परित्याग न करें। इसके बाद देवी उमा बालक गुणेशको लेकर अपने श्रेष्ठ स्थानपर चली गयीं ॥ ४९ ॥ इसके साथ ही सभी गण, सखियाँ तथा मुनिजन हर्षसे निमग्न हो अपने स्थानोंको चल पड़े। उसी समय मार्गमें एक शैल नामक महाबली दूसरा दैत्य आ पहुँचा। वह दैत्य सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला, मगरमच्छके समान कठोर शरीरवाला और वज्रको भी विनष्ट कर देनेवाला था। उसकी शब्दध्वनिसे क्षणभरमें ही पर्वत विदीर्ण हो जाते थे ॥ ५०-५१ ॥ आकाशको छूता हुआ वह रास्ता रोककर सहसा खड़ा हो गया। उसका मस्तक दो योजन विस्तृत था और वह नीचेकी ओर बारह योजन लम्बा था ॥ ५२ ॥ उस दैत्य शैलके विस्तृत शरीरमें सरोवर, वृक्ष तथा लताएँ सुशोभित थीं और वहाँ सिंह, शार्दूल, हाथी, यक्ष तथा राक्षस विचरण किया करते थे ॥ ५३ ॥ इस प्रकारके उस शैल दैत्यको देखकर वे सभी मुनिगण, स्त्रियाँ आदि विह्वल हो गये और कहने लगे कि यह कौन-सा विघ्न आ खड़ा हुआ। उस समय देवी पार्वती भी उनके पास खड़ी हो गयीं और तब वे सब मुनिगण भी वहीं खड़े हो गये ॥ ५४ ॥ तदनन्तर वे मुनिगण बोले—हम अपनी स्त्रियोंको तथा सन्तानोंको कब देखेंगे? देव गुणेश अब कब यहाँ पराक्रम दिखलायेंगे ? ॥ ५५ ॥ हम लोगोंका होम तथा तर्पण-श्राद्ध आदि करनेका यह समय व्यर्थ ही चला जायगा। तब देवी गौरी उन सबसे बोलीं—आपलोग दुःख न करें। इस समय मुझे भी शंकरकी चिन्ता हो रही है ॥ ५६१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—उन सभीके वचनोंको सुनकर अत्यन्त बुद्धिमान् गुणेशने तत्क्षण विराट्रूप धारण किया और अपने श्वासकी फूँकमात्रसे उस दैत्य शैलको दूर पछाड़ दिया, वे मुनिगण भ्रमित हो जानेके कारण गुणेशके [विराट्] स्वरूपको देख न सके ॥ ५७-५८ ॥ उस समय गुणेशके श्वासके संयोगसे वह दैत्य शैल आकाशमण्डलमें चक्कर काटने लगा। यह सब देखकर वे सभी मुनिगण आश्चर्यचकित हो गये और गुणेशकी प्रशंसा करने लगे ॥ ५९ ॥ जिस प्रकार आँधी किसी पत्तेको उड़ा डालती है,