श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 487, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१९ ] * बालक गुणेशद्वारा दैत्योंके वधकी लीला-कथा * ४८५
[बायाँ स्तम्भ]
मुनिके आश्रममें पहुँच गये। वहाँपर विद्यमान एक योजन विस्तारवाले एक सरोवरमें जाकर वे क्रीड़ा करने लगे। पूर्वकी भाँति पुनः दो भागोंमें बँटकर अपने-अपने हाथकी अंजलिमें जल लेकर एक-दूसरेपर उछालने लगे। वे कभी जलमें गोते लगाकर, पुनः किसी दूसरेके कन्धेपर चढ़कर उसे बलपूर्वक जलमें डुबो दे रहे थे॥ १९-२०॥ उसी समयकी बात है, एक दैत्य मत्स्यका रूप धारणकर उन सभीके साथ वैसी ही क्रीड़ा करने लगा। वे बालक अपने हाथोंके आघातसे उस सरोवरके जलको छपछपाने लगे और वह भी अपनी पूँछके द्वारा उनपर जल छिड़कने लगा। उस सरोवरके कलुषित जलकी लहरें बार-बार तटपर टकरा रही थीं। सरोवरके किनारेपर स्थित पार्वतीपुत्र गुणेशको देखकर वह मत्स्य उनके समीपमें गया॥ २१-२२॥ उसने अपना मुख फैलाया और गुणेशके दोनों पैरोंको अपने मुखमें भर लिया और फिर 'दौड़ो-दौड़ो' इस प्रकारसे चिल्लाते हुए उन गुणेशको वह खींचते हुए सरोवरके गहरे जलमें ले गया॥ २३ ॥ वह मत्स्यरूपी महादैत्य उन गुणेशको लेकर बहुत समयतक जलमें निमग्न रहा। गिरिजापुत्र गुणेशको जलमें डूबा हुआ देखकर मुनियोंके बालक रोने लगे ॥ २४॥ वे अपने हथेलीके पृष्ठभागको अपने होठोंसे लगाकर हाहाकार करने लगे। कुछ बालकोंने उस सरोवरमें डुबकी भी लगायी, किंतु वहाँ उन्होंने उस बालकको नहीं देखा। पार्वतीके द्वारा पीटे जानेके भयसे भयभीत कुछ बालक भाग खड़े हुए। उनमेंसे कुछ बालकोंने पार्वतीके पास जाकर उस बालकके सरोवरमें डूबनेका समाचार उन्हें बताया कि खेल रहे हम सभी बालकोंको छोड़कर बालक गुणेशको लेकर एक मत्स्य जलमें चला गया॥ २५-२६१/२॥ ब्रह्माजी बोले- बालकोंका वचन सुनकर गौरी मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ीं। एक मुहूर्तके अनन्तर जब चेतनाको प्राप्त हुईं तो रोती हुई बाहर निकल पड़ीं। उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू निकल रहे थे, मस्तकपरसे
[दायाँ स्तम्भ]
आँचल गिर गया था॥ २७-२८॥ वे लड़खड़ाती तथा लम्बी श्वास लेती और भूमिपर गिरती हुई जा रही थीं। कुछ सखियाँ अपना काम-धाम छोड़कर शीघ्र ही उनके पीछे दौड़ पड़ीं॥ २९॥ देवी पार्वती अपनी सखियोंके साथ शीघ्र ही वहाँ पहुँच गयीं। मुनिगण भी वह समाचार पाकर सरोवरकी ओर चल पड़े ॥ ३०॥ उनमेंसे कुछने अगाध जलमें गोता लगाया, किंतु वे उमापुत्र गुणेशको खोज नहीं पाये। कुछ मुनियोंने गुणेशकी मातासे कहा- हमारे बालकोंने जलमें डुबकी लगायी, किंतु उन्होंने मत्स्यके उदरमें प्रविष्ट आपके बालकको नहीं देखा। उनके वचनोंको सुनकर गौरीने पुनः रोना आरम्भ कर दिया॥ ३१-३२॥ उमा बोलीं- उस सर्वांगसुन्दर बालकको देखे बिना मेरे प्राण निकल जायँगे। मैंने बड़े ही कष्टसे उस अत्यन्त पराक्रमी ईश्वरको प्राप्त किया है। वह समस्त चराचर जगत्का गुरु है, मायासे परे है, परम मायावी है, अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंका नायक है और विश्वकी सृष्टि करनेवाला है॥ ३३-३४॥ ऐसा कहते हुए वे अपने हाथसे बार-बार अपना माथा और वक्षःस्थल पीटने लगीं। उस प्रकारसे विलाप करती हुई उन पार्वतीको देखकर मुनिगण भी रोने लगे। तदनन्तर उन दयालु देव गुणेशने उनके कारुणिक वचन सुनकर स्वयं भी मत्स्यका रूप धारण कर लिया। तदनन्तर मत्स्यरूपधारी गुणेश और मत्स्यरूपधारी दैत्यमें परस्पर युद्ध होने लगा ॥ ३५-३६ ॥ उन दोनोंके परस्पर आघातसे जलचर जीव मरकर तटपर गिर रहे थे। वे दोनों दाँतोंसे एक-दूसरेको काट रहे थे और पूँछके आघातसे एक-दूसरेपर प्रहार कर रहे थे॥ ३७॥ वे अपने-अपने पेटसे पेटपर तथा पीठसे पीठपर मार रहे थे। इस प्रकार बहुत देरतक बलपूर्वक भयंकर युद्ध करके मत्स्यरूप धारण किये गुणेशने बड़े जोरसे अपने मुखसे उसके मुखपर आघात किया। उस प्रबल आघातसे उसका मुख फूट गया, आँखें फूट गयीं और