भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 656 में से

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पृष्ठ 482

४८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] इसी समय बालक गुणेशने आजगर नामक एक दैत्यको देखा। वह दैत्य अपने नेत्रोंसे आगकी चिनगारियाँ बरसा रहा था। उसका शरीर वज्रसारके समान कठोर था। वह अपनी जिह्वा लटकाये हुए था। उसका शरीर बहुत विशाल था। वह ऐसा दिखायी पड़ रहा था, मानो महान् पर्वतको निगल रहा हो। वह एक बहुत बड़े वृक्षके नीचे बैठा हुआ था और अपनी दोनों जिह्वाओंको बार-बार लपलपा रहा था ॥ ४-५ ॥ बालक गुणेशने बालस्वभाववश रेंगते हुए जाकर उस अजगरको पकड़ लिया। तब उस अजगरने सहसा उन्हें शीघ्र ही अपने मुखके अन्दर भर लिया। उनके मुखके अन्दर प्रविष्ट होते ही उस वायुभक्षी अजगरने अपने दोनों ओठोंको मिला लिया ॥ ६१/२ ॥ जब गौरीने आँगनमें बालक गुणेशको नहीं देखा तो उनका मन अत्यन्त व्याकुल हो गया। वे कहने लगीं—मेरा बालक अभी-अभी यहींपर खेल रहा था, फिर किसने उसका हरण कर लिया और किसीने मार तो नहीं डाला ? वे अत्यन्त शोक करने लगीं और दुःखसे परम आर्त होकर वे अपने सिरको पीटने लगीं ॥ ७-८ ॥ उस समय गणोंने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और कहा हे माता ! आप निराश न हों। उस बालकका प्रभाव सबको विदित ही है, वह सैकड़ों गुना अधिक बलवान् है। उस अजगरके उदरमें प्रविष्ट हुए वे बालक गुणेश बढ़ने लगे, जिससे उस दैत्यकी साँस रुकने लगी। तब वह अजगर अपनी पूँछके अन्तिम भागको हिलाने डुलाने लगा। तदनन्तर उस अजगरकी प्राणवायु रक्तके साथ दोनों नेत्रोंसे बाहर निकल गयी। तब अम्बिकापुत्र गुणेश उसकी देहको चीरते हुए बाहर निकल आये ॥ ९-११ ॥ उस दैत्य अजगरके रक्तसे सने हुए अंगवाले उन गुणेशको देखकर यह लग रहा था कि क्या यह खिला हुआ पलाशका वृक्ष तो नहीं है? तदनन्तर गणोंने अपनी अंगुलिको चाटते हुए उन बालक गुणेशको देखा और वे जोर-जोरसे चिल्लाते हुए पार्वतीसे कहने लगे कि दुष्ट अजगर दैत्यको मार करके ये बालक गुणेश उसके

[दायाँ स्तम्भ] मुखसे बाहर निकल आये हैं ॥ १२-१३ ॥ ब्रह्माजी बोले—उन (गणों)-की बात सुनते ही तत्काल पार्वतीने बालक गुणेशको उठा लिया। जल्दीसे स्नान कराया और उन्हें प्यार करते हुए स्तनपान कराया ॥ १४ ॥ अरे वत्स ! तुम कहाँ चले गये थे ? तुम्हें देखे बिना मुझे तो एक क्षणका समय भी एक वर्षके समान लगता था। तदनन्तर उन्होंने सौ योजन विस्तारवाले अजगरको देखा। वह बड़ा ही दुष्ट था। उसका मुख बड़ा ही भयानक था। वह बहुत-सा रक्त वमन कर रहा था और अनेक वृक्षसमूहों तथा घरोंको गिराते हुए जमीनपर गिरा था ॥ १५-१६ ॥ गौरी बोलीं—इस स्थानपर अभी न जाने कितने दैत्य और राक्षस होंगे। इस बालकके पराक्रमसे कितने ही राक्षस मृत्युको प्राप्त हो चुके हैं। तदनन्तर उन सभी गणोंने उस महान् असुरको दूर ले जाकर फेंक दिया ॥ १७१/२॥ तदनन्तर ग्यारहवें मासकी बात है। देवी पार्वती अपने द्वारपर गयी हुई थीं। वहाँ वे अपनी सखियोंके साथ बालक गुणेशकी बहुत-सी क्रीडाओंको देख रही थीं। वह बालक किसी सखीका मुख चूम रहा था और किसीसे अपना चुम्बन करा भी रहा था ॥ १८-१९ ॥ किसी सखीके पीछे जाकर स्वयं अपने हाथोंसे उसकी दोनों आँखोंको बन्द कर दे रहा था और किसी दूसरे बालककी माताके पास जाकर बलपूर्वक उसके स्तनोंका पान कर ले रहा था। अपना मुख वस्त्रसे ढककर किन्हीं दूसरी स्त्रियोंको डरा दे रहा था। वह गुणेश उनके मुख, केश तथा नासिका और आभूषणोंको खींच दे रहा था। वह अपने तथा पराये जनोंको देखकर तोतली वाणीमें बोल रहा था ॥ २०-२११/२ ॥ इसी समय शलभासुर नामक एक दुष्ट दानव वहाँ आया। वह ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अपराजेय था। उसके स्कन्ध पर्वतके समान ऊँचे थे। उसका विशाल सिर आकाशको भी फोड़ देनेवाला था। वह बादलकी भाँति नीले वर्णका था। उसके नेत्र जपापुष्पके