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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

४८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] इसी समय बालक गुणेशने आजगर नामक एक दैत्यको देखा। वह दैत्य अपने नेत्रोंसे आगकी चिनगारियाँ बरसा रहा था। उसका शरीर वज्रसारके समान कठोर था। वह अपनी जिह्वा लटकाये हुए था। उसका शरीर बहुत विशाल था। वह ऐसा दिखायी पड़ रहा था, मानो महान् पर्वतको निगल रहा हो। वह एक बहुत बड़े वृक्षके नीचे बैठा हुआ था और अपनी दोनों जिह्वाओंको बार-बार लपलपा रहा था ॥ ४-५ ॥ बालक गुणेशने बालस्वभाववश रेंगते हुए जाकर उस अजगरको पकड़ लिया। तब उस अजगरने सहसा उन्हें शीघ्र ही अपने मुखके अन्दर भर लिया। उनके मुखके अन्दर प्रविष्ट होते ही उस वायुभक्षी अजगरने अपने दोनों ओठोंको मिला लिया ॥ ६१/२ ॥ जब गौरीने आँगनमें बालक गुणेशको नहीं देखा तो उनका मन अत्यन्त व्याकुल हो गया। वे कहने लगीं—मेरा बालक अभी-अभी यहींपर खेल रहा था, फिर किसने उसका हरण कर लिया और किसीने मार तो नहीं डाला ? वे अत्यन्त शोक करने लगीं और दुःखसे परम आर्त होकर वे अपने सिरको पीटने लगीं ॥ ७-८ ॥ उस समय गणोंने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और कहा हे माता ! आप निराश न हों। उस बालकका प्रभाव सबको विदित ही है, वह सैकड़ों गुना अधिक बलवान् है। उस अजगरके उदरमें प्रविष्ट हुए वे बालक गुणेश बढ़ने लगे, जिससे उस दैत्यकी साँस रुकने लगी। तब वह अजगर अपनी पूँछके अन्तिम भागको हिलाने डुलाने लगा। तदनन्तर उस अजगरकी प्राणवायु रक्तके साथ दोनों नेत्रोंसे बाहर निकल गयी। तब अम्बिकापुत्र गुणेश उसकी देहको चीरते हुए बाहर निकल आये ॥ ९-११ ॥ उस दैत्य अजगरके रक्तसे सने हुए अंगवाले उन गुणेशको देखकर यह लग रहा था कि क्या यह खिला हुआ पलाशका वृक्ष तो नहीं है? तदनन्तर गणोंने अपनी अंगुलिको चाटते हुए उन बालक गुणेशको देखा और वे जोर-जोरसे चिल्लाते हुए पार्वतीसे कहने लगे कि दुष्ट अजगर दैत्यको मार करके ये बालक गुणेश उसके

[दायाँ स्तम्भ] मुखसे बाहर निकल आये हैं ॥ १२-१३ ॥ ब्रह्माजी बोले—उन (गणों)-की बात सुनते ही तत्काल पार्वतीने बालक गुणेशको उठा लिया। जल्दीसे स्नान कराया और उन्हें प्यार करते हुए स्तनपान कराया ॥ १४ ॥ अरे वत्स ! तुम कहाँ चले गये थे ? तुम्हें देखे बिना मुझे तो एक क्षणका समय भी एक वर्षके समान लगता था। तदनन्तर उन्होंने सौ योजन विस्तारवाले अजगरको देखा। वह बड़ा ही दुष्ट था। उसका मुख बड़ा ही भयानक था। वह बहुत-सा रक्त वमन कर रहा था और अनेक वृक्षसमूहों तथा घरोंको गिराते हुए जमीनपर गिरा था ॥ १५-१६ ॥ गौरी बोलीं—इस स्थानपर अभी न जाने कितने दैत्य और राक्षस होंगे। इस बालकके पराक्रमसे कितने ही राक्षस मृत्युको प्राप्त हो चुके हैं। तदनन्तर उन सभी गणोंने उस महान् असुरको दूर ले जाकर फेंक दिया ॥ १७१/२॥ तदनन्तर ग्यारहवें मासकी बात है। देवी पार्वती अपने द्वारपर गयी हुई थीं। वहाँ वे अपनी सखियोंके साथ बालक गुणेशकी बहुत-सी क्रीडाओंको देख रही थीं। वह बालक किसी सखीका मुख चूम रहा था और किसीसे अपना चुम्बन करा भी रहा था ॥ १८-१९ ॥ किसी सखीके पीछे जाकर स्वयं अपने हाथोंसे उसकी दोनों आँखोंको बन्द कर दे रहा था और किसी दूसरे बालककी माताके पास जाकर बलपूर्वक उसके स्तनोंका पान कर ले रहा था। अपना मुख वस्त्रसे ढककर किन्हीं दूसरी स्त्रियोंको डरा दे रहा था। वह गुणेश उनके मुख, केश तथा नासिका और आभूषणोंको खींच दे रहा था। वह अपने तथा पराये जनोंको देखकर तोतली वाणीमें बोल रहा था ॥ २०-२११/२ ॥ इसी समय शलभासुर नामक एक दुष्ट दानव वहाँ आया। वह ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अपराजेय था। उसके स्कन्ध पर्वतके समान ऊँचे थे। उसका विशाल सिर आकाशको भी फोड़ देनेवाला था। वह बादलकी भाँति नीले वर्णका था। उसके नेत्र जपापुष्पके

क्री०ख०-अ०९० ] * बालक गुणेशके द्वारा बारहवें मासमें दैत्योंका वध * ४८१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 समान लाल रंगके थे। उसके सींग बादलोंको स्पर्श | अपने बालक गुणेशसे बोलीं—हे पुत्र! किसी भी जीवकी करनेमें समर्थ थे। वह तीनों लोकोंको ग्रसता हुआ-सा | हत्या नहीं करनी चाहिये, इस प्राणीको तुम छोड़ दो। उस बालक गुणेशके समीपमें आया ॥ २२-२४ ॥ | तब भी बालक गुणेशने हठ करके बलपूर्वक उस वह जहाँ-जहाँ जाता था, उसे पकड़नेके लिये बालक | असुरको पत्थरपर पटक डाला ॥ २९-३० ॥ गुणेश भी वहीं-वहीं जाते थे। इस प्रकारसे महान् वेगशाली | उस समय उसके सौ टुकड़े हो गये और वह वे दोनों बहुत समयतक इधर-उधर घूमते रहे। तदनन्तर | आकाशको गर्जनासे गुँजाता और घरों तथा तोरणोंको बालक गुणेश जब थक गये, तब वे बहुत वेगसे दौड़ते हुए | गिराता हुआ भूमिपर गिर पड़ा ॥ ३१ ॥ उस असुरके पास गये और उन्होंने उस महान् बलशाली | उसका शरीर दस योजन विस्तारवाला हो गया। उस शलभासुरको एकाएक पकड़ लिया ॥ २५-२६ ॥ | समय उसके मुखसे बहुत-सारा रक्त बह चला। वह बहुत- वह अपने दोनों पंखोंको उसी प्रकार फड़फड़ाने | से आश्रमों तथा वृक्षोंको चूर-चूर करते हुए गिरा। तब लगा, जैसे कि किसी मनुष्यके द्वारा हाथमें पकड़ा हुआ | माता अपने पुत्रको पकड़कर वहाँसे ले गयी और उस बाज पक्षी अपने पंख फड़फड़ाने लगता है। वह | बालकको गोदमें बैठाकर अपना स्तनपान कराया तथा शलभासुर अपने पैरोंके प्रहारसे बालकको पीड़ित करने | भोजन कराया। उस बालक गुणेशको तथा उस प्रकारके लगा। उस समय वह असुर अपनी विकराल आँखोंको | विस्तृत शरीरवाले मरे हुए दैत्यको देखकर उन पर्वतराजपुत्री फाड़-फाड़कर उस शिशु गुणेशको देखने लगा। वह | पार्वतीसे सखियाँ कहने लगीं—बहुत अच्छा हुआ, बहुत बालक गुणेश उसको छोड़ दे रहा था, फिर पकड़ ले | अच्छा हुआ। तदुपरान्त पार्वतीने अपने भवनमें प्रवेश किया रहा था ॥ २७-२८ ॥ | और वे सखियाँ भी प्रसन्नचित्त होकर अपने-अपने घरोंको वह उसे अपनी माताको दिखाता था और फिर | गयीं। देवी पार्वतीकी आज्ञामें रहनेवाले गणोंने उस दैत्यको धरतीपर पटक दे रहा था। उसको देखकर दयाके | दूर ले जाकर फेंक दिया। उस समय देवगणोंने उस बालक वशीभूत हो पार्वती उस समय कठोर हुए मनवाले उस | गुणेशके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा की ॥ ३२-३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शलभासुरके वधका वर्णन' नामक नवासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८९ ॥ ন্দ্ৰ नब्बेवाँ अध्याय बालक गुणेशके द्वारा बारहवें मासमें नूपुर तथा अविपुत्र नामक दैत्योंका वध ब्रह्माजी बोले— बारहवें मासकी बात है। एक | शब्दोंका उच्चारण करते हुए नृत्य करने लगे ॥ २-३ ॥ दिन देवी पार्वती विविध अलंकरणोंसे अलंकृत करके | बालक गुणेशके उस प्रकारके शब्दको सुनकर अपने अद्भुत पुत्र बालक गुणेशको गोदमें लेकर अपनी | भगवान् शिव भी नृत्य करनेके लिये वहाँ आ पहुँचे। सखियोंके साथ बैठी हुई थीं ॥ १ ॥ | भगवान् शिवको नृत्य करते हुए देखकर श्रीविष्णु स्वयं उस समय गुणेशकी आभा करोड़ों सूर्योंकी प्रभासे | भी नृत्य करने लगे। तदनन्तर इन्द्र आदि सभी देवता भी सम्पन्न थी और वे करोड़ों आभूषणोंसे विभूषित थे। उस | नृत्यकी अभिलाषासे वहाँ आ पहुँचे। वह बालक जिस समय माताको पुत्रके नृत्यके दर्शनकी महान् उत्कण्ठा | प्रकारसे नृत्य कर रहा था, उसी प्रकारसे वे सब भी हुई। अन्य बालकों तथा भगवान् शिवकी भी नृत्य- | नाचने लगे ॥ ४-५ ॥ दर्शनकी इच्छा जानकर वे गिरिजापुत्र गुणेश 'थेयि थेयि' | वह गुणेश जिस भावको प्रकट कर रहा था, वे

४८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- सभी भी वैसा ही भाव प्रदर्शित करने लगे। सभी मनुष्य, पशु, वृक्ष, यक्ष, राक्षस, पन्नग, मुनिजन, मनुगण, राजालोग, चौदहों भुवन और इक्कीस स्वर्गोंके निवासी तथा सभी चेतन और अचेतन प्राणी उस बालक गुणेशके प्रभावसे नृत्य करने लगे। उस गुणेशकी इच्छाके अनुसार भूतलके समस्त प्राणी, मुनिजनोंकी पत्नियाँ, देवताओंकी पत्नियाँ भी उन गिरिकन्या पार्वतीके साथ नृत्य करने लगीं ॥ ६-८॥ हे मुनिवर व्यासजी ! उस समय नूपुरोंकी ध्वनिसे, छोटी-छोटी घण्टियोंके शब्दोंसे तथा पैरोंके आघातकी थापसे दिशाएँ एवं विदिशाएँ और आकाश तथा पर्वत भी निनादित हो उठे। धरती, शेषनाग, सूर्य, चन्द्र तथा तारागण कम्पित हो उठे ॥ ९-१० ॥ तब नृत्यकी अत्यन्त पराकाष्ठा देखकर देवी पार्वतीने और आगे नृत्य न करनेकी आज्ञा प्रदान की, तब भी बालक गुणेशने गौरीद्वारा कहे गये वचनका पालन नहीं किया ॥ ११ ॥ उसी समयकी बात है, नूपुर नामक महान् दैत्य वहाँ आया। उसका शरीर काले रंगका और अत्यन्त कठोर था। उसके पैर पातालतक लम्बे थे और उसका सुदृढ़ मस्तक आकाशको छूनेवाला था ॥ १२ ॥ वह दुष्ट राक्षस अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करके शिशु गुणेशके नूपुरोंके अन्दर प्रविष्ट हो गया। बालक गुणेशने भी उस अत्यन्त बलवान् दैत्यको शीघ्र ही अपनी मायासे उसी प्रकार बाँध लिया, जैसे कि मदस्रावी चार दाँतोंवाले हाथीको जंजीरोंसे बाँध दिया जाता है। तभी पर्वतराजपुत्री पार्वतीने अपने बालक उस गुणेशको पुनः गोदमें ले लिया ॥ १३-१४॥ उस समय उस गुणेशके भारसे वे पार्वती उसी प्रकार पीड़ित हुईं, जैसे कि पृथिवीका ही भार गोदमें आ गया हो। तब गौरी कहने लगीं- तुम अभी-अभी इतने भारी कैसे हो गये हो ? अतः तुम मेरी गोदसे उतर जाओ, अरे बालक ! तुम्हारे भारके कारण तो मेरे प्राण ही निकल जायँगे ! ॥ १५-१६ ॥ ब्रह्माजी बोले- माताके ये वचन कि 'वह भारसे अत्यन्त पीड़ित हो रही है' सुनकर बालक गुणेश माताकी गोदसे उतर गये और उन्होंने बलपूर्वक अपने दोनों पैरोंको जोरसे झटका मारा ॥ १७ ॥ फलस्वरूप वह दैत्य नूपुरसे निकलकर पक्षीकी भाँति आकाशमें चक्कर काटने लगा। उसके विस्तृत शरीरसे सूर्यके ढक जानेके कारण सम्पूर्ण पृथ्वीमें अन्धकार छा गया ॥ १८ ॥ अकस्मात् वह दुष्ट दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़ा और उसके सौ टुकड़े हो गये। यह देखकर सभी मुनिगण तथा देवता परम आनन्दमें निमग्न हो गये और वे उन बालरूपी अविनाशी परमात्माकी स्तुति करने लगे ॥ १९१/२ ॥ देवता तथा ऋषि बोले- हे देव ! हम लोग आपके विविध स्वरूपों, आपके तेज तथा दैत्यों और दानवोंका विनाश करनेवाली आपकी अनेकों प्रकारकी लीलामयी मायाको नहीं जानते हैं। आपने सूर्यमण्डलको आच्छादित कर देनेवाले दैत्य नूपुरको अपने चरणोंसे झटक दिया। वह आकाशमें बार-बार चक्कर काटता हुआ पुनः पृथ्वीपर गिरकर सौ टुकड़े हो गया। गिरते समय उसने अनेक प्राणिसमूहों, वृक्षों, आश्रमों तथा पर्वतोंको विनष्ट कर डाला। आपको नृत्य करते देखकर अन्य सभी लोग भी बादमें नृत्य करने लगे ॥ २०-२२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर उन सभीने विश्वरूपी उन बालक गुणेशकी पूजा की। नृत्योत्सवके पूर्ण हो जानेके अनन्तर देवी पार्वतीने गौतम आदि महर्षियोंको विदा किया और वे बालक गुणेशको गोदमें लेकर दुलार करती हुईं उन्हें अपना स्तनपान कराने लगीं ॥ २३-२४॥ फिर उन्होंने सभी स्त्रियोंको विदाकर अपने भवनमें प्रवेश किया। कुछ दिनोंके बादकी बात है, एक दिन वे गुणेश मुनिबालकोंके साथ घरसे बाहर क्रीडा करनेके लिये गये और लीलापूर्वक क्रीडा करने लगे। उन सभी बालकोंने दो-दोका जोड़ा बनाकर अनेक प्रकारसे बहुत बार परस्पर मल्लयुद्ध किया ॥ २५-२६॥ वे परस्पर चोटी पकड़कर एक-दूसरेको गिराने

क्री०ख०-अ०९० ] * बालक गुणेशके द्वारा बारहवें मासमें दैत्योंका वध * ४८३ लगे। वे कभी एक-दूसरेके सिर-में-सिर भिड़ाकर, कभी घुटनों-से-घुटना टकराकर, कभी कोहनी-से-कोहनीमें मारकर तो कभी पैरसे दूसरेके पैरमें चोट मार [करके क्रीडा कर] रहे थे। वे कभी एक-दूसरेकी पीठपर चढ़ जाते, तो कभी कन्धेपर चढ़ जाते ॥ २७-२८ ॥ वे बालक कभी-कभी नियत समयके लिये हाथ फैलाकर दौड़ लगाते और कभी मुट्ठीमें धूलि भरकर एक-दूसरेपर फेंकने लगते। वे परस्पर कभी एक-दूसरेके पेटमें लातसे मार रहे थे, तो कभी सिरपर मार रहे थे। कुछ बालक गन्ध, पुष्प तथा अक्षत आदिके द्वारा उन गुणेशका पूजन कर रहे थे ॥ २९-३० ॥ कुछ बालक उन गुणेशको अपने आश्रममें ले जाकर अन्न आदिका भोजन करा रहे थे। कोई उनके चरणयुगलमें प्रणाम करके सुन्दर माला चढ़ा रहे थे। उसी समय सिन्धुदैत्यद्वारा भेजा हुआ भेड़के बच्चेका रूप धारणकर एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा, जिसे देखकर हाथमें दण्ड धारण करनेवाले भयानक यमराज भी भयभीत हो जाते थे ॥ ३१-३२ ॥ तीखी धारसे युक्त नखोंवाला वह बलशाली भेड़ा अपने पराक्रमसे शत्रुओंका वध कर देता था। उसने सभीको जीतकर अपने बाहुदेशमें विजयपत्र बाँध रखा था। उसकी आँखें बहुत बड़ी-बड़ी थीं। सींग उसके बहुत विशाल थे। बड़े-बड़े पर्वतोंको वह चूर-चूर कर डालता था। वह भेड़रूप दुष्ट दैत्य अपनी पूँछके आघातसे प्राणियोंको मार डालता था ॥ ३३-३४ ॥ वह अपने सींगोंके आघातसे वृक्षों तथा पर्वतोंको उखाड़ डालता था। वह बलवान् भेड़ा मनुष्योंका पीछा करता हुआ बलपूर्वक उन्हें मार डालता था ॥ ३५ ॥ वह महान् असुर पार्वतीके पुत्र गुणेशको मारनेके लिये आया। वह पीछेसे दौड़कर जबतक उसको मारता, उससे पहले ही बालक गुणेशने अपने हाथोंसे उसके सींग पकड़ लिये और उसकी पीठपर वे उसी प्रकार चढ़ गये, जैसे घोड़ेकी पीठपर कोई बालक चढ़कर बैठ जाता है ॥ ३६-३७ ॥ उस समय कुछ मुनिबालक उस दैत्य भेड़केी पूँछ पकड़कर खींचने लगे और कुछ लाठियों तथा डण्डोंसे उस महान् दैत्यको पीटने लगे ॥ ३८ ॥ किंतु उस दैत्यने उन सबकी अवहेलना करते हुए उन्हें शीघ्र ही पूँछके आघातसे आहत किया। तब वे पूँछके आघातसे पीड़ित होकर भूमिपर गिर पड़े ॥ ३९ ॥ उस दैत्यके वैसे पराक्रमको देखकर बालक गुणेश उसकी पीठसे उतर गये और उसे पकड़कर देरतक घुमाकर सहसा उसकी पीठमें प्रहार किया। जिससे वह असुर हजार टुकड़ोंमें खण्डित होकर सहसा मर गया, मरते समय उसके द्वारा किये गये शब्दसे तीनों लोक भयभीत हो उठे ॥ ४०-४१ ॥ वह अपने विकृत मुखको फैलाकर उस मुखसे रक्त बहाने लगा। तदनन्तर वे मुनियोंके बालक पर्वतपुत्री पार्वतीसे कहने लगे-भेड़ेके रूपमें स्थित इस महान् असुरको, जो हमको मारनेके लिये आ रहा था, उसे इस बलशाली बालकने खेल-खेलमें ही मार डाला है ॥ ४२-४३ ॥ ब्रह्माजी बोले-तब देवी पार्वतीने मरे हुए महादैत्य तथा अपने पुत्र गुणेशको देखा तो वे परम आश्चर्य करने लगीं और फिर वे बालक गुणेशको अपने भवनमें ले गयीं। वहाँ ले जाकर उन्होंने उसके सिरके ऊपर जलके साथ दही तथा भात घुमाकर उसे घरसे बहुत दूर ले जाकर फेंका तथा बालकको स्तनपान कराया ॥ ४४-४५ ॥ गणोंने दैत्यके शरीरके उन टुकड़ोंको दूर ले जाकर फेंक दिया। उस समय मुनिगणों, मुनिपत्नियों, मुनिबालकों तथा अन्य स्त्रियोंने पार्वतीके पुत्रकी प्रशंसा की। देवताओंने बालक गुणेशपर पुष्पोंकी वर्षा की। ब्राह्मणोंने उसे आशीर्वाद प्रदान किया और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'नूपुर तथा अविपुत्र नामक दैत्योंके वधका वर्णन' नामक नब्बेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९० ॥

इक्यानबेवाँ अध्याय

४८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इक्यानबेवाँ अध्याय बालक गुणेशद्वारा कूट तथा मत्स्य आदि रूप धारण करनेवाले दैत्योंके वधकी लीला-कथा ब्रह्माजी बोले—गुणेशके दूसरे वर्षकी अवस्थाकी | देखनेमात्रसे मरे हुए उस कूट नामक दैत्यको भूमिपर बात है, बालक गुणेश असंख्य बालकोंके साथ वाटिकामें | गिरा दिया॥ ९-१०॥ क्रीड़ा कर रहे थे, वह वाटिका विविध प्रकारके वृक्षों | उस दैत्यके गिरनेसे पाँच योजन विस्तारवाली वह तथा लताओंसे व्याप्त थी॥ १॥ | वाटिका चूर-चूर हो गयी। यह दृश्य वहाँ उपस्थित सभी वे गुणेश खजूर तथा कटहलके फलोंको स्वयं खा | नगरवासियोंने देखा। कुछ लोग भयभीत होकर भाग गये भी रहे थे और बलशाली होनेसे बहुत-से फलोंको | थे। बालक गुणेशने सभी जलचर जीवोंको जिला दिया गिराकर उन बालकोंको भी दे रहे थे॥ २॥ | और उस सरोवरको विषसे रहित कर दिया। सभी उसी समय कूट नामक एक महान् दैत्य उन | नगरनिवासी अपने-अपने बालकोंको लेकर अपने-अपने बालकोंके पानी पीनेका समय जानकर वहाँ आया। वह | घर चले आये॥ ११-१२॥ दैत्य अत्यन्त दुष्ट, कपटी एवं मायावी था। उस दुर्बुद्धि | सभीने पार्वतीके पुत्र उन गुणेशकी प्रशंसा की, दैत्यने उन सब बालकोंको मारनेकी इच्छासे सरोवरके | किंतु जो नास्तिक और दुष्ट थे, वे उनकी निन्दा जलमें ऐसी विषराशिको हिलाकर मिला दिया, कि | करने लगे। कुछ दूसरे लोग कहने लगे कि इसके जिसके स्पर्श करनेमात्रसे प्राणी क्षणभरमें मर जाते थे | साथ होनेसे सभी अरिष्ट विनष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर और जिन विषोंसे उठी हुई वायुसे आकाशचारी पक्षी | तीसरे वर्षकी बात है, एक दिन प्रातःकालके समय भूमिपर गिर पड़ते थे। कुछ समय बीतनेके बाद कूट | पार्वतीपुत्र गुणेश सबकी नजरोंसे बचते हुए बाहर नामक वह दैत्य उन बालकोंकी मृत्युको देखनेकी | चले गये, मुनियोंके बालक भी उनके पीछे-पीछे इच्छासे वहाँ जाकर प्रतीक्षा करने लगा॥ ३-५॥ | निकल गये॥ १३-१४॥ तदनन्तर वे बालक, जिन्हें पता नहीं था कि जलमें | एक रात-दिनतक अलग-अलग रहनेके बाद जब विष मिला हुआ है, जल पीनेके लिये वहाँ गये, वहाँ | वे पुनः परस्पर मिले तो एक-दूसरेको गले लगा लिया, उनमेंसे किसीने चुल्लूसे तथा किसीने अंजलिमें जल | उन्होंने गुणेशसे कहा—हे देव! हम सभी सर्वदा आपको लेकर पिया॥ ६॥ | रात्रिमें स्वप्नमें देखा करते हैं। हे प्रभो! आपको देखे जलमें मरी हुई मछलियोंको लेकर वे बालक जब | बिना हमें एक रात्रिका समय एक युगके समान प्रतीत बाहर आये तो विषपान करनेसे स्वयं भी मर गये। यह | होता है। इस समय आपका दर्शन करके हम सभी बहुत देखकर रक्षकने गाँवमें जाकर बालकोंकी मृत्युका समाचार | प्रसन्न हो गये हैं॥ १५-१६॥ उच्च स्वरमें सुनाया॥ ७॥ | हे महासत्त्वसम्पन्न गुणेश! आज हम सब लोग दो तब महान् हाहाकार करते हुए सभी नागरिक वहाँ | दल बनाकर सुखपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। तदनन्तर आधे आये। वे अपने हाथोंसे अपनी छाती पीट रहे थे और | बालक एक ओर हो गये और शेष आधे बालक दूसरी कुछ पत्थरोंसे अपना सिर पीट रहे थे॥ ८॥ | ओर। तब कीचड़से गोले बनाकर उनसे वे बालक पृथ्वी उस समय पुरुषों तथा स्त्रियोंका महान् कोलाहल | और आकाशको निनादित करते हुए एक-दूसरेपर प्रहार व्याप्त हो गया। उन सभीके क्रन्दनको सुनकर पार्वतीपुत्रने | करने लगे। वे आह्लादपूर्वक इस प्रकार युद्ध करते हुए भी अपने दृष्टिपातके द्वारा पुरमें रहनेवाले उन सभी | परस्पर एक-दूसरेको खींचने लगे॥ १७-१८॥ बालकोंको जीवित कर दिया और अपनी क्रूर दृष्टिद्वारा | इस प्रकार आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करते हुए दूर एक

क्री०ख०-अ०१९ ] * बालक गुणेशद्वारा दैत्योंके वधकी लीला-कथा * ४८५

[बायाँ स्तम्भ]

मुनिके आश्रममें पहुँच गये। वहाँपर विद्यमान एक योजन विस्तारवाले एक सरोवरमें जाकर वे क्रीड़ा करने लगे। पूर्वकी भाँति पुनः दो भागोंमें बँटकर अपने-अपने हाथकी अंजलिमें जल लेकर एक-दूसरेपर उछालने लगे। वे कभी जलमें गोते लगाकर, पुनः किसी दूसरेके कन्धेपर चढ़कर उसे बलपूर्वक जलमें डुबो दे रहे थे॥ १९-२०॥ उसी समयकी बात है, एक दैत्य मत्स्यका रूप धारणकर उन सभीके साथ वैसी ही क्रीड़ा करने लगा। वे बालक अपने हाथोंके आघातसे उस सरोवरके जलको छपछपाने लगे और वह भी अपनी पूँछके द्वारा उनपर जल छिड़कने लगा। उस सरोवरके कलुषित जलकी लहरें बार-बार तटपर टकरा रही थीं। सरोवरके किनारेपर स्थित पार्वतीपुत्र गुणेशको देखकर वह मत्स्य उनके समीपमें गया॥ २१-२२॥ उसने अपना मुख फैलाया और गुणेशके दोनों पैरोंको अपने मुखमें भर लिया और फिर 'दौड़ो-दौड़ो' इस प्रकारसे चिल्लाते हुए उन गुणेशको वह खींचते हुए सरोवरके गहरे जलमें ले गया॥ २३ ॥ वह मत्स्यरूपी महादैत्य उन गुणेशको लेकर बहुत समयतक जलमें निमग्न रहा। गिरिजापुत्र गुणेशको जलमें डूबा हुआ देखकर मुनियोंके बालक रोने लगे ॥ २४॥ वे अपने हथेलीके पृष्ठभागको अपने होठोंसे लगाकर हाहाकार करने लगे। कुछ बालकोंने उस सरोवरमें डुबकी भी लगायी, किंतु वहाँ उन्होंने उस बालकको नहीं देखा। पार्वतीके द्वारा पीटे जानेके भयसे भयभीत कुछ बालक भाग खड़े हुए। उनमेंसे कुछ बालकोंने पार्वतीके पास जाकर उस बालकके सरोवरमें डूबनेका समाचार उन्हें बताया कि खेल रहे हम सभी बालकोंको छोड़कर बालक गुणेशको लेकर एक मत्स्य जलमें चला गया॥ २५-२६१/२॥ ब्रह्माजी बोले- बालकोंका वचन सुनकर गौरी मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ीं। एक मुहूर्तके अनन्तर जब चेतनाको प्राप्त हुईं तो रोती हुई बाहर निकल पड़ीं। उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू निकल रहे थे, मस्तकपरसे

[दायाँ स्तम्भ]

आँचल गिर गया था॥ २७-२८॥ वे लड़खड़ाती तथा लम्बी श्वास लेती और भूमिपर गिरती हुई जा रही थीं। कुछ सखियाँ अपना काम-धाम छोड़कर शीघ्र ही उनके पीछे दौड़ पड़ीं॥ २९॥ देवी पार्वती अपनी सखियोंके साथ शीघ्र ही वहाँ पहुँच गयीं। मुनिगण भी वह समाचार पाकर सरोवरकी ओर चल पड़े ॥ ३०॥ उनमेंसे कुछने अगाध जलमें गोता लगाया, किंतु वे उमापुत्र गुणेशको खोज नहीं पाये। कुछ मुनियोंने गुणेशकी मातासे कहा- हमारे बालकोंने जलमें डुबकी लगायी, किंतु उन्होंने मत्स्यके उदरमें प्रविष्ट आपके बालकको नहीं देखा। उनके वचनोंको सुनकर गौरीने पुनः रोना आरम्भ कर दिया॥ ३१-३२॥ उमा बोलीं- उस सर्वांगसुन्दर बालकको देखे बिना मेरे प्राण निकल जायँगे। मैंने बड़े ही कष्टसे उस अत्यन्त पराक्रमी ईश्वरको प्राप्त किया है। वह समस्त चराचर जगत्का गुरु है, मायासे परे है, परम मायावी है, अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंका नायक है और विश्वकी सृष्टि करनेवाला है॥ ३३-३४॥ ऐसा कहते हुए वे अपने हाथसे बार-बार अपना माथा और वक्षःस्थल पीटने लगीं। उस प्रकारसे विलाप करती हुई उन पार्वतीको देखकर मुनिगण भी रोने लगे। तदनन्तर उन दयालु देव गुणेशने उनके कारुणिक वचन सुनकर स्वयं भी मत्स्यका रूप धारण कर लिया। तदनन्तर मत्स्यरूपधारी गुणेश और मत्स्यरूपधारी दैत्यमें परस्पर युद्ध होने लगा ॥ ३५-३६ ॥ उन दोनोंके परस्पर आघातसे जलचर जीव मरकर तटपर गिर रहे थे। वे दोनों दाँतोंसे एक-दूसरेको काट रहे थे और पूँछके आघातसे एक-दूसरेपर प्रहार कर रहे थे॥ ३७॥ वे अपने-अपने पेटसे पेटपर तथा पीठसे पीठपर मार रहे थे। इस प्रकार बहुत देरतक बलपूर्वक भयंकर युद्ध करके मत्स्यरूप धारण किये गुणेशने बड़े जोरसे अपने मुखसे उसके मुखपर आघात किया। उस प्रबल आघातसे उसका मुख फूट गया, आँखें फूट गयीं और

४८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उसका घमण्ड चूर-चूर हो गया ॥ ३८-३९ ॥ तदनन्तर वह मत्स्यरूपधारी दैत्य जलके अन्दर चला गया, मत्स्यरूपधारी उमापुत्र वे गुणेश भी उसके पीछे-पीछे जलके अन्दर चले गये। वह दैत्य जहाँ-जहाँ जाता, वे गुणेश भी वहीं-वहीं उसके पीछे जाते ॥ ४० ॥ उस दैत्यको कहीं छिपा हुआ जानकर मत्स्यरूपी गुणेशने अपनी पूँछसे उसपर प्रहार किया और वे उसकी पूँछको अपने मुखसे पकड़कर वहाँसे बाहर निकल पड़े। तदनन्तर गुणेशने उसे अपने भारसे दबाकर चूर-चूर कर दिया। अपने मुखसे रक्त बहाता हुआ और महान् चीत्कार करता हुआ वह दैत्य प्राणहीन हो गया, तब गुणेशने उसे छोड़ दिया ॥ ४१-४२ ॥ उस दैत्यके द्वारा की गयी भयंकर ध्वनिने तीनों लोकोंको प्रकम्पित कर डाला। तदनन्तर वे गुणेश जलसे बाहर आ गये। उस समय देवी पार्वती ने उनका आलिंगन किया। आनन्दमें निमग्न पार्वती ने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्तनपान कराया और वे कहने लगीं—मुझसे पूछे बिना तुम बालकोंके साथ कहाँ चले गये थे ? ॥ ४३-४४ ॥ तुम्हारे ऊपर जो-जो भी विघ्न आता है, वह सौभाग्यवश महर्षिद्वारा किये गये रक्षा-विधानके द्वारा और जगदीश्वर भगवान् शम्भुकी कृपासे विनष्ट हो जाता है। तुम इतने चंचल क्यों हो गये हो, मैं तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ ? हे प्रिय पुत्र ! तुम्हारे वियोगमें तो मेरे प्राण ही निकल जायँगे ॥ ४५-४६ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर मुनिगणोंने कहा—हे प्रभो ! आपके बिना हम बड़े ही दुखी थे, अब इस समय आपका दर्शन प्राप्तकर हमें पहले-जैसा ही आनन्द प्राप्त हो रहा है। तदनन्तर सभी मुनियों, देवी पार्वतीकी सखियों तथा अन्य स्त्रियोंने भी अनेक प्रकारके द्रव्योंसे उनका पूजन किया, फिर गुणेशको प्रणाम करके वे सभी उनकी प्रार्थना करने लगे ॥ ४७-४८ ॥ हे देवेश्वर ! हम सब आपके शरणागत हैं, आप हमारा परित्याग न करें। इसके बाद देवी उमा बालक गुणेशको लेकर अपने श्रेष्ठ स्थानपर चली गयीं ॥ ४९ ॥ इसके साथ ही सभी गण, सखियाँ तथा मुनिजन हर्षसे निमग्न हो अपने स्थानोंको चल पड़े। उसी समय मार्गमें एक शैल नामक महाबली दूसरा दैत्य आ पहुँचा। वह दैत्य सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला, मगरमच्छके समान कठोर शरीरवाला और वज्रको भी विनष्ट कर देनेवाला था। उसकी शब्दध्वनिसे क्षणभरमें ही पर्वत विदीर्ण हो जाते थे ॥ ५०-५१ ॥ आकाशको छूता हुआ वह रास्ता रोककर सहसा खड़ा हो गया। उसका मस्तक दो योजन विस्तृत था और वह नीचेकी ओर बारह योजन लम्बा था ॥ ५२ ॥ उस दैत्य शैलके विस्तृत शरीरमें सरोवर, वृक्ष तथा लताएँ सुशोभित थीं और वहाँ सिंह, शार्दूल, हाथी, यक्ष तथा राक्षस विचरण किया करते थे ॥ ५३ ॥ इस प्रकारके उस शैल दैत्यको देखकर वे सभी मुनिगण, स्त्रियाँ आदि विह्वल हो गये और कहने लगे कि यह कौन-सा विघ्न आ खड़ा हुआ। उस समय देवी पार्वती भी उनके पास खड़ी हो गयीं और तब वे सब मुनिगण भी वहीं खड़े हो गये ॥ ५४ ॥ तदनन्तर वे मुनिगण बोले—हम अपनी स्त्रियोंको तथा सन्तानोंको कब देखेंगे? देव गुणेश अब कब यहाँ पराक्रम दिखलायेंगे ? ॥ ५५ ॥ हम लोगोंका होम तथा तर्पण-श्राद्ध आदि करनेका यह समय व्यर्थ ही चला जायगा। तब देवी गौरी उन सबसे बोलीं—आपलोग दुःख न करें। इस समय मुझे भी शंकरकी चिन्ता हो रही है ॥ ५६१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—उन सभीके वचनोंको सुनकर अत्यन्त बुद्धिमान् गुणेशने तत्क्षण विराट्रूप धारण किया और अपने श्वासकी फूँकमात्रसे उस दैत्य शैलको दूर पछाड़ दिया, वे मुनिगण भ्रमित हो जानेके कारण गुणेशके [विराट्] स्वरूपको देख न सके ॥ ५७-५८ ॥ उस समय गुणेशके श्वासके संयोगसे वह दैत्य शैल आकाशमण्डलमें चक्कर काटने लगा। यह सब देखकर वे सभी मुनिगण आश्चर्यचकित हो गये और गुणेशकी प्रशंसा करने लगे ॥ ५९ ॥ जिस प्रकार आँधी किसी पत्तेको उड़ा डालती है,

क्री०ख०-अ०९२] * चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध * ४८७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वैसे ही वह दैत्य आकाशमें उड़कर भूमिपर गिर पड़ा। उस दैत्य शैलके हजारों टुकड़े हो गये, उसने गिरते समय अनेकों वृक्षोंको चूर-चूर कर डाला ॥ ६० ॥ तदनन्तर वे मुनिगण कहने लगे- हे गुणेश्वर ! आपको साधुवाद है, साधुवाद है। आपने हमारा अरिष्ट दूर कर दिया है, आपकी कृपासे अब हम अपने-अपने आश्रममें सुखपूर्वक रह सकेंगे और अपने-अपने नित्यकर्मोंको पूर्ववत् पुनः कर सकेंगे ॥ ६१ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर उन्हें प्रणाम करके और उनसे अनुमति लेकर तथा उनका पूजन करके वे सभी मुनिगण चले गये ॥ ६२ ॥ देवी पार्वतीने उन गुणेशको लेकर अपने भवनमें प्रवेश किया, उनकी सखियाँ तथा मुनिपत्नियां भी उनकी आज्ञा लेकर अपने घरोंको गयीं। जो मनुष्य इस आख्यानका श्रवण करता है, वह सर्वत्र सुख, दीर्घ आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य तथा सर्वत्र विजय प्राप्त करता है ॥ ६३-६४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कूटासुर, मत्स्यासुर तथा शैलासुरके वधका वर्णन' नामक इक्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९१ ॥ बानबेवाँ अध्याय चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध, गुणेशद्वारा माता पार्वतीको अपने मुखके भीतर समस्त विश्वका दर्शन कराना, माताद्वारा गुणेशकी स्तुति ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] तदनन्तर किसी दिनकी बात है, जिस समय प्रातःकाल चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेश सोये हुए थे और देवी पार्वती शीघ्रतापूर्वक स्नान करके शिवलिंग-पूजा कर रही थीं ॥ १ ॥ वे अपने बायें हाथमें भगवान् शिवका पार्थिव लिंग रखकर उस श्रेष्ठ लिंगकी दाहिने हाथसे पूजा कर रही थीं। उसी समय बालक गुणेश जग गये और रोने लगे तथा स्तनपान करानेका हठ करने लगे ॥ २ ॥ तब माताने 'क्षणभर रुक जाओ-क्षणभर रुक जाओ'- इस प्रकार कहते हुए उन्हें रोका तो रुष्ट होकर बालक गुणेशने अपने हाथके प्रहारसे माताके हाथमें रखे पार्थिव लिंगको नीचे गिरा दिया ॥ ३ ॥ माताने भी अत्यन्त रुष्ट होकर बालकको हाथसे मारा। तब बालक गुणेशने भी क्रुद्ध होते हुए पुनः समीपमें आकर माताकी अंगुलिमें जोरसे दाँतसे काट लिया ॥ ४ ॥ 'मुझे छोड़ो-मुझे छोड़ो'- यह कहते हुए वे बोलीं- 'मेरे प्राण निकल जायँगे।' तब दाँत काटी हुई अंगुलिको छोड़कर बालक गुणेश दूर भाग गये ॥ ५ ॥ माता पार्वतीकी अँगुलीसे बहुत-सा रक्त भूमिपर उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे कि जोरसे चोट करनेपर मदारके वृक्षसे दूध निकलकर गिरने लगता है ॥ ६ ॥ तब माता पार्वती एक छड़ी लेकर पुत्र गुणेशको मारनेके लिये दौड़ीं। उन्होंने दौड़कर बालकको पकड़ लिया। उस समय उन्होंने बालकको भगवान् शिवके स्वरूपवाला देखा ॥ ७ ॥ उनके पाँच मुख थे, दस भुजाएँ थीं, तीन नेत्र थे, वे शेषनागसे सुशोभित थे। उन्होंने त्रिशूल, डमरु, भस्म तथा रुण्डोंकी माला धारण की हुई थी ॥ ८ ॥ वे हस्तिचर्म तथा व्याघ्रचर्म पहने हुए थे और उनके मस्तकपर चन्द्रमा सुशोभित था। यह देखकर पार्वती लज्जित हो गयीं। उन्होंने छड़ीको फेंक दिया और वे शिवा मुख नीचेकर खड़ी हो गयीं ॥ ९ ॥ उस समय वे न तो आगे बढ़ सकीं और न वापस भवनको जानेमें ही समर्थ हो पा रही थीं। उनकी चिन्ताको समझकर भगवान् गुणेश [शिवरूपको त्यागकर] पुनः बालकके स्वरूपमें हो गये ॥ १० ॥

४८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- वे मुनिबालकका रूप बनाकर मुनिबालकोंके साथ खेल खेलने लगे। जब देवी पार्वती उन्हें देखने उनके पीछे गयीं तो उनके बीच उन्होंने अपने पुत्रको नहीं देखा। उन्होंने उन मुनिबालकोंसे पूछा- मेरा बालक कहाँ चला गया ? मेरी अँगुलीमें दाँत काटकर वह चंचल बालक भाग रहा है ॥ ११-१२ ॥ वे मुनिपुत्र उनसे बोले- आपका पुत्र यहाँसे चला गया है। तब उन्हें खोजने पार्वती आगे-आगे बढ़ने लगीं। उनके बालोंकी चोटी खुल गयी थी, खोजनेके परिश्रमसे वे पसीनेसे लथपथ हो गयी थीं, इधर-उधर दौड़ती हुई उन पार्वतीके वस्त्र तथा आँचल अपने स्थानसे खिसक गये थे। माताका इस प्रकारका परिश्रम देखकर वे गुणेश अपना पहलेवाला बालकरूप धारणकर माताके पास आये, तब देवी गिरिजाने अपने हाथोंसे उन्हें दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया ॥ १३-१५ ॥ अपने आँचलसे उन्हें बाँधकर वे प्रसन्नचित्त हो अपने भवनको गयीं। वे उनसे गुस्सेसे बोलीं- अब तुम ठीकसे मेरे हाथमें आ गये हो। हे अपस्मारसे आक्रान्त व्यक्तिसे भी अधिक अस्थिर बालक ! मैं इस समय तुम्हें बहुत अधिक मारूँगी, अथवा भगवान् शंकरसे तुम्हारी शिकायत करूँगी, वे ही तुम्हें मारेंगे ॥ १६-१७ ॥ माताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर बालक गुणेश भूमिपर लोट गये और फिर अपनेको बन्धनसे मुक्त देखकर पुनः तेजीसे भाग चले ॥ १८ ॥ तब पार्वती अत्यन्त विह्वल तथा दुःखित होकर उनके पीछे फिर दौड़ पड़ीं। इसी समय कर्दमासुर नामक एक दुष्ट दानव वहाँ आया। वह ब्राह्मणका रूप धारण किये हुए था, उसने माला पहनी हुई थी, वह अपने दाहिने हाथमें जलसे भरा हुआ कमण्डलु लिये हुए था। उसका सारा शरीर भस्मसे पुता हुआ था ॥ १९-२० ॥ वह अरुणोदयकालीन सूर्यकी अरुणिम आभाके समान वस्त्र पहने हुए था। वह अत्यन्त मायावी था। वह बालकसे इस प्रकार का वचन कहने लगा- तुम किस कारणसे भाग रहे हो, मैं शीघ्र ही तुम्हारे भयका निवारण कर दूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है। मैं तुम्हें ऐसे स्थानपर ले जाऊँगा, जहाँ तुम्हारी माता तुम्हें किसी प्रकार भी जान नहीं पायेंगी। वहाँ न तो कालका कोई भय होगा और न अणुमात्र भी अन्य कोई भय होगा ॥ २१-२२ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब भयभीत बालक गुणेश उससे बोले- आप वैसा ही करें, जिससे कि मेरे माता-पिता मुझे न देख सकें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। इस प्रकार कहते हुए वे गुणेश बालस्वभाववश ज्यों ही उसके समीप में गये, त्यों ही वह दुष्ट कर्दमासुर उस कोमल बालकको उसी प्रकार निगल गया, जिस प्रकार कि पके हुए केलेके टुकड़ेको निगल लिया जाता है ॥ २३-२५ ॥ इधर पार्वती भूमिपर बालक गुणेशके चरणकमलोंके चिह्न देखती हुई आगे बढ़ती गयीं। उन्होंने सामने एक ब्राह्मणको देखा तो उससे उन्होंने अपने बालकके विषयमें पूछा- हे स्वामिन् ! क्या आपने मेरे पुत्रको यहाँसे जाते हुए देखा है? हे विप्र ! ये देखिये, भूमिपर पड़े हुए ये चरणकमलोंके चिह्न उसीके हैं ॥ २६-२७ ॥ हे द्विज ! यहाँसे दौड़ता हुआ वह न जाने कहाँ गायब हो गया ? तब बालकके वियोगसे दुखी उन पार्वतीसे वह ब्राह्मण कहने लगा ॥ २८ ॥ द्विज बोला- हे अनघे ! हे माता ! आपके बालकसे हमारा क्या प्रयोजन है? हे माता ! हम तो सब प्रकारसे उदासीन रहनेवाले और ईश्वरके ध्यानमें दत्तचित्त रहनेवाले हैं। फिर भी आप पूछ रही हैं तो हम कहते हैं कि हे शैलपुत्री ! हमने आपके पुत्रको कहीं भी नहीं देखा है, हे देवि ! क्या आपने अपने बालकको हमारे अधीन किया हुआ था ? ॥ २९-३० ॥ ब्रह्माजी बोले- उसके इस प्रकारसे कहनेपर उन शैलपुत्रीको अत्यन्त दुःखित देखकर निर्विकार गुणेश्वर उस कर्दमासुरके मुखसे बाहर प्रकट हो गये ॥ ३१ ॥ तब देवी पार्वती अपने पुत्रको पाकर उस विप्रदेहधारी कर्दमासुरसे बोलीं- आप झूठ क्यों बोलते हैं? आपके निकट ही यह पुत्र देखा गया है, निश्चित ही आपने ही इसे गायब किया है। सन्तोंका यह स्वभाव होता है कि वे प्राणोंपर संकट आ जानेपर भी कभी भी मिथ्या वचन

क्री०ख०-अ० ९२] * चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध * ४८९ नहीं बोलते॥ ३२१/२॥ ब्रह्माजी बोले—पार्वतीके इन वचनोंको सुनकर वह दैत्य विशाल शरीरवाला हो गया, उसका मस्तक आकाशको छू रहा था। उसी समय वह दैत्य बालक गुणेशको लेकर वहाँसे निकल गया। तब विलाप करती हुई वे शिवा पुत्रके पीछे-पीछे चल दीं॥ ३३-३४॥ तब बार-बार शोक करती हुई माताके दुःखको देखकर गुणेशने उस दैत्यसे भी बड़ा अपना शरीर बना लिया। उन्होंने अपने चरणोंके प्रहारसे उसके शरीरको सौ टुकड़ोंमें विदीर्ण कर डाला। गिरते हुए भी उस दैत्यके विशाल शरीरने अनेकों वृक्षोंको चूर-चूर कर दिया॥ ३५-३६॥ इस प्रकारसे उस दानवका वध करनेके अनन्तर बालक गुणेश माताके आगे खड़े हो गये। उसी समय मुनिगण, देवता तथा उन मुनियोंकी पत्नियाँ भी वहाँ आ पहुँचीं। वे सब देवी पार्वतीसे बोले—इस बालकपर कितने ही विघ्न आ रहे हैं, परंतु हे सुरेश्वरि! आपके पुण्यप्रतापके कारण वे सभी विनष्ट हो जा रहे हैं॥ ३७-३८॥ तदनन्तर उन सभीके द्वारा पूजित उस बालक गुणेशको अपनी गोदमें लेकर देवी पार्वती उन मुनिजनों और मुनिपत्नियोंके साथ मनमें अत्यन्त हर्षित होते हुए अपने भवनको गयीं। देवी शिवाने अपनी गोदसे उतारकर बालक गुणेशको आँगनमें उसी प्रकार रखा, जिस प्रकार कि प्राचीनकालमें देवताओंपर विजय प्राप्तकर गरुड़ने [कुशोंके ऊपर] अमृतको रखा था॥ ३९-४०॥ [तदनन्तर सहसा किंचित्] मूर्च्छाको प्राप्तकर वे बालक गुणेश धरतीपर बार-बार लोट लगाने लगे और अपने मुखकमलको फैलाकर बार-बार जँभाई लेने लगे। अभी-अभी इसे क्या हो गया है—ऐसा कहते हुए पार्वती दौड़कर उनके समीप गयीं तो उन्होंने उन विश्वरूपी गुणेशके मुखके भीतर सम्पूर्ण विश्वको देखा॥ ४१-४२॥ उन्होंने वहाँ सात द्वीपोंवाली पृथ्वी, नगरों, ग्रामों, वनों, खानों, पर्वतों, समुद्रों, ब्रह्मा, सूर्य, शेषनाग, विष्णु, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, मुनिजन, पक्षीसमूह, नदी, वापी, तड़ाग, चौदह मनुओं, आठ वसुओं, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, तारासमूह, चेतन तथा अचेतन सभी प्राणियों, सात पातालों तथा इक्कीस स्वर्गोंको भी देखा॥ ४३-४५॥ इस प्रकार तीनों लोकोंका मुखके अन्दर दर्शनकर उस समय देवी पार्वतीको मूर्च्छा आ गयी। वे अपनी दोनों आँखोंको बन्दकर दो मुहूर्ततक भ्रमित-सी होती रहीं॥ ४६॥ उन्होंने मन-ही-मन भगवान् शिवका स्मरण किया, इससे वे सचेत हो गयीं, तब उन्होंने पहलेकी भाँति ही अपने सामने स्थित हुए बालक गुणेशको देखा। उन गुणेशके कृपाप्रसादसे प्रसन्न मनवाली वे देवी पार्वती गुणेशकी स्तुति करने लगीं॥ ४७१/२॥ पार्वती बोलीं—[हे प्रभो!] आप ही परमात्मा हैं और आप ही चराचर जगत्के गुरु हैं। आप चिदात्मा, आनन्दघन, शाश्वत, नित्य तथा अनित्य स्वरूपवाले हैं। मैंने आपकी कुक्षिमें चौदहों भुवनोंको देखा है। इसके साथ ही सभी देवताओं, यक्षों, राक्षसों, सभी नदियों, वृक्षसमूहों—इस प्रकारसे सम्पूर्ण चराचर जगत्का दर्शन किया है, जिसका वर्णन करना मेरे लिये सम्भव नहीं है। यह देखकर मैं उस समय भ्रान्त होकर भूमिपर गिर पड़ी, फिर जब मैंने भगवान् शिवका स्मरण किया, तभी मैं सचेत हो पायी, तब मैंने एक सामान्य बालककी भाँति ही बालकरूपमें आपको देखा॥ ४८-५१॥ ब्रह्माजी बोले—वे इस प्रकार स्तुति कर ही रही थीं कि उसी समय उन्होंने अपनी माया प्रकट कर दी। तब देवी पार्वतींने प्यारसे पुचकारते हुए उन्हें अपनी गोदमें ले लिया और स्तनपान कराया॥ ५२॥ तदुपरान्त भवनमें प्रवेशकर गिरिजा अपने घरके कार्योंमें संलग्न हो गयीं। सभी मुनिगण तथा मुनिपत्नियों भी अपने-अपने घरोंको चले गये। इस आख्यानका श्रवणकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५३॥ 'विश्वरूपदर्शन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विश्वरूपदर्शन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥

तिरानबेवाँ अध्याय

४९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिरानबेवाँ अध्याय गुणेशके पाँचवें वर्षमें खड्गासुरका ऊँटका रूप बनाकर तथा चंचल दैत्यका छायाका रूप धारणकर गुणेशकी बालमण्डलीमें आना, गुणेश्वरद्वारा लीलापूर्वक उनका वध करना

ब्रह्माजी बोले—बालक गुणेशका जब पाँचवाँ | दैत्य बालक विजय प्राप्त कर रहे थे और देवता बने वर्ष प्रारम्भ हुआ, तब एक दिन उषाकालमें ही मुनियोंके | बालकोंकी पराजय हो रही थी। हे अंग (व्यासजी)! बालक गुणेशके घरपर आये॥ १॥ | जब इस प्रकारसे वे बालक परस्पर युद्धक्रीडा कर रहे वे बोले—हे सखा! प्रातःकालकी बेलामें क्यों सो | थे, उसी समय खड्ग नामका एक महान् असुर वहाँ रहे हो, उठो, उठ जाओ। उन्होंने देवी पार्वतीसे भी | आया, वह ऊँटका रूप धारण किये हुए था, उसकी कहा—आप अपने बालकको उठाइये॥ २॥ | विशाल आकृति आकाशको छू रही थी॥ ११-१२॥ इसपर पार्वती उनसे बोलीं—क्या तुम्हें नींद नहीं | उसकी बहुत बड़ी पूँछकी वायुसे अनेक वृक्ष- आती, तुमलोग अत्यन्त चंचल हो, रात-दिन खेल | समूह टूटकर गिर गये थे। उसके दाँत शूलके समान खेलनेमें ही लगे रहते हो। तुम निर्लज्ज बालक मूर्खतावश | नुकीले थे, उसकी जिह्वा लपलपा रही थी, वह अपने पैरोंसे सूर्योदय होनेसे पहले ही कैसे यहाँ आ गये?॥ ३ १/२॥ | दिशाओंको रौंद रहा था। वह बड़ी ही तीव्र ध्वनि करके वे बालक बोले—हे माता! आपके वचनोंसे हमें | उन गुणेश्वरकी ओर दौड़ा। उसके महान् शब्दकी प्रतिध्वनिसे कभी भी क्रोध नहीं आ सकता। क्या हम आपके बालक | सहसा दिशाएँ और विदिशाएँ गूँज उठीं॥ १३-१४॥ नहीं हैं और क्या आप हमारी माता नहीं हैं? आपके | उसे देखकर सभी मुनिबालक भयसे व्याकुल हो इस शिशुपर हम सभीका मन सदा ही लगा रहता है। | उठे और भाग चले। कुछ बालक उन गुणेशसे 'दौड़ो- हम रात-दिन निरन्तर इसे अपने सामने पाते हैं। बिना | दौड़ चलो' इस प्रकारसे कहते हुए चिल्लाने लगे॥ १५॥ इसके हमारे मनमें सन्तोष नहीं होता॥ ४-६॥ | उन बालकोंके रुदन तथा चिल्लाहटको सुनकर उन सभीके वचनोंको सुनकर उस समय वे शिशु | एकाएक ही उन गुणेश्वरने अपना शरीर अत्यन्त विशाल गुणेश जग गये और बाहर आकर उन्होंने उन बालकोंका | बना लिया और उछलकर उस ऊँटस्वरूपधारी दैत्यके परस्पर आलिंगन किया। तदनन्तर वे सभी एक-दूसरेका | सिरपर अपने मुक्केसे उसी प्रकार प्रहार किया कि जैसे हाथ पकड़कर प्रसन्नतापूर्वक घरसे बाहर निकल पड़े। | वज्रका प्रहार महान् पर्वतपर हो रहा हो। इस आघातसे फिर दो भागोंमें बँटकर नाना प्रकारकी युद्ध-सम्बन्धी | उस दुष्ट दैत्यका हृदय छिन्न-भिन्न हो गया। वह अपने चेष्टाओंके द्वारा क्रीडा करने लगे॥ ७-८॥ | मुखसे बहुत-सारा रक्त उगलता हुआ, महाभयंकर शब्द वे सभी परस्पर मस्तकसे मस्तकपर, वक्षःस्थलसे | करके पृथ्वीतलपर गिर पड़ा। वह अपने पैरों तथा वक्षःस्थलपर और बाहुओंसे बाहुओंपर प्रहार करने लगे। | गरदनको पटकने लगा और बार-बार चिल्लाते हुए कोई परस्पर जल फेंक रहा था, कोई धूल फेंक रहा था, | उसने अपने शरीरको स्थिर करके क्षणभरमें ही अपने कोई-कोई गेंद तथा मुष्टियोंसे परस्पर प्रहार कर रहे थे। | प्राण त्याग दिये॥ १६-१८ १/२॥ कोई कीचड़ फेंककर तथा कोई गोबर फेंककर परस्पर | उसका शरीर अठारह योजन लम्बा-चौड़ा था, क्रीडा कर रहे थे। कोई किसी दूसरेको झुला रहा था | गिरते हुए उसके शरीरने अनेक वृक्षसमूहोंको गिरा डाला तथा कोई किसीको खींच रहा था॥ ९-१०॥ | था और भूमिपर गिरकर उसके शरीरने इतनी धूल कोई कोलाहल कर रहे थे और कोई-कोई सींग | उछाली कि क्षणभरमें ही सारा आकाश धूलसे ढक (शृंगवाद्य) तथा बाँसुरीकी ध्वनि कर रहे थे, कुछ | गया। उसकी देहके गिरनेसे अनेक जीव-जन्तु तथा पक्षी बालक दैत्य बने हुए थे और कुछ देवता बने हुए थे। | भी गिर पड़े॥ १९-२०॥

क्री०ख०-अ०१३ ] * गुणेशके पाँचवें वर्षमें खड्गासुर दैत्यका लीलापूर्वक वध करना * ४९१ उस दैत्यको इस प्रकारसे गिरा हुआ देखकर वे सभी मुनिकुमार उस समय कहने लगे—हे पार्वतीपुत्र! बहुत अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ, आपने उस महान् दैत्यको मार डाला है। उस महान् दैत्यको देखकर तो हम सभी डरकर भाग गये थे, आप तो छोटे-से हैं, फिर आपने कैसे उस महान् दैत्यको अपने पराक्रमसे मार डाला? हम सभी अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर पुनः आपके पास आये हैं। ऐसा कहकर वे सभी बालक पूर्वकी भाँति ही परस्पर एक-दूसरेके चरणकमलोंको पकड़कर खींचते हुए पुनः क्रीड़ा करने लगे ॥ २१–२३ १/२ ॥ थोड़ी ही देरके पश्चात् उस ऊँटरूपधारी दैत्यका एक मित्र वहाँ आया, वह अपने मरे हुए मित्रका बदला लेना चाहता था, उसने छायाका रूप धारण किया था, वह महान् बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न था। उसके चरणके आघातसे शेषनागका शरीर भी काँप उठता था ॥ २४–२५ ॥ उस छायारूपधारी दैत्यका मस्तक आकाशको छू रहा था, वह दुष्ट दैत्य गुणेशके पीछे गया और उन गुणेशकी छायामें प्रविष्ट होकर उस समय उसने उन्हें गिरा दिया था। वह बड़ा ही मायावी था, महान् बलशाली था। उस समय वह अन्य सभीसे अदृश्य हो गया। इसके उपरान्त वह दैत्य नृत्य करने लगा। वह जिस प्रकार नृत्य कर रहा था, वे गुणेश भी उसी-उसी प्रकार नाच रहे थे ॥ २६–२७ ॥ उन मुनिबालकोंने जब उन गुणेशको [नाचते-नाचते] गिरता हुआ देखा तो कुछ बालक अत्यन्त दुखी हो उठे और कुछ बालक दौड़ते हुए उनके पास जाकर कहने लगे—हे नाथ! आप क्यों गिरे जा रहे हैं ? इस समय आपका वह सामर्थ्य कहाँ चला गया ? आप बार-बार क्यों अपने प्रिय मित्रोंके ऊपर गिरे जा रहे हो ? ॥ २८–२९ ॥ तदनन्तर बालक गुणेशने शीघ्र ही दसों दिशाओंमें चारों ओर देखा। फिर उन्होंने बल लगाकर आगे जानेकी चेष्टा की, किंतु वे आगे जानेमें समर्थ न हो सके। पुनः उन्होंने ध्यान लगाकर चारों ओर दृष्टि डाली, तब उन गुणेश्वरने अपनी छायामें प्रविष्ट उस दैत्यके विषयमें जाना ॥ ३०–३१ ॥ तदनन्तर उन्होंने पर्वतकी एक टूटी चट्टान उठाकर उस राक्षसके उदरपर फेंका और उसके ऊपर चढ़कर वे नृत्य करने लगे। इससे वह दैत्य मरकर चूर-चूर हो गया। अन्तिम समयमें उस दुष्ट दैत्यने अपना विशाल स्वरूप बनाया और गिरते हुए उसने अनेक वृक्षों, पर्वतों तथा प्राणियोंको चूर-चूर कर डाला ॥ ३२–३३ ॥ उसके मेद तथा रक्तसे वहाँकी पृथ्वी तथा वे गुणेश्वर भी लथपथ होकर उसी प्रकार लाल-लाल रंगके दीखने लगे, जैसे कि वसन्त-ऋतुमें पलाशका [पुष्पित] वृक्ष रक्तवर्णका हो जाता है ॥ ३४ ॥ इस प्रकार उस छायारूपी दैत्यको शीघ्र ही मारकर गुणेश लीलापूर्वक क्रीडा करने लगे। उसी समय एक महाभयंकर दैत्य वहाँ आ पहुँचा। उसके कन्धे बैलके कन्धेके समान अत्यन्त सुदृढ़ थे, उसका मुख सूअरके समान था तथा उसका उदर हाथीके समान था ॥ ३५ ॥ उस दैत्यका नाम था चंचल। वह बालकका रूप बनाकर उन बालकोंके मध्य प्रविष्ट हो गया। उसके श्वासके छोड़े जानेसे पर्वतोंकी चट्टानें भी धूलके समान उड़ जाती थीं ॥ ३६ ॥ उसके नृत्यसे पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी कम्पित हो उठती थी, उन बालकोंके बीच उसने विविध प्रकारकी क्रीड़ाएँ बड़ी ही कुशलताके साथ दिखलायीं ॥ ३७ ॥ उस महान् बलशाली तथा महामायावी दैत्यने कुछ बालकोंको जमीनपर पटक दिया। किसी मुनिबालकका पाँव पकड़कर वह खींचने लगा। किसी बालकके दोनों हाथोंको कसकर पकड़कर उसके माथेपर चोट मारी। वे सभी बालक धूपमें अपने शरीरपर मिट्टी लगा रहे थे ॥ ३८–३९ ॥ बालकोंकी देखा-देखी वह दैत्य भी अपने शरीरमें मिट्टीका लेपन उसी प्रकार करने लगा, जैसे कि कोई भाग्यशाली अपने शरीरमें चन्दनका अनुलेपन करता है। तदनन्तर उन बालकोंने मिट्टीकी गेंद बनायी और उससे खेल खेलना प्रारम्भ किया। किसी बालकद्वारा आकाशमें उछाली गयी गेंदको जो बालक अपने हाथसे पकड़ लेता था, वह उस गेंदसहित उस उछालनेवाले बालकपर घोड़ेके समान सवारी करता था ॥ ४०–४१ ॥ तदनन्तर सवारी करनेवाला वह बालक उस गेंदको Kalyana Visheshank 2021_Section_17_1_Front

४९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- बलपूर्वक जमीनपर फेंकता था। तब भूमिपर टकराकर उछलती हुई उस गेंदको कोई दूसरा बालक अथवा वही बालक पकड़ता था॥ ४२॥ जिसके हाथ वह गेंद लगती थी, वह उस बालकपर सवार होकर पुनः गेंदको जमीनपर फेंकता था, भूमिपर गिरी हुई उस गेंदको उठा लेनेवाला बालक उस गेंदको फेंककर किसी दूसरे बालकको मारता था॥ ४३॥ भागनेवाले उन बालकोंमेंसे जिस बालकको वह गेंद लगती थी अथवा जिसके हाथसे छू जाती थी, उसे भी वह गेंद आकाशमें उछालनी होती थी॥ ४४॥ यदि वह गेंद किसीके हाथ नहीं आती थी तो उसे पुनः वह गेंद आकाशकी ओर फेंकनी होती थी, आती हुई उस गेंदको जो हाथमें पकड़ लेता था, वह उस बालकपर आरूढ़ होकर गेंदको पूर्ववत् फेंकता था। इसी क्रममें एक बार गुणेशने गेंद आकाशमें फेंकी, जिसे चंचल नामक दैत्यने हाथसे पकड़ लिया। तब नियमानुसार वह असुर चंचल बालक गुणेशपर सवार हुआ। अपने भारसे उन देव गुणेशको दबाता हुआ वह दुष्ट दानव बोला- अरे दुष्ट बालक! तुम इन बालकोंके बीच बड़ी डींग हाँकते हो, अब मेरे भारको सहन करो॥ ४५-४७॥ वह बार-बार गेंदको उछालता था, और पुनः अपने हाथसे उसे पकड़ भी लेता था। इसी प्रकारसे उस दुष्ट दानवने दो मुहूर्ततक गेंदसे क्रीड़ा की। वहाँ उपस्थित वे सभी मुनिबालक गुणेशकी वैसी दशा देखकर हँसने लगे। तदनन्तर वे गुणेश दृढ़ पराक्रम दिखाते हुए उस दैत्यके ऊपर सवार हो गये ॥ ४८-४९॥ यह देखकर वह चंचल नामक दैत्य गुणेशको दूर ले जानेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ उतावला होकर आकाशमार्गसे चल पड़ा। अन्य बालक भूमिपर ही उसके पीछे-पीछे जाने लगे ॥ ५० ॥ वह दैत्य कभी विमानकी गतिके समान और कभी उड़ते हुए पक्षीके समान बड़ी तेजीसे उड़ रहा था। गुणेशके साथी वे बालक शोक करते हुए वापस लौट आये और अपने-अपने घरोंको चले गये। कुछ बालक वहीं ठहर गये और गुणेश्वरके वापस आनेकी प्रतीक्षा करने लगे। तदनन्तर विभु गुणेशने उस दुष्ट दानवकी नीयत मनसे जानकर एकाएक अपना भार हिमालयपर्वतके समान भारी बना लिया। उस भारके कारण वह दैत्य गिर पड़ा और गुणेश्वरसे कहने लगा - ॥ ५१-५३॥ मेरे ऊपरसे अपना महान् भार उतार लो, अन्यथा मेरे प्राण चले जायँगे। आप मुझ दीनपर दया कीजिये, मैं आपकी शरणमें हूँ। ऐसा कहता हुआ वह दैत्य मूर्च्छित हो गया। तब बालक गुणेशने उसे उसी प्रकार पकड़ लिया, जैसे गरुड़ सर्पको पकड़ लेता है, और गुणेशने उसे बार-बार घुमाया, और उस चंचल नामक दुष्ट दानवको दूर देशमें फेंक दिया ॥ ५४-५५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'चंचल [आदि असुरों]-के वधका वर्णन' नामक तिरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९३ ॥ चौरानबेवाँ अध्याय मुनिबालकोंके साथ गुणेशका महर्षि गौतम तथा अहल्याके आश्रममें जाकर ओदन-क्रीडा करना, पार्वतीद्वारा गुणेशको बन्धनमें डालना तथा उनकी मायासे मोहित होना, महर्षि गौतमद्वारा अहल्यासे गुणेश्वरकी भगवत्ताका वर्णन ब्रह्माजी बोले- मुनियोंके जो बालक वहाँ गुणेशके आनेकी प्रतीक्षा कर रहे थे, वे सभी गुणेशके आनेपर उनके समीप गये। उनके जयकारके शब्दोंसे सम्पूर्ण आकाश-मण्डल, दिशाएँ और दिशाओंका मध्य भी गर्जन करने लगा ॥ १ ॥ वे सभी पुनः विविध प्रकारके नृत्यों तथा गीतोंसे अनेक प्रकारकी क्रीड़ाएँ करने लगे। बालकोंके इस प्रकारसे क्रीडा करते-करते सूर्योदयके अनन्तर डेढ़ प्रहरका समय व्यतीत हो गया ॥ २ ॥ उन सभीके माता-पिता उनको ढूँढ़ते हुए जब Kalyana Visheshank 2021_Section_17_1_Back

क्री०ख०-अ०१४] * बालकोंके साथ गुणेशका महर्षि गौतमके आश्रममें जाकर ओदन-क्रीडा करना * ४१३ गाँवके मध्य किसी भी घरमें नहीं देख पाये, तब वे सभी छड़ी लेकर वहाँ उन बालकोंके पास गये, जहाँ वे सब चारों ओर गोला बनाकर तथा गुणेश्वरको बीचमें करके अनेक प्रकारकी क्रीडा कर रहे थे। उन लोगोंने स्वयं नाच रहे और दूसरे बालकोंको भी नचा रहे गुणेशकी भर्त्सना की ॥ ३-४ ॥ माता-पिता बोले-तुम्हारे साथके बिना हमारे बालक न तो स्नान करते हैं और न भोजन करते हैं। इन्होंने अपने आचार-विचार, अध्ययन, ब्राह्मणोचित कर्मों तथा विनयका भी परित्याग कर दिया है ॥ ५॥ तदुपरान्त उन गुणेशका दर्शनकर उनका क्रोध जाता रहा और वे आपसमें एक-दूसरेसे कहने लगे- इसको ताड़ित करनेकी पहले हमारी जो बुद्धि हो रही थी, वह इसे देखकर इस प्रकार न जाने कहाँ चली गयी है? यदि हम इसके माता-पिता शिव-पार्वतीसे इसके विषयमें कहते हैं, तो वे भी इसका क्या कर लेंगे ? इस बालकने तो अनेकों महान् बलशाली दैत्योंका वध कर डाला है। हे गुणेश्वर ! तुम्हारे भयसे हम कहीं दूसरे स्थानपर चले जाते हैं ॥ ६-७१/२॥ ब्रह्माजी बोले- वे लोग इस प्रकार कह ही रहे थे कि वे गुणेश्वर वहीं अन्तर्धान हो गये और फिर दूर जाकर उस स्थानपर प्रकट हुए, तब बालकोंने उन्हें देखा तो वे सभी बालक अपने माता-पिताको छोड़कर पुनः उन गुणेशके पास चले गये ॥ ८-९ ॥ खेलते-खेलते वे सभी शीघ्र ही महर्षि गौतमजीके श्रेष्ठ आश्रममें पहुँच गये। वहाँ उन्होंने मुनि गौतमको ध्यानमें स्थित देखा और उनकी भार्याको भोजन पकाते हुए देखा। उस समय वे गुणेश रसोईके मध्यस्थानमें गये और उन्होंने भातका बर्तन उठा लिया तथा उन सभीको विभाजितकर अन्न प्रदान करके वे आदरपूर्वक उनसे कहने लगे ॥ १०-११ ॥ मेरे साथ रहनेके कारण तुम सभी लोग बहुत देरतक भूखे रह गये। अब निश्चिन्ततापूर्वक भोजन कर लो, उसके बाद पुनः हमलोग क्रीडा करेंगे ॥ १२ ॥ तब महर्षि गौतमकी भार्या देवी अहल्या शीघ्र ही उन गुणेशपर गुस्सा हो गयीं और बोलीं- तुमने मेरे अन्नका स्पर्श क्यों किया ? हे चंचल बालको ! अभीतक न तो बलिवैश्वदेवकर्म किया गया है और न ही देवताओंको भोग लगाया गया है। वे मुनिश्रेष्ठ गौतम जब ध्यान पूर्णकर आयेंगे तो क्या करेंगे ? तब देवी अहल्याने उन मुनिश्रेष्ठ गौतमको ध्यानसे जगाया ॥ १३-१४ ॥ जब मुनि गौतमका ध्यान भंग हुआ तो उन्होंने क्षुधासे व्याकुल उन सभी बालकोंको भोजन करते हुए देखा। तदनन्तर वे गुणेश्वरसे बोले ॥ १५ ॥ गौतम बोले- श्रेष्ठ माता-पिताके पुत्र होकर भी आप अन्याय क्यों करते हैं? आपके अत्यन्त अद्भुत कर्मोंके विषयमें सुनकर हम इससे पूर्व आपको परात्परतर परब्रह्मस्वरूपी भगवान् मान चुके हैं, लेकिन हे गुणेश्वर ! लगता है, इस समय आप बालभावसे यह सब कर रहे हैं ॥ १६-१७ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर वे मुनि गौतम गुणेश्वरका हाथ पकड़कर पार्वतीके भवनमें आये, वे अपने हाथमें अन्नसहित उस पात्रको भी घरसे साथमें ले आये थे। गौतम बोले- हे माता ! आपका यह बालक नित्य मेरे साथ अन्याय करता है। आज मैं आपसे यही बात कहने आया हूँ, हे गौरी! अब इसके बाद मुझे क्या करना चाहिये ? यदि आप यह चाहती हैं कि मैं यहाँसे कहीं दूर रहनेके लिये चला जाऊँ, तो वैसा आप बोलें ॥ १८-१९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर मुनिके वचनोंको सुनकर पार्वती अत्यन्त रुष्ट हो गयीं, वे अपनी आँखोंसे आग बरसाती हुई छड़ीसे गुणेशको पीटने लगीं और क्रुद्ध हुई वे गौरी मुनिको प्रणामकर विनयपूर्वक उनसे कहने लगीं ॥ २०-२१ ॥ हे मुने ! इसके जन्म लेनेके समयसे ही मुझे भय लगा रहता है, मुझे राक्षसोंके द्वारा किये जानेवाले न जाने कितने ही विघ्नसमुहोंको अभी और देखना है ॥ २२ ॥ यह तो सब प्रकारसे दुष्ट और मुनियोंके पुत्रोंमें वैर उत्पन्न करनेवाला है, फिर भी स्त्रियाँ तथा मुनिश्रेष्ठ कोई भी इसकी बात बताने मेरे पास नहीं आते हैं ॥ २३ ॥ 'यह पार्वतीका पुत्र है' यह समझकर लोग इसे शाप नहीं देते हैं। तदनन्तर पार्वतीने उन महर्षिके सामने Kalyana Visheshank 2021_Section_17_2_Front

४९४ ॐ पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् ॐ [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ही पुत्र गुणेशके हाथ-पैरोंको बाँधकर और उन्हें घरके तदनन्तर पार्वती ने दरवाजा खोला और बालक भीतर डालकर उस घरके दरवाजेको दृढ़तापूर्वक बन्द गुणेशको बन्धनसे मुक्तकर वे प्रसन्नतापूर्वक उन्हें अपना कर दिया। 'ऐसा न करो-ऐसा न करो' कहते हुए मुनि स्तनपान कराने लगीं। इधर महर्षि गौतम अपने आश्रममें गौतम अपने आश्रमके लिये चले गये ॥ २४-२५ ॥ आ गये और देवताओंका पूजन करने लगे ॥ ३१ ॥ तदनन्तर वे सभी बालक उन गुणेश्वरके विषयमें महर्षिने उन सभी देवताओंको गुणेशके रूपवाला चिन्ता करने लगे कि इसका दर्शन हमें किस प्रकार और ही देखा, जो भोगसे तृप्त हो गये थे। उन्होंने सामने ही कब होगा? गिरिकन्या पार्वती ने तो कसकर दरवाजा भोगमें प्रदत्त अन्नको बिखरा हुआ भी देखा। यह बन्द करके उसे घरके भीतर बन्द कर दिया है। वे देखकर महर्षि गौतमके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ३२ ॥ बालक इस प्रकारसे बोल ही रहे थे कि उसी समय क्षणभरमें वे अपने मनमें विचार करने लगे कि मैंने दुर्बुद्धियुक्त ही वे गुणेश उन सबके बीच आ पहुँचे ॥ २६-२७ ॥ कार्य किया है। मैंने गुणेशके विषयमें सबकुछ पार्वतीको वे बालक गुणेश उस एक ही समयमें माताकी बता दिया और भोजनका पात्र भी उन्हें दिखला दिया। गोदमें तथा घरके भीतर भी दिखायी दे रहे थे। तब उन इसपर देवी पार्वती ने जगत्के कारण तथा अव्यक्त बालकोंने उनसे कहा—हे गौरी ! आपका पुत्र घरसे बाहर स्वरूपवाले उन गुणेश्वरको पीटा भी और बन्धनमें भी निकल आया है ॥ २८ ॥ डाल दिया। वे पर-से भी सदा परे हैं, जिनके तृप्त उस समय देवी पार्वती ने गुणेश्वरको घरके भीतर होनेपर महान् फलकी प्राप्ति होती है ॥ ३३-३४ ॥ बँधा हुआ ही देखा और बाहर खड़े उन मुनिबालकोंको ऐसे उन गुणेशने मुनिबालकोंके साथ यहाँ आकर भी गुणेशके स्वरूपवाला ही देखा ॥ २९ ॥ भोजन किया था, उनकी मायासे मोहित हो जानेके यह देखकर पार्वती व्याकुल हो गयीं। वे जिस कारण मैं पहले उन्हें जान नहीं सका था ॥ ३५ ॥ किसीको भी गुणेश्वर समझकर अपना स्तनपान करानेके ब्रह्माजी बोले—यह सब देखकर देवी अहल्या लिये बुलाने लगीं, उस समय वे बालक पार्वतीसे मना भी अत्यन्त आश्चर्यचकित मनवाली हो गयीं और करते थे और कहते थे कि हे शिवे ! आपका पुत्र गुणेश उन्होंने दोबारा भोजन बनाया। महर्षि गौतमने भी ध्यानमें तो घरके भीतर ही स्थित है ॥ ३० ॥ स्थित होकर अपने सभी नित्यकर्मोंको पूर्ण किया ॥ ३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गौतमाश्रमगमन' नामक चौरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९४ ॥ पंचानबेवाँ अध्याय गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनके लिये पार्वतीके पास आना, विश्वकर्माका पार्वतीकी स्तुति करना, पार्वतीका उन्हें भक्तिका वर देना, विश्वकर्माद्वारा गुणेशका स्तवन और उन्हें अंकुश आदि आयुध प्रदान करना, गुणेशके द्वारा आयुधोंकी प्राप्ति कहाँसे हुई—इस जिज्ञासापर विश्वकर्माका सूर्य तथा संज्ञाकी कथा सुनाना, विश्वकर्माका प्रस्थान, उसी समय वृकासुर दैत्यका वहाँ आना, गुणेशद्वारा असुरका वध ब्रह्माजी बोले—छठे वर्षके प्रारम्भ होनेपर किसी गये। तब पार्वती ने अपने कक्षसे बाहर निकलकर उनका एक दिनकी बात है, पार्वतीके पुत्र वे गुणेश बालकोंके बहुत मान-सम्मान किया ॥ १-२ ॥ साथ कहीं बाहर गये और वहाँपर अनेक प्रकारकी उन्हें एक चित्रासनपर बैठाकर आदरपूर्वक उनकी क्रीड़ाएँ करने लगे। उनका दर्शन करनेकी इच्छासे पूजा की। उनके चरणोंका प्रक्षालनकर उन्हें गन्ध तथा देवशिल्पी विश्वकर्मा वहाँ उनके घरके भीतरकी ओर ताम्बूल प्रदान किया ॥ ३ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_17_2_Back

क्री०ख०-अ०९५] * गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनहेतु पार्वतीके पास आना * ४९५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] देवी पार्वतीके द्वारा प्राप्त आदरभावको देखकर विश्वकर्मा अत्यन्त प्रसन्न हो गये। वे देवी पार्वतीको परम श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके प्रसन्न होकर उनकी स्तुति करने लगे॥ ४॥ विश्वकर्मा बोले—हे विश्वेश्वरि! आप ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अर्यमा एवं विष्णुस्वरूपा हैं, आप विश्वस्वरूपाको मैं प्रणाम करता हूँ। हे अनन्तशक्तिस्वरूपा! आपने ही इस जगत्की सृष्टि की है। आप ब्रह्मा आदि देवताओंके द्वारा अभिनन्द्य स्वरूपवाली हैं॥५॥ हे माता! आप ही रजोगुणका आश्रय लेकर विश्वकी संरचना करती हैं, सत्त्वगुणका आश्रय लेकर उसका पालन-पोषण करती हैं और आप ही पुनः तमोगुणका आश्रय लेकर उसका संहार भी करती हैं। यह त्रैगुण्यभाव आपका नित्य स्वरूप है। आपने ही समस्त दैत्योंका वध किया है। आपकी शरण ग्रहण किये हुए ब्रह्मर्षिगण अपने ज्ञानके कारण मुक्तिको प्राप्त करते हैं। आप ही विष्णुकी अतुलनीय शक्ति हैं, आप ही जगत्की कारणभूता परम मायाशक्ति हैं॥ ६-७॥ सत् तथा असत्की पराशक्ति आप ही हैं। आप ही इस चराचर जगत्की सृष्टि करनेवाली हैं। आप सभी लोगों तथा सभी देवेश्वरोंको सम्मोहित करके काष्ठा तथा कला आदि समयकी सूक्ष्म गतियोंके द्वारा उन्हें कर्मोंका भोग प्रदान करती हैं॥८॥ जिन्होंने आपकी शरण ग्रहण कर ली है, उन्हें न तो मृत्युका भय रहता है और न कभी दैत्योंसे उत्पन्न भय ही रहता है। आप पुण्यात्माजनोंके लिये लक्ष्मीरूपा

[दायाँ स्तम्भ] हैं, दुष्टात्माओंके लिये अलक्ष्मीस्वरूपा हैं और समस्त स्त्रियोंके रूपमें भी आप ही विद्यमान हैं॥ ९॥ आप तीनों लोकोंमें विद्यारूपा हैं, सूर्य तथा चन्द्रमामें आप ही प्रभाके रूपमें विद्यमान हैं। हे माता! जिन्होंने आपकी शरण ग्रहण कर ली है, वे सम्पूर्ण जगत्के आश्रय बन जाते हैं। उन्हें लेशमात्र भी विपत्ति नहीं आती॥ १०॥ हे विश्वेश्वरि! आप ही इस विश्वका संहार करती हैं और जलरूपसे आप ही इसका आप्यायन भी करती हैं। आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, विष्णु, शंकर, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी आप दुर्लभ हैं। आपकी कृपा होनेपर ही भक्तजन आपका भजन करनेमें समर्थ हो पाते हैं और अन्तमें आनन्दस्वरूप होकर स्वर्गमें निवास करते हैं। जो आपकी भक्ति नहीं करते, ऐसे जनोंपर रुष्ट होकर आप उनके वांछितोंका विनाश करती हैं। हे माता! मैंने आपकी शरण ग्रहण की है॥ ११-१२॥ हे जगन्माता! आज मेरे ये दोनों नेत्र धन्य हो गये, मेरी विद्या धन्य हो गयी, मेरा जन्म लेना सफल हो गया, मेरे मातृवंश तथा पितृवंश—दोनों धन्य हो गये और मेरा कुल भी धन्य हो गया, जो कि मुझे आपके चरणयुगलोंका दर्शन प्राप्त हुआ है*॥ १३॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे स्तुति की गयी जगज्जननी देवी पार्वतीने उनसे वर माँगनेके लिये कहा। तब विश्वकर्माने जगदम्बाकी परम भक्तिका आशीर्वाद माँगा, इसपर देवीने उनसे कहा—ऐसा ही होगा॥ १४॥


[मूल संस्कृत श्लोक]

  • विश्वकर्मोवाच नमामि विश्वेश्वरि विश्वरूपे ब्रह्मेन्द्ररुद्रार्यमविष्णुरूपे। त्वया ततं विश्वमनन्तशक्ते ब्रह्मादिदेवैरभिनन्द्यरूपे॥ त्वमेव विश्वं रजसा विधत्से सत्त्वेन मातः परिपासि तच्च। त्वमेव सर्वं तमसाथ हंसि त्रैगुण्यमेतत् तव नित्यरूपम्॥ त्वया हता दैत्यगणा विमुक्तिं ब्रह्मर्षयो ज्ञानबलात्प्रपन्नाः। त्वमेव विष्णोरतुलासि शक्तिः सर्वस्य हेतुः परमासि माया॥ सतोऽसतो वापि परासि शक्तिश्चराचरं त्वं विदधासि विश्वम्। सम्मोह्य लोकान्सकलान्सुरेशान्काष्ठाकलाभिश्च ददासि भोगम्॥ ये त्वां प्रपन्ना न भयं तु तेषां मृत्योस्तथा दैत्यकृतं कदाचित्। त्वमेव लक्ष्मीः सुकृतामलक्ष्मीर्दुष्टात्मनां त्वं प्रमदास्वरूपा॥ विद्यास्वरूपासि जगत्त्रये त्वं प्रभास्वरूपा शशिसूर्ययोस्त्वम्। य आश्रितास्ते जगदाश्रयास्ते विपत्तिलेशो न च तेषु मातः॥ त्वमेव विश्वेश्वरि विश्वमेतद्धरस्त्यथाप्यायसि वारिरूपा। अनादिमध्यानिधनाप्यगम्या हरीशलोकेशसुरेश्वराणाम्॥ तेऽनुग्रहात्त्वां प्रभजन्ति भक्ता आनन्दरूपा निवसन्ति नाके। अभक्तकामान् विनिहंसि रुष्टा त्वामेव मातः शरणं प्रपन्नः॥ धन्ये ममैते नयनेऽद्य विद्या जनुश्च माता पितृवंश एव। कुलं च धन्यं चरणौ त्वदीयौ दृष्टौ यतस्ते जगदम्बिके मया॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ९५।५-१३)

४९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [श्रीगणेशपुराण- जो विश्वकर्माद्वारा किये गये इस जगदम्बास्तोत्रका पाठ करता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त करता है। वह सर्वत्र विजय, पुष्टि, विद्या, आयु, सुख तथा कल्याणको प्राप्त करता है ॥ १५ ॥ शिवा बोलीं—हे विश्वकर्मा ! हे महान् बुद्धिसे सम्पन्न ! आप सब प्रकारसे ज्ञानवान् हैं। भगवान् शिवसे मैंने आपके विषयमें जो कुछ सुना था, वह सब आज मैंने आपमें प्रत्यक्ष विद्यमान देख लिया है ॥ १६ ॥ सिन्धु दैत्यके द्वारा पीड़ित सभी देवता कारागारमें पड़े हुए हैं। भगवान् शिवका धाम कैलास भी उसके द्वारा अधिगृहीत कर लिये जानेके कारण वे शिव भी यहाँ आ गये हैं। इस दण्डकारण्य नामक स्थानपर कोई भी आप्त पुरुष नहीं दिखायी देता। बहुत समयके अनन्तर आप भलीभाँति यहाँ दृष्टिपथमें आये हैं ॥ १७-१८॥ विश्वकर्मा बोले—हे जगन्माता ! यदि पुत्र माताके पास आता है, महान् भक्त यदि अपने अभीष्ट देवके दर्शनके लिये जाता है और हे शिवे ! विद्या ग्रहण करनेकी इच्छावाला यदि गुरुके पास जाता है तो इसमें क्या आश्चर्य है ! ॥ १९ ॥ हे माता ! मैंने आपके पुत्रकी परम अद्भुत महिमाका श्रवण किया है, आप दोनोंके दर्शनोंका अभिलाषी मैं आपके पुत्रका [भी] दर्शन करनेके लिये आया हूँ ॥ २० ॥ ब्रह्माजी बोले—जब वे विश्वकर्मा और माता पार्वती इस प्रकारसे परस्पर वार्तालाप कर रहे थे कि उसी समय वे विनायक वहाँ आ पहुँचे। धूलिधूसरित देहवाले उन गुणेशकी कान्ति असंख्य चन्द्रमाओंके सदृश थी ॥ २१ ॥ उनका मुखमण्डल अत्यन्त प्रसन्न था, वे बालकोंके समूहोंसे घिरे हुए थे। उन बालकोंके मध्य वे उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे मरुद्गणोंके मध्य इन्द्र सुशोभित होते हैं। उनका दर्शनकर विश्वकर्माने उन्हें प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर सामने खड़े हो गये। उन गिरिजापुत्रको परमात्मा जानकर वे उनकी स्तुति करने लगे ॥ २२-२३ ॥ विश्वकर्मा बोले—[हे प्रभो !] आप सत्-चित् तथा आनन्दमय विग्रहवाले हैं, समस्त चर और अचर जगत्के गुरु हैं और सभी कारणोंके भी कारण परमात्मा हैं। आप गुणेश नामसे प्रसिद्ध हैं, गुणातीत हैं, सृष्टि, स्थिति तथा संहारके कारणस्वरूप हैं, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हैं, ईशान हैं तथा व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूपवाले हैं। आप सभी देवताओंके लिये अगम्य हैं, मुनिजनोंके हृदयकमलमें निवास करनेवाले हैं, सिद्धि तथा बुद्धिके स्वामी हैं, विविध भक्तोंको सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं, सर्वसमर्थ हैं, अभक्तोंकी कामनाओंका दमन करनेवाले हैं आपकी प्रभा हजारों सूर्योंके समान उज्ज्वल है, आप अनेक प्रकारकी शक्तियोंसे समन्वित हैं, और दैत्यों तथा दानवोंका मर्दन करनेवाले हैं। आप अनादि, अव्यय, शान्त, जरा-मरणसे रहित, ब्रह्मा-विष्णु तथा शिव—इस प्रकारसे त्रिविध विग्रह धारण करनेवाले और वेदत्रयीके मूलरूप हैं, आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २४-२८॥ ब्रह्माजी बोले—विश्वकर्माद्वारा की गयी इस प्रकारकी स्तुतिको सुनकर वे गुणेश्वर अत्यन्त सन्तुष्ट हो गये, उन्होंने उन विश्वकर्माको उत्तम आसनपर बैठाकर बड़े ही आदरभावसे उनकी पूजा की। उन्होंने उनके चरणोंको प्रक्षालित करके उन्हें गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य निवेदित करके उनसे कहा ॥ २९-३० ॥ गुणेश बोले—हे विश्वकर्मा ! आप मेरे दर्शनकी अभिलाषासे यहाँ आये हैं तो बताइये कि आप मेरी प्रसन्नताके लिये कौन-सा श्रेष्ठ उपहार मेरे लिये लाये हैं ? ॥ ३१ ॥ विश्वकर्मा बोले—जो स्वात्मानन्दसे परिपूर्ण हैं, दूसरेकी अभिलाषाको पूर्ण करनेवाले हैं, सब प्रकारसे इच्छारहित हैं, सब कुछ करनेवाले हैं, सभी प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न है, मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा सोनेमें समान बुद्धि रखनेवाले हैं, कल्पवृक्षको भी तिरस्कृत कर देनेवाले हैं, कर्तुम्, अकर्तुम् तथा अन्यथाकर्तुम् समर्थ हैं, आत्माधीन हैं, सब प्रकारसे सन्तुष्ट हैं और स्वेच्छाशक्तिसे विचरण करनेवाले हैं, ऐसे आप- जैसे दिव्य महापुरुषोंके सन्तोषके लिये भला सब प्रकारसे पराधीन, सब प्रकारके सामर्थ्यसे रहित, सर्वथा

क्री०ख०-अ०१५ ] * गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनहेतु पार्वतीके पास आना * ४९७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अकिंचन मुझ-जैसे मृत्युधर्मा प्राणीके द्वारा क्या देनेयोग्य हो सकता है, फिर भी मैं अपने सामर्थ्यके अनुसार कुछ लाया हूँ॥ ३२-३४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहनेके अनन्तर विश्वकर्माने उनके समक्ष सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला एवं तीक्ष्ण धारवाला अंकुश, पद्म, हजारों सूर्योंके समान प्रभाववाला परशु तथा पाश नामक शस्त्र रखा। गुणेश्वरने उन शस्त्रोंको ग्रहण किया॥ ३५-३६॥ तब गुणेश्वरने विश्वकर्मासे कहा—हे अनघ! हे विश्वकी संरचना करनेवाले! आप इन शस्त्रोंको कहाँसे लाये हैं, अब मेरी प्रसन्नताके लिये यह मुझे बतायें॥ ३७॥ विश्वकर्मा बोले—'संज्ञा' नामसे प्रसिद्ध मेरी एक कन्या है, वह सुन्दर रूपसे सम्पन्न है, उसके मुखको देखकर चन्द्रमा भी एकाएक लज्जित हो गये थे। हे गुणेश्वर! लक्ष्मी, इन्द्रपत्नी शची, सावित्री, शारदा, अरुन्धती अथवा कामदेवकी पत्नी रति और तीनों लोकोंमें भी कोई स्त्री ऐसी नहीं है, जो उसके समान सुन्दर हो॥ ३८-३९॥ उसे मैंने स्वयं ही वेदत्रयीस्वरूप तथा त्रिदेवस्वरूप भगवान् सूर्यको पत्नीरूपमें समर्पित किया था। उस विवाहमें सांगोपांग अर्थात् वाहन, परिवारादिके साथ त्रिलोकीके सभी निवासी आये थे॥ ४०॥ वह महान् विवाह-महोत्सव आठ दिन-राततक निरन्तर चलता रहा। उस संज्ञाको देखकर क्षुभित हुए देवता लज्जासे अधोमुख हो वहाँसे चले गये थे॥ ४१॥ तदनन्तर भगवान् सविता उस संज्ञाको साथ लेकर अपने श्रेष्ठ स्थानको चले गये। उन भगवान् सूर्यके तेजसे संतप्त होकर मेरी कन्या संज्ञा अत्यन्त दुर्बल हो गयी। तदनन्तर उस संज्ञाने अपने सामर्थ्यके प्रभावसे अपनी छायाके रूपमें अपने ही समान छाया नामक एक स्त्रीकी संरचना की। फिर उसे सब कुछ समर्पितकर वह शीघ्र ही मेरे घरको आ गयी॥ ४२-४३॥ इसी प्रकारसे जब कुछ समय व्यतीत हो गया तो सूर्यने छायाकी वास्तविकताको जान लिया। 'यह संज्ञा नहीं है'—ऐसा जानकर वे सूर्य शीघ्र ही मेरे घर चले आये। तदनन्तर भयभीत संज्ञाने पुनः मुझसे कहा—हे पिता! मुझे सूर्यके हाथ न सौंपें, मैं इनके तेजको सहन करनेमें असमर्थ हूँ॥ ४४-४५॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर पिता विश्वकर्माके द्वारा धिक्कारे जानेपर वह घरसे बाहर चली गयी। वह संज्ञा अश्विनी(घोड़ी)-का रूप धारणकर गुप्त रूपसे वनमें रहने लगी॥ ४६॥ इसके पश्चात् विश्वकर्माने उस संज्ञाको घरमें कहीं भी न देखकर सूर्यसे कहा—वह संज्ञा आपके तेजको सहन करनेमें समर्थ नहीं है। वह कहाँ चली गयी, यह मैं भी नहीं जानता, किंतु उसकी प्राप्तिका उपाय मैं बताता हूँ, यदि आपके तेजका कुछ भाग कम हो जाय, तो वह संज्ञा प्रकट हो जायगी और तब आप उसके साथ विहार करें॥ ४७-४८१/२ ॥ सूर्य बोले—यदि आपका मन इस प्रकार करनेका है तो आप वैसा ही करें॥ ४९॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर विश्वकर्माने उन सूर्यको यन्त्रमें स्थापितकर उन्हें कुछ छील दिया और शीघ्र ही उनके तेजको कम कर दिया, जिससे वे कुछ सौम्य- स्वरूपवाले हो गये॥ ५०॥ तब विभु सूर्य वहाँ गये, जहाँपर संज्ञा गुप्तरूपसे निवास कर रही थी। भगवान् सूर्यने अश्वका रूप धारणकर अश्विनी बनी हुई उस संज्ञाके साथ रमण किया। तब संज्ञाने नासत्य अथवा दस्र कहे जानेवाले दो अश्विनी- कुमारोंको जन्म दिया। तदनन्तर संज्ञाको लेकर भगवान् सूर्य बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने लोकको गये॥ ५१ १/२ ॥ विश्वकर्मा बोले—हे गुणेश्वर! हे जगदीश्वर! भगवान् सूर्यके तेजका जो भाग छीलनेपर शेष रह गया था, उस अत्यन्त प्रबल तेजसे मैंने अत्यन्त शीघ्र ही आपके लिये आयुधोंका निर्माण किया, ये आयुध अत्यन्त तीक्ष्ण और कालपर भी सदा विजय दिलानेवाले हैं॥ ५२-५३॥ मैंने ये चार आयुध आपको प्रदान किये हैं, चक्र तथा गदा भगवान् विष्णुको दी है और सभी शत्रुओंका विनाश

४९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

करनेवाला त्रिशूल भगवान् शिवको प्रदान किया है ॥ ५४ ॥ गुणेश बोले—हे विश्वकर्मा! आपने बहुत अच्छा किया, जो मुझे ये शुभ आयुध प्रदान किये हैं, ये आयुध दैत्योंका नाश करनेके लिये तथा सज्जनोंके परोपकारके लिये उपयोगी सिद्ध होंगे ॥ ५५ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर उन विश्वकर्मासे उन्होंने शीघ्र ही उन आयुधोंको ग्रहण किया और उनके प्रयोगकी परीक्षा की, जिससे सम्पूर्ण पृथ्वी, पर्वत तथा वन काँप उठे। वे विभु गुणेश्वर करोड़ों सूर्योंकी कान्तिके सदृश उन शस्त्रोंसे अत्यन्त शोभाको प्राप्त हुए। तदनन्तर वे विश्वकर्मा उनकी आज्ञा लेकर और उन्हें प्रणामकर अपने स्थानको चले गये ॥ ५६-५७ ॥ वे उमाके पुत्र बालक गुणेश बालकोंसे घिरे रहकर पुनः उनके साथ क्रीड़ा करने लगे, उसी समय वहाँ एक अत्यन्त दुष्ट महादैत्य आ पहुँचा, उसका नाम था वृक। उसका मुख बड़ा ही भयंकर था, वह मदोन्मत्त, महान् बलशाली वृक मानो सबको निगलता जा रहा था। वह अपनी पूँछके आघातसे पृथ्वीको प्रकम्पित कर रहा था। उसके दाँत हलके समान बड़े तथा अत्यन्त नुकीले थे ॥ ५८-५९ ॥ उस भयंकर दैत्यको देखकर मुनिबालक भाग उठे। गुणेशने शीघ्र ही आयुधोंको ग्रहणकर उस वृकासुरको प्रताड़ित किया ॥ ६० ॥ वह दैत्य असुर अंकुशके एक ही प्रहारमात्रसे भूमिपर गिर पड़ा। वह अपने मुखसे रक्त उगल रहा था। उसने अपना असली दैत्यका रूप धारण कर लिया, गिरते समय वह वृक्षोंको चूर-चूर करता हुआ तथा अनेक जीवोंको मारता हुआ दस योजन विस्तारवाला हो गया था। तदनन्तर सूर्यास्त हो जानेके अनन्तर वे गुणेश्वर बालकोंके साथ घरको चले आये ॥ ६१-६२ ॥ उन बालकोंने देवी उमाको बताया कि आज इस गुणेशने वृक नामक असुरको अपने अंकुशके आघातसे मार डाला। वह असुर दस योजन विस्तृत शरीरवाला था। तब गिरिकन्या पार्वतीने क्रुद्ध-सी होकर उन बालकोंसे कहा—तुम लोग अपने-अपने घरोंको जाओ। पार्वतीका यह वाक्य सुनकर वे सभी बालक हँसते हुए अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ६३-६४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'वृकासुर-वधवर्णन' नामक पंचानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९५ ॥

छियानबेवाँ अध्याय सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न होना, यज्ञोपवीत-महोत्सवका वर्णन, उसी अन्तरालमें वहाँ आये कृतान्त तथा काल नामक दैत्योंका वध करना, महर्षि कश्यप तथा अदितिद्वारा गुणेश्वरका पूजन, देवताओंद्धारा बालक गुणेश्वरकी महिमाका प्रतिपादन

ब्रह्माजी बोले—एक दिनकी बात है, देवी पार्वती प्रसन्न भगवान् शिवसे बोलीं ॥ १/२ ॥ शिवा बोलीं—हे देवेश्वर! इस समय बालक गुणेशका सातवाँ वर्ष प्रारम्भ हो गया है, अतः किसी शुभ मुहूर्तमें बड़े ही समारोहके साथ गुणेशका उपनयन-संस्कार सम्पन्न करना चाहिये ॥ १ १/२ ॥ शिव बोले—हे भद्रे! तुमने मेरे मनकी बात जानकर बहुत अच्छी बात कही है। अब मैं इस बालकका यज्ञोपवीत-संस्कार यथोचित विधि-विधानके साथ कराऊँगा ॥ २ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—देवी पार्वतीसे इस प्रकार कहकर भगवान् शिवने महर्षि गौतमको बुलवाया और शुभ दिनमें लग्नका विचार करके संस्कारकी सामग्रीको एकत्र किया। अत्यन्त विस्तृत लग्नमण्डप तैयार किया गया, सभी ऋषियों तथा मुनियोंको आमन्त्रितकर और उन सभीका पूजनकर तथा उनकी अनुमति प्राप्तकर भगवान् शिवने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक बालक गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न किया ॥ ३–५ ॥

क्री०खं०-अ०१६ ] * सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न होना * ४९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ]

उन सभी ऋषि-मुनियोंने भगवान् शिव, देवी पार्वती तथा बालक गुणेशको अनेक प्रकारके उपहार प्रदान किये। भगवान् शिवने उन अठासी हजार ऋषि- मुनियोंको नमस्कार करके उनका यथाविधि पूजन किया और उन्हें विविध प्रकारकी भेंट प्रदान की॥ ६१/२ ॥ उसी प्रकार उन्होंने तैंतीस करोड़ देवताओं, यक्षों, किन्नरों तथा चारणोंको भी उपहार प्रदान किये। उस समय विविध वाद्योंकी ध्वनि हो रही थी, किन्नरगण गान कर रहे थे, नर्तकियोंके समूह तीव्रगतिसे नृत्य कर रहे थे और सभी लोग उस मांगलिक महोत्सवका अवलोकन कर रहे थे। ऐसे समयमें भगवान् शिवने बड़ी ही प्रसन्नताके साथ सभीको विविध उपहार तथा दान दिये ॥ ७-९॥ उन्होंने देवताओंकी स्थापना करके सभीको भोजन कराया। प्रातःकाल बटुक गुणेशको स्नान करानेके अनन्तर उनका चूडाकरण-संस्कार कराया और चार ब्राह्मणोंके साथ बटुकको भी भोजन कराकर पुनः उन्हें स्नान कराया॥ १०१/२॥ बनायी गयी वेदी तथा बटुकके मध्य उत्तम वस्त्रकी ओट लगाकर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करनेवाले मुनिजनोंके साथ उपनयनका मुहूर्त शोधित करके [भगवान् शिव] मुहूर्तके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे॥ १११/२ ॥ इसी समय वहाँ कृतान्त तथा काल नामवाले दो दैत्य आ पहुँचे। वे उन्मत्त हाथीका रूप धारण किये हुए थे, उनके गण्डस्थलसे मदरूपी जल प्रवाहित हो रहा था, वे बड़े ही सुदृढ़ शरीरवाले थे, उनके दाँत अत्यन्त तीक्ष्ण थे, उनकी लम्बायमान सूँडें आकाशसे स्पर्धा कर रही थीं। वे दोनों अपनी चिंघाड़ ध्वनिसे लोगोंको भयभीत कर रहे थे, उन दोनोंके मस्तक सिन्दूरके समान अरुण वर्णके थे, उनके पैरोंके प्रहारसे पृथ्वी तीव्र गतिसे काँप रही थी ॥ १२-१४॥ युद्ध करते हुए वे दोनों एक-दूसरेपर अपने दाँतोंसे प्रहार कर रहे थे। जिसके कारण उठी धूलसे पृथ्वी तथा आकाशका मध्य भाग ढक गया था। वे दोनों हाथी

[दायाँ स्तम्भ]

सभामण्डपके द्वारदेशमें स्थित इन्द्रके हाथी ऐरावतके समीप आ गये ॥ १५ ॥ उन्होंने अपने दाँतोंके प्रहारोंसे उस ऐरावत हाथीके अत्यन्त सुदृढ़ गण्डस्थलको भेद डाला। फलतः वह गजेन्द्र ऐरावत रक्त बहाने लगा और क्षणभरमें ही मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ा ॥ १६ ॥ फिर एक मुहूर्तके बाद चेतना प्राप्तकर वह ऐरावत शीघ्र ही वहाँसे पलायित हो गया। उसके पीछे-पीछे दौड़ते हुए उन दोनों हाथियोंने अपने दाँतोंके आघातसे पुनः उसपर प्रहार किया ॥ १७ ॥ तदनन्तर वे दोनों उन्मत्त हाथी सभाके मध्यमें आ गये। उस समय उन्होंने अपनी सूँड़ोंके द्वारा उस सभा- मण्डपको उखाड़ डाला ॥ १८ ॥ वहाँ स्थित सभी लोग उन दोनों हाथियोंके कोलाहलको सुनकर उठ खड़े हुए, वे दोनों हाथी जिधर-जिधर जाते थे, वहाँ-वहाँसे देवता पलायित हो जाते थे ॥ १९ ॥ उन दोनों हाथियोंसे भयभीत होकर मुनिगण दसों दिशाओंमें भाग चले। तदनन्तर शिवगणोंने वहाँ जाकर भगवान् शिवको यह समाचार दिया कि एक विघ्न उपस्थित हो गया है॥ २० ॥ गण बोले— उन दोनों हाथियोंके भयसे भयभीत होकर इन्द्र तथा मुनियोंसहित सारी सभा भंग हो गयी है। पार्वतीजी भी अपनी सखियोंके साथ वहाँसे पलायित होकर घर आ गयीं ॥ २१ ॥ तदनन्तर बालक गुणेशने उन दोनों अत्यन्त बलशाली दैत्यरूपी हाथियोंको देखकर मेघके समान गर्जना की और शीघ्र अपने दोनों हाथोंसे उन दोनोंकी सूँड पकड़ ली। इससे वे दोनों जोरसे चिंघाड़ने लगे। गुणेशने उन दोनोंको घुमाकर एक हाथीको दूसरे हाथीके ऊपर पटक दिया ॥ २२-२३ ॥ उन दोनोंके सैकड़ों टुकड़े हो गये और वे दोनों जमीनपर गिर पड़े। उनके गिरनेसे भूमि काँप उठी और वृक्ष चूर-चूर होकर धराशायी हो गये ॥ २४ ॥