भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 480, कुल 656 में से

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पृष्ठ 480

४७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दुःख उठाने पड़े हैं। क्या इस दैत्यके हाथों अपने पुत्रसहित मेरी मृत्यु लिखी है ? यह अगर उत्पन्न ही नहीं होता, तो इस प्रकारका बन्धन मुझे कैसे प्राप्त होता ? ॥ १३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-माता पार्वतीके इस प्रकारके विलापको सुनकर उमापुत्र वे महामनस्वी बालक गुणेश उस समय बादलोंकी भाँति दिशाओंको गुँजाते हुए बार-बार उच्च स्वरमें गर्जना करने लगे। उस गर्जनासे समुद्र, वन तथा खानोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी कम्पित हो उठी ॥ १४-१५ ॥ उस समय जब प्रमथगणों आदिने देवी पार्वतीको वहाँ नहीं देखा, तो वे शोक करने लगे। तदनन्तर बालक गुणेशने अपने चरणोंके प्रहारसे उस शय्यापर प्रहार किया। उस ध्वनिसे सभी प्राणी एकाएक भयभीत-से हो गये। आकाश मानो सैकड़ों भागोंमें विभक्त हो गया। उनके पादाघातसे वह शय्या टुकड़े-टुकड़े होकर भूमिपर गिर पड़ी। तब वह तल्पासुर दीख पड़ा तो बालक गुणेशने उसे पकड़ लिया और एक हाथसे उन्होंने लीलापूर्वक अपनी माताको इस प्रकार पकड़ लिया, जैसे कि चातक पक्षी मेघसे छूटी हुई जलकी बूँदको अपनी चोंचद्वारा सहसा पकड़ लेता है ॥ १६-१८१/२ ॥ बालक गुणेशने माताको अपने कन्धेपर बैठा लिया और बायें हाथसे तल्पासुरकी चोटी पकड़कर बड़े वेगसे सहसा उसे भूमिपर पटक दिया। फिर वे एक योगीकी भाँति पद्मासन लगाकर उस दैत्य तल्पासुरकी देहके ऊपर बैठ गये ॥ १९-२० ॥ बड़े वेगसे बलपूर्वक मसल दिया गया वह दैत्य दूर आकाशसे भूमिपर गिर पड़ा, मुँहसे बार-बार रक्त वमन करते हुए उस दैत्य तल्पासुरने प्राण त्याग दिये। लोगोंने देखा कि वह दुष्ट दैत्य इक्कीस योजन विस्तारवाला है। वह वृक्षों, पत्थरों, आश्रमों तथा घरोंको चूर-चूर करता हुआ गिरा ॥ २१-२२ ॥ तभी गणों तथा सखियोंने उस बालकको देखा तो वे कहने लगीं-हे गौरी ! तुम्हारा यह बलवान् बालक कुशलसे है और प्रसन्न होकर खेल कर रहा है ॥ २३ ॥ उस समय देवी पार्वती भ्रान्तिवश आकाश, पृथ्वी तथा अपने बालकके विषयमें कुछ भी नहीं जान पा रही थीं। तब मुनिजनोंने उनसे कहा- हे सती ! आप सावधान मनवाली हो जाइये। आपके बालकने विशाल रूप धारणकर उस दैत्य तल्पासुरका वध कर डाला है। हे शुभे ! आप अपनी आँखें खोलकर अपने बालकको पहले-जैसी स्थितिमें देखिये, जो कि कुशलसे है और मंगलकारी है ॥ २४-२५ ॥ ब्रह्माजी बोले-उन मुनिजनोंके कथनसे वे पार्वती सचेत हो उठीं और तब उन्होंने उस दैत्यको तथा बालक गुणेशको देखा ॥ २५१/२ ॥ गौरी बोलीं- क्या मैं कुछ विपरीत देख रही थी कि बालकने मुझे उठा रखा है। अथवा क्या सचमुच इस बालकने इक्कीस योजनवाले इस महान् दैत्यका वध कर डाला है। मुझे जीवनदान प्रदान करनेवाला यह बालक अपने मातृ-ऋणसे उऋण हो गया है ॥ २६-२७ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने बालकको ले लिया और शान्तिकर्म करवाया। [ब्राह्मणोंको] अनेक दान प्रदान किये और फिर अपने बालकको स्तनपान कराया ॥ २८ ॥ इस [दैत्यवधरूप] कौतुकको देखकर वहाँ उपस्थित सभी जनोंने बालककी प्रशंसा की और वे अत्यन्त प्रसन्नतासे भर गये। इसी समय एक दूसरे महान् असुरने बड़ा भयंकर शब्द किया ॥ २९ ॥ उसकी शब्दध्वनि दुन्दुभिवाद्यके समान थी, इसलिये वह दुन्दुभि नामसे ही विख्यात भी था। उसकी हथेलीके आघातसे पृथ्वी चूर-चूर हो जाती थी ॥ ३० ॥ उसके गगनचुम्बी विशाल शरीरसे भगवान् सूर्य ढक जाते थे। उसने [किसी] शिवगणके बालकका रूप धारणकर गौरीके बालक गुणेशको पुकारते हुए कहा- यहाँ आओ, आज हम दोनों मिलकर खेल करते हैं। तब वे बालक गुणेश भी उसके पास चले आये। तब उस बालकरूप दैत्यने पार्वतीपुत्र गुणेशको अपनी गोदमें बिठा लिया और उन्हें विषभरा एक फल दिया ॥ ३१-३२ ॥

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