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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 479, कुल 656 में से

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पृष्ठ 479

क्री०ख०-अ०८८ ] * आठवें मासमें बालक गुणेशद्वारा दैत्योंके वधका आख्यान * ४७७ उस कमठासुरने गिरते समय वहाँके वनों, आश्रमों और नाना प्रकारके वृक्षोंको एकाएक तोड़ डाला। इसके पश्चात् माता पार्वतीने प्रसन्न होकर अपने पुत्रको स्तनपान कराया। वे अपने मनमें सोचने लगीं कि नाना प्रकारकी माया करनेवाले असुरोंकी मायाको जाना नहीं जा सकता। भगवान् त्रिलोचन शंकरकी कृपासे मैंने अपने पुत्रको पुनः प्राप्त किया है॥ ५२-५३॥ जो कि इसने यमराजसे भी अधिक बलशाली कमठासुरको मार डाला। उसी समय देवी पार्वतीकी सखियाँ और उनके गण वहाँ आ पहुँचे और वे बालककी कुशल पूछने लगे ॥ ५४॥ देवी गौरीने उनको प्रसन्नतापूर्वक बतलाया कि सब कुशलसे है। तब गणोंने उस असुर कमठके टुकड़े- टुकड़े करके उन्हें बहुत दूर ले जाकर छोड़ दिया ॥ ५५ ॥ उस समय देवगणोंने उस बालकपर फूलोंकी वर्षा की। जो इस श्रेष्ठ आख्यानको सुनेगा अथवा सुनायेगा वह सभी प्रकारके अरिष्टोंसे मुक्त हो जायगा और अपनी सभी मनोभिलषित कामनाओंको प्राप्त कर लेगा ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कमठासुरके वधका वर्णन' नामक सतासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८७ ॥ अठासीवाँ अध्याय आठवें मासमें बालक गुणेशद्वारा किये गये तल्पासुर एवं दुन्दुभि नामक दैत्योंके वधका आख्यान व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन् ! आपके मुखारविन्दसे मैंने बालक गुणेशके द्वारा किये गये अद्भुत चरित्रोंको सुना, वे [श्रवण करनेसे] सब प्रकारके पापोंको दूर करनेवाले हैं ॥ १ ॥ तथापि हे सर्वज्ञोंमें श्रेष्ठ ! मेरी सुननेकी इच्छा अभी भी पूर्ण नहीं हुई है, अतः आप बालक गुणेशके चरित्रके विषयमें मुझे पुनः आदरपूर्वक बतायें ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! आप पुनः गुणेशकी कथाको सावधान होकर सुनें। इस कथाका श्रवण सभी पापोंका विनाश करनेवाला और धर्म तथा मोक्षको प्रदान करनेवाला है। बालक गुणेशके आठवें मासकी बात है। एक दिन ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालमें देवी पार्वती जब अपने भवनमें ग्रीष्मसे अत्यन्त पीड़ित हो गयीं तो वे पुष्पवाटिका में चली गयीं ॥ ३-४ ॥ वह वाटिका अशोक, चन्दन, कटहल, आम्र, बहेड़ा, मालती, चम्पक, जाती, चिंचडी, नीम तथा पारिजात वृक्षोंकी सघन छायासे आच्छादित थी। वहाँ एक रमणीय सरोवर था, जिसमें कमल खिले हुए थे और उस सरोवरका जल अत्यन्त सुन्दर तथा शीतल था। वहाँ बने हुए एक श्रेष्ठ पलंगपर सखीके द्वारा लाये गये शुभ बिस्तरमें वे गिरिजा अपने बालक गुणेशको लेकर निःशंक होकर सो गयीं ॥ ५-७॥ उस समय पार्वतीकी सखियाँ उन्हें अश्मा (रत्नादि)- से जटिल मूठवाले चाँवरसे पंखा झल रही थीं। जब वे गहरी निद्रामें सो गयीं, तब उसी समय महान् बलशाली दैत्य, जो तल्पासुर नामसे विख्यात था, वह वायुका रूप धारणकर वहाँ आया और शय्याके भीतर प्रविष्ट होकर उस शय्याको लेकर आकाशमें उड़ चला ॥ ८-९ ॥ उस तल्पासुरके शब्दसे पार्वतीकी वे दोनों सखियाँ भयभीत हो भूमिपर गिर पड़ीं और इधर शय्यापर स्थित देवी पार्वती बहुत जोर-जोरसे चिल्लाने लगीं ॥ १०॥ आकाशमें स्थित होकर ही वे पार्वती क्रन्दन करते हुए कहने लगीं- हे शंकर ! दौड़ो ! दौड़ो। हे देव! मैंने कौन-सा [आपका] अपकार किया है, क्यों आप मेरी उपेक्षा कर रहे हैं? ॥ ११ ॥ यह तल्पासुर नामक दैत्य बहुत बलवान् है, यह आकाशको चीरता हुआ तेजीसे दौड़ रहा है। आप तो सब प्रकारसे समर्थ हैं, फिर पराये हाथमें गयी हुई अपनी भार्याकी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं ? ॥ १२ ॥ इस पुत्रके साथ सम्बन्ध होनेसे मुझे नाना प्रकारके