श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 551, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१९५] * दैत्यराज सिन्धुका सुसज्जित होकर रणभूमिके लिये प्रस्थान * ५४९ उसके सामने तुम्हारी क्या गणना? हे मूढ़ ! मैं तुम्हारे वधके लिये उत्सुक तो हूँ, किंतु मेरी कृपा मुझे ऐसा करनेसे रोक रही है। तुम्हारे कोमल अंगोंको मैं अपने तीक्ष्ण बाणोंसे कैसे बींधूं ? ॥ २७१/२ ॥ देव बोले- अरे अधम ! रे पामर ! मूर्खतावश तुम किसलिये बकवास कर रहे हो? यदि मैं जानता कि तुम्हारा इतना छोटा शरीर है तो मैं अवतार ही ग्रहण नहीं करता। अब क्षणभरमें ही तुम लघु शरीरवालेको मैं मार डालूँगा ॥ २८-२९ ॥ अरे दुष्ट ! तुम सूर्यसे प्राप्त वरके प्रभावसे दुराचरणपरायण हो गये हो, किंतु अब वरदानका वह समय पूरा हो गया है, इस समय तुम्हारी मृत्युका समय उपस्थित हो गया है। तुम तो डींग हाँकनेमें ही कुशल हो, फिर इस समय कैसे मेरे साथ युद्ध करोगे ? तुम्हें मारनेके लिये तथा तुम्हारे बन्धनमें पड़े हुए देवताओंको छुड़ानेके लिये मैंने इस रूपमें अवतार धारण किया है ॥ ३०-३१ ॥ जब अन्तिम समय आ जाता है, तो सारा पुरुषार्थ व्यर्थ हो जाता है। मेरे हाथों मारे जानेपर तुम मेरे अत्यन्त दुर्लभ महास्थानको प्राप्त करोगे ॥ ३२ ॥ सिन्धु बोला- अरे मूर्ख! जबतक मैं तुम्हारी सुकुमार श्रेष्ठ देहको काट नहीं डालता, तभीतक तुम्हें जो बकना है, बक डालो। मरनेपर तो जो जिसका भक्त होगा, वह उसके लोकको प्राप्त करेगा। इस समय व्यर्थमें ही तुम अपनी प्रशंसा मत करो ॥ ३३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे कह करके उस महादैत्य सिन्धुने भगवान् सूर्यका स्मरण करके अपना धनुष उठाया और उसपर प्रत्यंचा चढ़ायी, तथा एक अत्यन्त सुतीक्ष्ण बाण उसपर चढ़ाया, वह बाण शत्रु का भेदन करनेवाला, अभीतक कभी न प्रकटित हुआ तथा विजय प्रदान करानेवाला था ॥ ३४-३५ ॥ उस धनुषकी टंकारसे तीनों लोक निनादित हो उठे। तदनन्तर उस दुष्ट सिन्धुने बड़े ही वेगसे वह बाण देव मयूरेशके ऊपर छोड़ा ॥ ३६ ॥ उस बाणने सभी दिशाओं, विदिशाओं तथा आकाश- मण्डलको भी जला डाला। तब उसे देखकर मयूरेशने अपना परशु छोड़ा, जो वज्रसे भी अधिक कठोर, सभी शत्रुओंके अभिमानको चूर-चूर कर देनेवाला और अत्यन्त श्रेष्ठ था। प्रलयकालीन अग्निके समान देदीप्यमान उस परशुने भी तीनों लोकोंको जला डाला ॥ ३७-३८ ॥ उस परशुने दैत्य सिन्धुके द्वारा छोड़े गये बाणको आकाशमें ही खण्ड-खण्ड कर डाला और उस दैत्यको भूमिपर गिराकर उसके उस हाथको सैकड़ों टुकड़ोंमें काट डाला, जो धनुषके भारको सहन करनेवाला और भयंकर था। तदनन्तर वह परशु दैत्यका हाथ काटकर पुनः आकाशमें चला गया ॥ ३९१/२ ॥ तदनन्तर क्रुद्ध होकर दैत्य सिन्धुने अपने शत्रु मयूरेशपर चक्र चलाया, उस चक्रने दिशाओंको निनादित करते हुए विद्युत्की भाँति ध्वनि की, उस चक्रको आता हुआ देखकर देव मयूरेशने अपने तीक्ष्ण शूलको उसपर छोड़ा ॥ ४०-४१ ॥ उस शूलने सम्पूर्ण जगत्को जला डाला था। वह उस दैत्य सिन्धुके मस्तकपर जा गिरा। वह शूल दैत्य सिन्धुके मुकुट, कानके कुण्डलों तथा कानोंका छेदनकर पुनः मयूरेशके हाथोंमें शीघ्र ही ऐसे जा पहुँचा, जैसे कि उसे छोड़ा ही न गया हो। तदनन्तर कटे हुए कानोंवाला वह महान् असुर सिन्धु क्रोधपूर्वक देव मयूरेशसे बोला- तुम्हारा पराक्रम तो मैंने आज देख लिया, अब तुम्हें भी अपना पौरुष दिखलाता हूँ। इस समय मैं अपने बाणके आघातसे तुम्हारी नाकको काट डालता हूँ ॥ ४२-४४ ॥ ऐसा कहकर हाथमें तलवार लेकर वह दैत्य सिन्धु गुणेश्वरकी ओर दौड़ा। तब मयूरेशने सभी ओर अपने अनेकों रूप बना लिये, जिनमें वे अपने चार हाथोंमें चार आयुध धारण किये हुए थे। यह देखकर वह दैत्य सिन्धु अत्यन्त विस्मयमें पड़ गया और दसों दिशाओंकी ओर देखने लगा ॥ ४५-४६ ॥ वह दैत्य जहाँ भी देखता, वहाँ उसे वे देव मयूरेश ही दिखायी देते, जो अपने चारों आयुधोंसे विभूषित थे। तब वह दैत्य सिन्धु अत्यन्त लज्जित हो गया और उसने अपने घर जानेका मन बना लिया ॥ ४७ ॥ तब भी उसने अपने सामने चार आयुध धारण किये