श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 552, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- हुए मयूरेशको देखा। फिर जब वह आँखें बन्द किये हुए | तदनन्तर वह दैत्यराज सिन्धु युद्धमें मरनेसे बचे हुए जाने लगा तो उसने अपने अन्दर हृदयमें उन्हीं मयूरेशको | उन सभी वीरोंसे घिरा हुआ रहकर अपने मुखकमलको विद्यमान देखा ॥ ४८ ॥ | आच्छादितकर युद्धस्थलसे अपनी पुरीको चला गया ॥ ५० ॥ फिर जब उसने अपनी आँखोंको खोला, तो पुनः | चिन्तासे अत्यन्त व्याकुल मनवाला वह दैत्यराज सामने मयूरपर आरूढ़ उन मयूरेशको देखा। तब भगवान् | सिन्धु भवनमें आकर अपनी शय्यापर लेट गया और वे सूर्यकी कृपासे दैत्य सिन्धुने मयूरेशको अपने अन्तःकरणमें | सभी वीर भी चिन्तासे व्यथितचित्त होकर अपने-अपने विराजमान रहनेवाला जाना ॥ ४९ ॥ | घरोंको चले गये ॥ ५१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुके वैरूप्यकरणका वर्णन' नामक एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११५ ॥ एक सौ सोलहवाँ अध्याय देव मयूरेशद्वारा सिन्धुदैत्यपर विजयप्राप्ति करनेपर मुनिगणों तथा देवी पार्वती एवं शिवका उनके दर्शनके लिये आना, युद्धमें मृत देवगणोंको खोजनेके लिये मयूरेश तथा मुनिगणोंका जाना, देव मयूरेशद्वारा मृत देवोंको अपने शरीरकी वायुके स्पर्शसे जीवित करना ब्रह्माजी बोले—देव मयूरेशको जब सिन्धुदैत्यपर | ज्ञानके हेतु हैं, प्रलयके कारण भी वे ही हैं। वे सभी विजयकी प्राप्ति हो गयी तो सभी मुनीश्वर उनका दर्शन | प्रकारके विकारोंसे रहित हैं, वे सर्वोत्तम देव मयूरेश करने उनके पास गये। भगवान् शिव भी देवी पार्वतीको | पृथ्वीके भारका उद्धार करनेके लिये नाना प्रकारके साथ लेकर उन्हें देखने गये। उस समय उत्सुकतावश | रूपोंको धारण करते हैं ॥ ५–७ ॥ पार्वतीने उनका आलिंगन किया और कहा ॥ १ १/२ ॥ | उनके एक-एक रोमकूपमें अनेक ब्रह्माण्ड व्याप्त पार्वती बोलीं—हे पुत्र! अत्यन्त कठोर दैत्य | हैं। वे एक होनेपर भी अनेकानेक स्वरूपवाले हैं। वे सिन्धुके साथ युद्ध करनेसे तुम बहुत थक गये हो। | तपस्याके बलसे समन्वित तथा योग और शास्त्रके ज्ञाता तुम्हारे शरीरके अंग तो अत्यन्त कोमल हैं, फिर तुमने | हैं। वे देव मयूरेश मायाका निवारण करनेवाले हैं, शस्त्रोंकी मारको कैसे सहन किया ? वह दैत्य तो महान् | मायावियोंको भी अपनी मायासे मोहित करनेवाले हैं और बलशाली है, साक्षात् यमराजके सदृश है और अनेक | बाल्यावस्था होनेपर भी अनेक दैत्योंका विनाश करनेवाले प्रकारकी मायाको जाननेवाला है। फिर कोमल अंगोंवाले | हैं, क्या तुम उन्हें नहीं जानती हो ? ॥ ८–९ ॥ तुमने उसे युद्धमें कैसे जीता ? ऐसा कहकर अपने बालक | ब्रह्माजी बोले—उन मयूरेशकी महिमाका श्रवणकर मयूरेशको गोदमें लेकर देवी पार्वती करुण विलाप करने | उस समय देवी पार्वती अत्यन्त हर्षित हो गयीं, तदनन्तर लगीं। तब सभी मुनिगणोंने तथा भगवान् शम्भुने पार्वतीको | हर्षमें भरे हुए मयूरेश मुनियोंसे तथा शिव एवं पार्वतीसे ऐसा करनेसे रोका ॥ २–४ १/२ ॥ | बोले ॥ १० ॥ शिव बोले— [हे देवि!] तुम मयूरेशको नहीं | मयूरेश बोले—हाथमें वज्र धारण करनेवाले जानती हो, वे सभी कारणोंके भी कारण हैं, आदि एवं | देवराज इन्द्रसे भी मुझे भय नहीं है, फिर अन्य किसी अन्तसे रहित हैं, साक्षात् भगवान् हैं, वेदान्त आदि | औरसे भय कैसे हो सकता है ? हे माता ! सभीको प्रणाम शास्त्रोंके लिये भी अगोचर हैं और सर्वसमर्थ हैं। तैंतीस | करनेसे, मुनिजनोंके आशीर्वादसे तथा भगवान् शिवके करोड़ देवता उनकी वन्दना किया करते हैं। वे देवताओंके | वरदानसे मैंने दैत्य सिन्धुपर विजय प्राप्त की है, उस शत्रुओंका विनाश करनेवाले हैं; सृष्टि, स्थिति तथा | दैत्यने तो कार्तिकेय आदि देवताओंपर भी विजय प्राप्त