श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 553, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०११६ ] * देव मयूरेशद्वारा सिन्धुदैत्यपर विजयप्राप्ति * ५५१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 की है, अतः वे देवता उससे युद्ध नहीं करते ॥ ११-१२॥ उस दैत्य सिन्धुकी सेनाके सैनिक वीरोंने असंख्य देवोंका वध किया है, जिससे वीरोंको हर्षित करनेवाली रक्तकी बहुत-सी नदियाँ प्रवाहित हो चली हैं। हे मुनीश्वरो ! अब हम लोग युद्ध करते-करते युद्धभूमिमें गिरे हुए देवोंका अन्वेषण करते हैं ॥ १३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—देव मयूरेशके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर धर्मज्ञ मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ उनसे बोले—हम सभी मुनिगण चलते हैं, अन्य सभी लोग भी चलें। तदनन्तर उन मुनिजनोंके साथ वे मयूरेश रणभूमिमें देवोंको खोजनेके लिये गये ॥ १४-१५ ॥ उस युद्धस्थलमें मज्जा, रक्त तथा चर्बीकी दुर्गन्धसे साँस लेना मुश्किल हो रहा था। अत्यन्त भयंकर आकृतिवाले, अनेक प्रकारसे छिन्न-भिन्न अंगोंवाले, वीभत्स रूपवाले तथा खिले हुए रक्तिम वर्णवाले पलाशके पुष्पके समान प्रतीत होनेवाले उन दैत्य वीरोंको देखकर दानवद्वेषी देवोंके मन घृणासे भर गये ॥ १६-१७ ॥ वहाँपर उन्होंने वीरोंके ऊपर गिरे हुए वीरोंके समूहोंको देखा। उनमेंसे कुछ जीवित थे और कुछ शस्त्रोंके आघातसे मूर्च्छित होकर पड़े हुए थे ॥ १८ ॥ कुछ वीरोंके अंग छिन्न-भिन्न हो गये थे। उस समय मयूरेशके साथ गये देवता उन देवताओंको खींचने लगे तो सहसा वे देव यह नहीं समझ पाये कि ये देवता हैं या दानव हैं। मयूरेशको देखकर कुछ वीर कहने लगे कि आपके निमित्तसे हम मृत्युको प्राप्त हुए हैं, अन्तिम समयमें हमें आपका दर्शन मिल गया है, ऐसा कहकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये ॥ १९-२० ॥ ब्रह्माजी बोले—उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर मयूरेशकी आँखोंसे आँसू निकल पड़े, उनका कण्ठ रुँध गया। युद्धभूमिमें घूमते-घूमते उन्हें आगे कार्तिकेय दिखलायी पड़े, जो मूर्च्छित पड़े हुए थे ॥ २१ ॥ अपनी आँखोंसे आँसू बहाते हुए बड़े ही स्नेहसे मयूरेश उनसे बोले—भइया ! उठिये, उठिये, आपका कल्याण हो, आप सामान्य व्यक्तिकी भाँति क्यों लेटे हुए हैं? दैत्योंका वध करते-करते आप थक गये हैं, अब मुझे अपना आलिंगन प्रदान करें। तदनन्तर मयूरेशने अपने हाथसे उनका संमार्जन किया, फिर वे कार्तिकेय उठकर खड़े हो गये ॥ २२-२३ ॥ उन्होंने अपने समीपमें स्थित देव मयूरेशके उस चरणकमलोंका दर्शन किया, जो समस्त भयोंको दूर करनेवाले हैं। फिर वे मयूरेशसे बोले—आपके दर्शनसे मेरा समस्त दुःख चला गया है, मेरा सारा श्रम दूर हो गया है, इस समय मैं अत्यन्त शान्तिका अनुभव कर रहा हूँ। तदनन्तर कार्तिकेयने अपने बारहहों हाथोंसे मयूरेशका आलिंगन किया ॥ २४-२५ ॥ तदनन्तर वे दोनों—मयूरेश और कार्तिकेय एक- दूसरेका हाथ पकड़कर युद्धस्थलको देखनेके लिये गये। आगे उन्होंने देखा कि बाणोंसे क्षत-विक्षत हुए वीरभद्र युद्धभूमिमें पड़े हुए हैं। वहींपर बाणोंके आघातसे अत्यन्त पीड़ित बलशाली नन्दीश्वरको देखा, फिर उनके आगे भूतराजको देखा, जिनका मस्तक कटा हुआ था ॥ २६-२७ ॥ फिर उन्होंने विलाप करते हुए विकट, अत्यन्त कष्टमें पड़े हुए पुष्पदन्त और दृढ़तापूर्वक विद्ध किये गये मस्तकवाले हिरण्यगर्भको देखा ॥ २८ ॥ ऐसे ही मृतप्राय चपलको तथा मृत्युको प्राप्त श्यामलको देखा। उस युद्धमें बुद्धिमें भ्रम हो जानेके कारण लम्बकर्ण किसीको पहचान नहीं पा रहे थे ॥ २९ ॥ उस समय सुमुख उदानवायुसे आक्रान्त होकर पड़े हुए थे। इसी प्रकार सोम तथा रक्तलोचन अत्यन्त कष्ट पा रहे थे। मूर्च्छित हो जानेके कारण भृंगी सोये हुए-से थे। पंचास्य मृत्युकी अभिलाषा कर रहे थे। शंख प्रेतत्वको प्राप्तकर सभी वीरोंको भयभीत कर रहे थे ॥ ३०-३१ ॥ इस प्रकारसे सभी वीरोंको मृतप्राय तथा मृत्युको प्राप्त देखकर वे मयूरेश अत्यन्त चिन्तित हो उठे और उन्होंने उन षडाननसे पूछा ॥ ३२ ॥ मयूरेश बोले—अपने पक्षके अथवा असुर पक्षके जो भी महावीर युद्धमें मारे गये हैं, वे सभी मेरे निज धामको प्राप्त हो गये हैं, किंतु जो अभी घायल हैं, उनकी कौन-सी गति होगी ? ॥ ३३ ॥ स्कन्द बोले—हे गुणेश्वर ! आप अनन्तानन्त कोटि ब्रह्माण्डोंके एकमात्र स्वामी हैं, आप ही सभी