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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 554, कुल 656 में से

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पृष्ठ 554

५५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराणं- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ - ऊपर] चौदह विद्याओं तथा कलाओंमें निधान हैं, फिर मुझसे आप ऐसा प्रश्न क्यों कर रहे हैं? न मैं कोई मन्त्र जानता हूँ और न कोई देवता ही जानते हैं, आप ही वह सब जाननेवाले हैं॥ ३४-३५॥ आप ही अनेकों दैत्योंका वध करनेसे अपनी कीर्तिका विस्तार कर रहे हैं, तथापि मैं आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये अपनी स्मृतिके बलपर यथामति कुछ कहता हूँ। प्राचीन समयकी बात है, त्रिपुरासुर-वधके समय भगवान् शिवने अद्भुत युद्ध किया था, उस युद्धमें मृत्युको प्राप्त देवताओंके क्षत-विक्षत अंगोंमें द्रोण पर्वतमें उत्पन्न होनेवाली लताके रसको लगाकर उन्हें तत्क्षण ही जीवित कर दिया था॥ ३६-३७ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—कार्तिकेयके द्वारा कहे गये इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे मयूरेश उन कार्तिकेयसे बोले—हे षडानन! अभी अत्यन्त बलवान् करोड़ों दैत्य युद्धके लिये यहाँ आयेंगे, तब कौन उनके साथ युद्ध करेगा?॥ ३८-३९॥ और कौन है, जो द्रोणपर्वतपर उस लताके श्रेष्ठ रसको लानेके लिये वहाँ जायगा ? ऐसा कहते हुए उस समय देव मयूरेशने अपनी मायाशक्तिको प्रकट किया। तब उन्होंने अपने शरीरको स्पर्शकर आनेवाली वायुके द्वारा उन सभी देवताओंको जीवित कर डाला। तब वे

[दायाँ स्तम्भ - ऊपर] देवता अत्यन्त प्रसन्न होकर उन गुणेश्वरको प्रणाम करने लगे। उन्होंने देव मयूरेश्वरका आलिंगन किया और उनसे यह निवेदन किया कि वे पुनः युद्ध करेंगे। साथ ही यह भी कहा कि आपके दृष्टिपातमात्रने हमारे बलको दुगुना कर दिया है॥ ४०-४२॥ गुणेश्वर बोले— ब्रह्मा आदि देवता आप सभीके बल-पराक्रमकी महिमाका गान करते हैं। आप लोगोंने तारकासुर आदि प्रधान-प्रधान दैत्य एवं दानवोंका वध किया है॥ ४३॥ ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर उन सभी देवताओंके साथ देव मयूरेश भगवान् शिवके समीप गये और भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीको प्रणाम करके युद्धमें जानेके लिये उद्यत हुए॥ ४४॥ प्रसन्न होकर माता पार्वती तथा शंकरने उन गुणेश्वरका आलिंगन किया। तदनन्तर कार्तिकेय आदि उन सभीने प्रसन्नतापूर्वक शिवका आलिंगन किया [और कहा—] हे शंकर ! हम युद्धमें निष्प्राण होकर गिर पड़े थे, तब अद्भुत कार्य करनेवाले मयूरेशके शरीरसे स्पर्श हुई वायुके संयोगसे हम पुनः जीवित कर दिये गये। अब हम इनके साथ पुनः युद्ध करनेके लिये जायँगे। हे भगवान् ! हम सभी आपके कृपाप्रसादसे युद्धमें सभी असुरोंपर विजय प्राप्त कर लेंगे ॥ ४५-४७ ॥

[अध्याय समाप्ति सूचक] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'रणशोधन' नामक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ११६॥

[अध्याय शीर्षक] एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पराजित होकर दैत्यराज सिन्धुका अपने भवनमें आकर अत्यन्त चिन्ताग्रस्त होना, उसकी पत्नी दुर्गाका वहाँ उपस्थित होना, दुर्गाके पूछनेपर दैत्यराज सिन्धुका अपनी चिन्ताका कारण बतलाना, दुर्गाका उसे समझाना तथा मयूरेशसे सन्धि करनेके लिये कहना, किंतु सिन्धुका उसके प्रस्तावको अस्वीकृतकर पुनः युद्धके लिये सुसज्जित होना

[बायाँ स्तम्भ - नीचे] ब्रह्माजी बोले— दैत्यराज सिन्धु शय्यापर पड़ा- पड़ा अत्यन्त चिन्तित हो उठा। उसका हृदय [चिन्ता एवं क्रोधरूपी अग्निसे] अत्यधिक सन्तप्त हो रहा था, इस कारण वह कुछ सोच-विचार नहीं कर पा रहा था ॥ १॥ वह हर्षसे सर्वथा रहित, म्लान मुखवाला, तेजसे हीन तथा पौरुषसे रहित हो गया था। तदनन्तर दैत्यकी

[दायाँ स्तम्भ - नीचे] दुर्गा नामक अत्यन्त सुन्दर पत्नी, जो उग्रकी पुत्री थी और सौन्दर्यकी लहरीके समान थी, वह पलंगपर बैठे हुए अपने पति सिन्धुको चिन्तारूपी नागिनके विषद्वारा दग्ध हुआ जानकर उसके समीपमें गयी। उस सुन्दरी दुर्गाके मस्तकपर अनेक आभूषणोंसे रचित बालोंकी लट सुशोभित हो रही थी, उसके ललाटपर कस्तूरीका सुन्दर तिलक