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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 555, कुल 656 में से

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पृष्ठ 555

क्री०ख०-अ०१९७ ] * पराजित दैत्यराज सिन्धुका अपने भवनमें आकर चिन्ताग्रस्त होना * ५५३ लगा हुआ था, उसने कण्ठमें हार धारण कर रखा था और अपने कटिदेशमें रत्नोंसे समन्वित करधनी धारण कर रखी थी। सभी अलंकारोंसे अलंकृत तथा सभी सुन्दर अंगोंवाली दैत्यराज सिन्धुकी पत्नीको उत्सुक होकर शय्याके समीप आया देखकर उस समय वहाँ उपस्थित सभी सेवक वहाँसे बाहर चले गये, तब वह अपने पतिसे बोली ॥ २-५ १/२ ॥ दुर्गा बोली- हे स्वामिन् ! आप चिन्ता क्यों करते हैं? जो होनेवाला है, वह अवश्य ही होकर रहेगा। यह समस्त संसार ईश्वरके अधीन है, कभी भी कोई स्वतन्त्र नहीं है। आप सभी जनोंके मनमें तथा मेरे मनमें भी उद्वेग क्यों पैदा कर रहे हैं? हे विभो ! आपके चिन्ता करनेका क्या कारण है, मुझे बतायें, मैं उसका उपाय आपको बताऊँगी ॥ ६-७ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- अपनी प्रिय पत्नीके वचनोंका श्रवण करके गण्डकीन‍गरका राजा वह सिन्धु सावधान- मन होकर सम्पूर्ण वृत्तान्त उसे बताने लगा ॥ ८ १/२ ॥ सिन्धु बोला- हे प्रिये! हे श्लाघ्ये! मनको अत्यन्त कष्ट पहुँचानेवाली बात तुम्हें क्या बतलाऊँ। युद्ध करते समय मयूरेशने मेरे दोनों कानोंको काट डाला। उनकी सात करोड़ संख्यावाली सेनाको मैंने अपने बल- पराक्रमसे मार डाला। स्कन्द आदि महान् वीरोंको मैंने अपनी बाणवर्षाके द्वारा गिरा दिया, किंतु अकस्मात् उस शत्रु मयूरेशने त्रिशूल छोड़कर मेरे दोनों कानोंको काट डाला। तब मैं वस्त्रसे अपना मुख ढककर अपने भवनमें चला आया। अब जिस उपायसे मेरे शत्रु‍का वध हो, वह मुझे बताओ ॥ ९-१२ ॥ दुर्गा बोली- हे स्वामी! आपने क्षत्रिय धर्मका ठीक-ठीक पालन किया है, और सभी सैनिकोंको भी मार डाला है, किंतु गौ, ब्राह्मण और देवताओंसे वैर करनेवाले यशको प्राप्त नहीं करते हैं ॥ १३ ॥ इनसे द्वेष करनेपर किसीका भी कभी भला नहीं होता है। इन गौ, ब्राह्मण तथा देवतादिकी सेवा करनेसे, इनका वन्दन करनेसे, इनका ध्यान करनेसे, इनका स्मरण करनेसे तथा इनका पूजन करनेसे ही इन्द्र आदि देवताओंने अपना-अपना पद प्राप्त किया है और वे अपने-अपने पदपर बने भी हुए हैं ॥ १४ १/२ ॥ जो सभी प्राणियोंमें समताका भाव रखता है और शुभ तथा अशुभ फल देनेमें समर्थ है, उस (परमात्मा)- की सेवा करनेसे कामधेनुकी सेवाके समान निश्चित ही अभीष्टकी सिद्धि होती है। जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही अंकुर उत्पन्न होता है ॥ १५-१६ ॥ अशुभ कर्मसे दुःख और शुभ कर्मसे सुखकी प्राप्ति होती है, अतः सदाचारी पुरुष सदा ही बड़े आदरपूर्वक शुभ कर्म ही करते हैं और शरीरसे, मनसे तथा वाणीसे सभी प्राणियोंका कल्याण करते हैं ॥ १७ १/२ ॥ आपने तो अपना पौरुष दिखाकर उन देवताओं तथा ऋषियोंको सदा ही दुःख पहुँचाया है, सच्चा पुरुषार्थ तो उसीको मानना चाहिये, जो पुरुषार्थचतुष्टय अर्थात् धर्म-अर्थ-काम एवं मोक्षको प्राप्त करानेवाला हो। जिसका मन धनके प्रति लोभ न करता हो और न कभी परायी स्त्रीके प्रति आकृष्ट होता हो, जो कभी भी अनिन्दनीयकी निन्दा न करता हो, जो सदा शरणमें आये हुएकी रक्षामें दृढ़प्रतिज्ञ हो और सदा धर्माचरणमें अनुरक्त रहता हो, उस पुरुषका किया वह सत्कर्म ही पुरुषार्थ है। सभी प्राणियोंमें समान बुद्धि रखनेको ही पुरुषार्थ जानना चाहिये। जो मनुष्य निष्छल भावसे दूसरेके दुःखका निवारण करता है, और उसके दुःखके कारण स्वयं भी दुःखका अनुभव करता है, वह व्यक्ति ही पुरुषार्थी कहा जाता है ॥ १८-२१ १/२ ॥ हे स्वामी! मेरे श्रेष्ठ वचनको सुनिये, जो आपके लिये परम कल्याणकारी है। आप दुर्वचन बोलनेवाले न बनें, सदा सत्यधर्ममें परायण रहें, अपने गुणोंका अपने मुखसे बखान न करें, सदा ही परोपकारमें परायण रहें और कभी भी दूसरेकी निन्दा न करें। हे महाभाग! यदि आप मेरा स्नेह पाना चाहते हैं, तो जो मैं कहती हूँ, उसका अनुपालन करें। आप बन्धक बनाये गये इन्द्रसहित सभी देवताओंको बन्धनसे मुक्त कर दें। ऐसा होनेपर सम्पूर्ण लोकोंके पालनकर्ता वे मयूरेश वापस चले जायँगे। हे स्वामिन्! तब हम सभी सुखपूर्वक रहेंगे और इसके विपरीत होनेपर हमें सुख नहीं प्राप्त होगा ॥ २२-२५ ॥ ब्रह्माजी बोले-दुर्गाद्वारा कहा गया इस प्रकारका