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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 556, कुल 656 में से

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पृष्ठ 556

५५४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

वचनरूपी अमृत उस दैत्य सिन्धुको उसी प्रकार विषके | युद्धमें वीरगति प्राप्त होनेपर तो स्वर्गकी प्राप्ति समान प्रतीत हुआ जैसे कि मृत्युकी अभिलाषा रखनेवाले | होगी और तीनों लोकोंमें यश होगा, किंतु शत्रुकी पुरुषको तथा ग्रहोंकी बाधासे पीड़ित व्यक्तिको औषधि | शरणमें जानेपर तो अपयश भी होगा और अपने विषतुल्य प्रतीत होती है। दैत्यराज सिन्धुने अपनी पत्नीके | पूर्वजोंसहित मुझे शीघ्र ही नरक भी जाना पड़ेगा, उस कल्याणकारी उपदेशको हृदयमें धारण नहीं किया, | इसमें संशय नहीं है ॥ ३३१/२ ॥ वह क्रोधसे आँखें लाल करता हुआ उस दुर्गासे बोला- हे | मैं उन मयूरेशको भलीभाँति जानता हूँ, वे देवोंके भद्रे! तुमने लोकमें निन्दा करानेवाले वचनको कहकर | भी देव हैं और सम्पूर्ण जगत्के गुरु हैं, और वे मेरे ठीक ही किया है। कार्य तथा अकार्यके विषयमें ज्ञान रखने- | विनाशके लिये उसी प्रकार प्रकट हुए हैं, जैसे रावणके वाले मैंने तुम्हारी चतुराईको जान लिया है॥ २६-२८॥ | विनाशके लिये रघुवंशमें श्रीराम अवतरित हुए थे। जिसे अपना मान प्रिय हो, ऐसा कोई नहीं, जो | तथापि मेरी यह निश्चित बुद्धि है कि मैं उनका सिर शत्रुके शरणमें जाता हो। प्रथम तो अन्यायपूर्ण कार्य | काटकर गिरा डालूँगा ॥ ३४-३५ ॥ करना ही नहीं चाहिये, फिर अगर उसका प्रारम्भ कर | शूरवीर अपना शरीर छोड़ देते हैं, किंतु स्वाभिमानको ही दिया हो तो किसी प्रकार भी उसका परित्याग नहीं | कभी नहीं छोड़ते। हे सुन्दर भौंहोंवाली! मेरे सामने करना चाहिये। भले ही उस कार्यसे उसे सुख हो अथवा | यमराजकी भी कभी कोई गणना नहीं है, तो फिर दुःख हो, यश प्राप्त हो अथवा परिणाममें अपयश हो, | अन्यकी क्या गणना! उसने तो मेरे कान काटकर मुझे लाभकी प्राप्ति हो अथवा हानि हो, इतना ही नहीं जीवन | लज्जित किया है ॥ ३६१/२ ॥ रहे अथवा मृत्यु ही हो जाय ॥ २९-३० ॥ | ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर दैत्यराज सिन्धुने हे कल्याणी! पहले मैंने उसके साथ सामनीतिका | अपने आभूषणों और वस्त्रोंको धारण किया। उसने बाजू- प्रयोग करके सन्धि नहीं की, फिर अब जो-जो भी होना | बन्द, मुकुट, रत्नजटित हार तथा कुण्डल धारण किये हो, वह अवश्य होकर ही रहे ॥ ३१॥ | और दो तरकस, तलवार, ढाल, प्रत्यंचासे समन्वित धनुष हे साध्वी! विधाताने जन्मसे पूर्व ही जिस-जिस | तथा छुरिका आदि शस्त्रोंको ग्रहण किया ॥ ३७-३८ ॥ प्राणीके विषयमें उचित अथवा अनुचित जो भी लिख | तदनन्तर अपनी पगड़ीमें लगे हुए सुनहले वस्त्रसे दिया है, कोई भी ऐसा सामर्थ्यवान् नहीं है, जो अपने | अपने दोनों कानोंको ढककर वह आया और एक श्रेष्ठ पुरुषार्थके बलपर उसे अन्यथा कर दे ॥ ३२ ॥ | भद्रासनपर बैठ गया ॥ ३९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दुर्गावाक्य' नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११७ ॥ ❖

एक सौ अठारहवाँ अध्याय कल तथा विकल नामक दैत्योंका चतुरंगिणी सेना लेकर युद्धके लिये प्रस्थान, देवसेनामेंसे सेना लेकर पुष्पदन्त तथा वृषका उन दोनोंके साथ भयंकर संग्राम, वीरभद्र और षडाननद्वारा दोनों दैत्योंका वध, दैत्य सैनिकोंद्वारा युद्धका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना

ब्रह्माजी बोले- युद्धके लिये अत्यन्त उग्र | अधीन बना लेनेवाले मेरे वे मैत्र तथा कौस्तुभ नामक आवेशवाला वह दैत्यराज सिन्धु एक उच्च आसनपर बैठ | दोनों प्रधान वीर मृत्युको प्राप्त हो गये हैं। अब उन गया। तदनन्तर वह वहाँ विराजमान प्रधान-प्रधान वीरोंसे | दोनोंके समान यहाँ कोई ऐसा वीर नहीं है, जो अपने बोला ॥ १ ॥ | बलसे शत्रुको मार डाले, उन दोनों मैत्र और कौस्तुभके सिन्धु बोला- तीनों लोकोंको अपने पराक्रमसे | समान न तो कोई बुद्धिमान् है, न पराक्रमी है और न