श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 557, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०११८] * कल-विकल दैत्योंका चतुरंगिणी सेना लेकर युद्धके लिये प्रस्थान * ५५५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] विजयका अभिलाषी ही है॥ २१/२॥ यह सुनकर वहाँ उपस्थित वीर (कल और विकल) उस सिन्धुसे बोले- हे दैत्यराज ! आप किसी प्रकारकी चिन्ता न करें। जबतक हम लोग जीवित हैं, तबतक इस उपस्थित एक छोटे-से कार्यके लिये आप इतने चिन्तित क्यों होते हैं ? ॥ ३-४॥ हे महाभाग ! आप पुष्पोंके विस्तरवाली शय्यापर निश्चिन्त होकर शयन करें। जिन हम दोनोंके द्वारा साक्षात् यमराजको भी पीड़ित किया गया है, उन्हें किससे भय हो सकता है- दैत्यराज सिन्धुसे इस प्रकार कहनेके अनन्तर उस दैत्यके कल तथा विकल नामवाले दो साले, जो अत्यन्त बलशाली तथा युद्धके लिये उन्मत्त थे, वे [युद्धके लिये] निकल पड़े ॥ ५-६॥ वे दोनों- कल और विकल विविध प्रकारके युद्धोंको करनेमें कुशल थे, विविध प्रकारके आयुधोंको धारण करनेवाले थे। अनेक प्रकारके वस्त्रों तथा आभूषणोंसे सुसज्जित थे और नाना प्रकारकी सेनाओंसे समन्वित थे। उन दोनोंने विविध प्रकारकी गर्जना करते हुए आकाशमण्डलको निनादित कर दिया था। वे दोनों करोड़ों देवताओंका हनन करनेमें समर्थ थे। उन दोनोंके पास असंख्य सेना थी ॥ ७-८॥ उन दोनों वीरोंके आगे-आगे बहुत-से वीर सैनिक चल रहे थे, जिनके मस्तक सिन्दूरके लेपनसे अरुण वर्णके थे, वे आग्नेय अस्त्र धारण किये हुए थे। उनके केशपाश खुले हुए थे तथा वे चन्दनका अनुलेप किये हुए थे। शस्त्रोंके धारण करनेसे वे सुशोभित हो रहे थे। वे सभी वीर यमराजको भी खा जानेके लिये उद्यत थे। उन वीर सैनिकोंके पीछे हाथियोंका समूह चल रहा था। वे हाथी गैरिक आदि विविध प्रकारकी धातुओंके अनुलेपनसे चित्रित थे ॥ ९-१०॥ वे हाथी नाना प्रकारके आभूषणोंसे सुशोभित थे, उनपर महावत बैठे हुए थे। उन हाथियोंके मस्तकपर सिन्दूर लगाया हुआ था। उनके दाँत अत्यन्त तीक्ष्ण थे।
[दायाँ स्तम्भ] वे घण्टाके नादसे निनादित थे ॥ ११॥ उन हाथियोंके पीछे घुड़सवार चल रहे थे। जो धारण किये हुए कवचोंसे सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने धनुष तथा बाण धारण किया हुआ था। वे सभी चमकीले शस्त्रोंसे विभूषित हो रहे थे ॥ १२॥ घुड़सवारोंके पीछे युद्धकी सामग्रीसे समन्वित अनेक प्रकारके रथ चल रहे थे। उनमें अनेक वीर बैठे हुए थे, उन रथोंपर सारथि विद्यमान थे। इस प्रकारकी सेनासे सुसज्जित होकर दैत्यराज सिन्धुके अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए कल तथा विकल नामक दो साले युद्धस्थलके लिये जा रहे थे। वहाँ उन्होंने विषधारी सर्पका भक्षण करनेवाले मयूरपर आरूढ़ मयूरेशको देखा ॥ १३-१४॥ वे कार्तिकेय आदि महान् वीरों तथा अन्य वीरोंसे घिरे हुए थे। उन दोनों-कल तथा विकलकी उस अत्यन्त भयंकर चतुरंगिणी सेनाको तथा अनेक प्रकारके विचित्र-विचित्र सैनिकोंसे समन्वित असंख्य सैनिकोंको आया हुआ देखकर उन श्रेष्ठ देवोंने नीतिशास्त्रमें पारंगत एक दूतको कल-विकलके पास भेजा। वह वहाँका सम्पूर्ण वृत्तान्त जानकर आया और उसने देवोंको वह सब समाचार सुनाया ॥ १५-१६१/२॥ दूत बोला-कल तथा विकल नामक दो दैत्य वीर विविध प्रकारकी सेनाओंको लेकर देवताओंपर विजय प्राप्त करनेके लिये आये हुए हैं, वे दोनों विविध प्रकारकी युद्धकलाओंमें अत्यन्त प्रवीण हैं ॥ १७१/२॥ ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर उन दोनोंसे युद्ध करनेके लिये पुष्पदन्त तथा वृष गये। उन दोनों देवोंने धनुषोंपर प्रत्यंचा चढ़ायी और साठ बाणोंके द्वारा उन दोनों दैत्योंपर प्रहार किया, किंतु उन दोनों दैत्योंने उन बाणोंको रोककर अपनी-अपनी बाणवृष्टिके द्वारा पुष्पदन्त तथा वृषको आच्छादित कर दिया। इसीके साथ ही वे अन्य देवसैनिकोंको भी बाणोंके आघातसे मारने लगे। [तब] उन महावृषने कलकी तलवारको अपनी तलवारसे काट डाला ॥ १८-२०॥
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