श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 558, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराणं- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पुष्पदन्तने सेनाको साथ लेकर शीघ्र ही विकलकी | रोष करते हुए अत्यन्त भीषण गर्जना की। उनकी तलवारको काटकर गिरा दिया और अपने बाणोंके द्वारा | गर्जनासे दसों दिशाएँ गूँज उठीं ॥ ३० ॥ उसके धनुषको भी काट डाला ॥ २१ ॥ | उन दोनोंने वृषभकी निन्दा की और कहा-हम तदनन्तर पुष्पदन्त और विकलमें परस्पर मल्लयुद्ध | दोनोंके सामने तुम क्यों युद्ध कर रहे हो, तुम तो घास होने लगा। दोनों ओरकी सेनाएँ भी एक-दूसरेपर | चरनेवालोंमें सामर्थ्य रखनेवाले हो, इस समय तुम हमारी विजय प्राप्त करनेकी इच्छासे अनेक प्रकारके शस्त्रों, | दृष्टिमें एक तिनकेके समान हो। ऐसा कह करके उन अस्त्रों तथा बाणोंके द्वारा और विविध प्रकारकी मायाके | दोनों महान् बलशाली कल-विकलने वृषभके दोनों द्वारा युद्ध करने लगीं। तब देवसेनाके द्वारा प्रयुक्त | सींगोंको पकड़ लिया और उन्हें खींचते हुए वे अपनी शस्त्रोंकी मारसे अत्यन्त दुखी दैत्योंकी सेना वहाँसे | चतुरंगिणी सेनाके मध्य ले गये ॥ ३१-३२॥ पलायित हो गयी ॥ २२-२३ ॥ | तदनन्तर उन वृषभको छुड़ानेके लिये अत्यन्त कुछ देवता भागते हुए उन दैत्यवीरोंके पीछे-पीछे | वेगपूर्वक सहसा पुष्पदन्त वहाँ जा पहुँचे, किंतु उस जाकर उनको मारने लगे। उन्होंने अपने पैरके आघातसे | विकलने अपने लातोंके प्रहारसे उन्हें जमीनपर गिरा दिया। कई दैत्य सैनिक वीरोंको मार डाला। मरे हुए वीरोंके | हर्षमें भरे हुए मनवाला वह विकल वाद्योंकी ध्वनिके साथ रक्तसे प्रवाहित होनेवाली अत्यन्त भयंकर नदी वहाँ बहने | नृत्य करने लगा। पुष्पदन्त मुहूर्तभर मूर्च्छित रहनेके लगी, जो कायरोंको भयभीत करनेवाली और भूतों तथा | अनन्तर स्वस्थ होकर चैतन्य हो गये ॥ ३३-३४॥ पक्षियोंको आनन्द देनेवाली थी ॥ २४-२५ ॥ | तदनन्तर युद्ध करनेके लिये वीरभद्र और षडानन तदनन्तर मदोन्मत्त वे दोनों कल तथा विकल | कार्तिकेय वहाँ आये। षडाननके द्वारा किये गये पर्वतके अत्यन्त वेगसे ऊपर उछले और वहाँसे बाणोंकी अत्यन्त | प्रहारसे दैत्य कल सौ टुकड़ोंमें विभक्त होकर भूमिपर भीषण वृष्टि करने लगे। उस बाणवृष्टिके द्वारा आहत | गिर पड़ा ॥ ३५ ॥ हुई देवसेना रक्त बहाती हुई वहाँ भाग उठी। तदनन्तर | वीरभद्रने अपनी हथेलीके प्रहारसे विकलको गिरा वृषने अपनी सींगोंद्वारा उन दोनों कल और विकलकी | डाला। स्कन्दके द्वारा एक बहुत बड़े पर्वतके प्रहारसे सेनाको बहुत मारा ॥ २६-२७ ॥ | दैत्य कलको मरा हुआ देखकर वे देवगण विजयी होकर उन दैत्यरक्षक वीरोंको उन्होंने शीघ्र ही अपने | अपने शिविरमें चले गये। शस्त्रोंकी मारसे घायल हुए लातोंके प्रहारसे मारा, कुछको अपनी फूत्कारके द्वारा | कुछ दैत्य सैनिक दैत्यराज सिन्धुकी नगरी गण्डकीपुरको गिरा डाला और कुछ वीरोंको अपनी पूँछकी मारसे मार- | चले गये ॥ ३६-३७ ॥ मारकर चूर-चूर कर डाला ॥ २८ ॥ | वहाँ उन्होंने दैत्यराज सिन्धुको यह समाचार इस प्रकार उन वृषने अनेक दैत्योंसे समन्वित | बताया कि वीरभद्र आदि प्रधान देवगणोंने रोष करते हुए दैत्यसेनाको मार डाला। उस समय वहाँ मरते हुए | विविध सेनाओंसे समन्वित कल तथा विकल दोनों दैत्योंका महान् हाहाकार होने लगा ॥ २९ ॥ | वीरोंको मार डाला है और वे देवगण विजयी होकर तब अत्यन्त बलवान् वीर कल तथा विकल दोनोंने | अपने शिविरमें चले गये हैं ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कल-विकलके वधका वर्णन' नामक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११८ ॥ ❖ Kalyana Visheshank 2021_Section_19_1_Back