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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 559, कुल 656 में से

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पृष्ठ 559

क्री०ख०-अ० ११९] * दैत्यराज सिन्धुका पराजित होकर चिन्ताग्रस्त होना * ५५७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय दैत्यराज सिन्धुका पराजित होकर चिन्ताग्रस्त होना, उसके दो पुत्रों धर्म तथा अधर्मका पिताको आश्वस्त करना तथा युद्धके लिये आज्ञा माँगना, सेना लेकर दोनोंका युद्धार्थ प्रस्थान, वीरभद्र, कार्तिकेय, हिरण्यगर्भ तथा भूतराजकी सेनाओंका दैत्यसेनाके साथ भीषण संग्राम, कार्तिकेयका धर्म एवं अधर्मका वध करना तथा सम्पूर्ण समाचार शिव-पार्वतीको निवेदित करना

ब्रह्माजी बोले—कार्तिकेयके द्वारा पर्वतके प्रहारसे महान् असुर कलको मारे जाने तथा वीरभद्रके द्वारा अपनी हथेलीकी मारसे विकलको मार दिये जानेसे—इस प्रकार अपने दोनों सालों कल तथा विकल, जो देवसेनाका विनाश करनेवाले थे, उनकी मृत्युका समाचार सुनकर भद्रासनपर बैठा हुआ तथा अनेक वीरोंसे घिरा हुआ दैत्यराज सिन्धु महान् चिन्ताको प्राप्त हो गया। उस समय वह भगवान् शिवके पुत्र मयूरेशके विषयमें सोचने लगा कि क्या यह देव मयूरेश इसी प्रकारसे देवताओंके द्वेषी सभी असुरोंका विनाश कर डालेगा? ॥ १–३॥ इस प्रकार चिन्ता करते-करते दैत्यराज सिन्धुको महान् मूर्च्छा छा गयी। उसी समय दैत्यराज सिन्धुके धर्म तथा अधर्म नामक दो पुत्र वहाँ आ पहुँचे, वे दोनों महान् बलशाली थे, वे भद्रासनपर बैठे हुए अपने पितासे इस प्रकारसे कहने लगे—हे पिताजी! पार्वतीके उस छोटे- से बालकसे आप क्यों भय खाते हैं? ॥ ४-५॥ हे दैत्येन्द्र! आप हम दोनोंको आज्ञा प्रदान करें, हम लोग क्षणभरमें ही उसे मार डालेंगे। उसके समक्ष युद्ध करते हुए मृत्युको प्राप्त हमारे दोनों वीर मामा— कल तथा विकल स्वर्गको प्राप्त हो गये हैं ॥ ६॥ विविध वीरोंसे संरक्षित अनेक प्रकारकी सेनाका विनाश करके वे दोनों वीर कल तथा विकल अपने स्वामीका कार्य करते हुए महान् यशको प्राप्त करके तर गये हैं। हम दोनों भी युद्ध करेंगे और शत्रुको बलपूर्वक मारकर या तो वापस लौट आयेंगे अथवा अगर युद्धमें उस मयूरेशके द्वारा मारे जायेंगे तो मोक्षको प्राप्त करेंगे ॥ ७-८॥ हम दोनों जबतक जीवित हैं, तबतक आप कोई चिन्ता न करें। इस समय इन्द्र आदि देवता आपके कारागारमें बन्द हैं, जब आपने उनपर विजय प्राप्त की, तब क्या आपके कोई पिता आदि आपके साथ थे, हम लोग आपके शत्रुका मस्तक काटकर आपके पास लायेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है। अन्यथा लोकमें हम कभी अपना मुख नहीं दिखलायेंगे ॥ ९–१०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—उन दोनों पुत्रों धर्म तथा अधर्मका इस प्रकारका वचन सुनकर दैत्यराज सिन्धुको बड़ा ही हर्ष प्राप्त हुआ। वह उन दोनोंसे बोला—तुम दोनों युद्ध करो और उत्तम यश प्राप्त करो। उस भयानक शत्रु मयूरेशको मारकर तुम लोग शीघ्र ही मेरे पास चले आओ ॥ ११-१२ ॥ दैत्यराजके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर युद्धकी लालसावाले वे दोनों धर्म तथा अधर्म पिताके चरणोंमें प्रणाम करके और माताका आशीर्वाद लेकर प्रत्येक दस-दस करोड़की सेनाके साथ शीघ्र ही निकल पड़े। वह चतुरंगिणी सेना रथ, घोड़े, हाथी और पैदल सैनिकोंसे समन्वित थी और वे सैनिक नाना प्रकारके शस्त्रोंको धारण किये हुए थे ॥ १३-१४॥ [सबसे आगे] सिन्दूर लगानेसे अरुणित वर्णके मस्तकवाले पैदल सैनिक प्रसन्नतापूर्वक जा रहे थे, उनके पीछे हाथी चल रहे थे, जो विविध प्रकारके पर्वतोंके समान थे, नाना प्रकारकी गैरिक आदि धातुओंसे चित्रित थे तथा नाना प्रकारके ध्वजोंसे सुशोभित थे ॥ १५ ॥ तदनन्तर अपने हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्रों तथा खड्गोंको धारण किये हुए अश्वारोही सैनिक अश्वोंपर आरूढ़ होकर चल रहे थे। वे मेघके समान गर्जनाके द्वारा दसों दिशाओंको गुंजायमान कर रहे थे ॥ १६ ॥ उस सेनाके मध्यमें वे दोनों धर्म तथा अधर्म नामक भाई सुशोभित हो रहे थे। वे अनेक प्रकारके अलंकारोंसे

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