श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 562, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- गयी थी, वह अपने शरीरकी भी सुध-बुध भूल गयी, वह अत्यन्त व्याकुल हो गयी और लज्जाका भी उसे भान नहीं रहा। वह उसी प्रकार गिरते-पड़ते राजसभाके प्रांगणमें पहुँची, जैसे कि कोई हठ करता हुआ बालक गिरता-पड़ता है। उसको देखकर उसके दुःखसे विवश हुए वे सभी सभामें बैठे हुए पुरुष भी रोने लगे। अपने नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई वह राजपत्नी दुर्गी उन सभासदोंसे कहने लगी ॥ १५-१६ १/२ ॥ रानी बोली- सभी वीरोंके उपस्थित रहनेपर भी मेरे उन दोनों सुकुमार पुत्रोंको बिना मुझसे पूछे ही क्यों युद्धभूमिमें प्रेषित कर दिया गया ? यदि मैं आशीर्वाद देकर उन्हें भेजती तो निश्चित ही उनकी मृत्यु नहीं होती ॥ १७-१८ ॥ मेरे वचनोंको विधाता भी मिथ्या करना नहीं चाहते। जिन मेरे पुत्रोंके द्वारा देवगणोंको भी जीत लिया गया था, फिर वे कैसे मृत्युको प्राप्त हुए? ॥ १९॥ मैं उन दोनोंको अब कब देखूँगी, जिन्होंने कि अपनी सुन्दरतासे कामदेवको भी जीत लिया था और जो बुद्धिके समुद्र थे, वे दोनों मुझे छोड़कर क्यों चले गये ? उन दोनोंकी शोकाग्निमें दग्ध होकर आज ही मैं मृत्युको प्राप्त हो जाऊँगी। इस प्रकारसे कहकर वह दैत्यपत्नी दुर्गी अपने हृदयको बार-बार पीटती हुई भूमिपर गिर पड़ी ॥ २०-२१॥ तदनन्तर सखियों तथा नगरनिवासी जनोंने उसे शीघ्र ही समझाया और कहा - हे माता ! शोक करनेसे कोई भी जो मृत्युको प्राप्त हो गया हो, लौटकर वापस नहीं आता है ॥ २२ ॥ इस मृत्युलोकमें चिरकालतक जीवित रहनेवाला न कोई देखा गया है और न ऐसे किसी व्यक्तिके विषयमें सुना ही गया है। हनुमान्, शरद्वानके पुत्र कृपाचार्य, बलि, व्यास, परशुराम, विभीषण तथा द्रोणाचार्यके पुत्र अश्वत्थामा- इन सात चिरजीवियोंको छोड़कर चिरकाल- तक जीवित रहनेवाला न कोई हुआ है और न कोई आगे होगा ही ॥ २३-२४॥ जब ब्रह्मा आदि देवताओंकी भी मृत्यु होती है, तो फिर हमलोगोंकी क्या गणना ! रुदन तो उसीको करना चाहिये, जो यह समझे कि मेरी मृत्यु नहीं होगी ॥ २५ ॥ यह निश्चित है कि ऋणका बन्धन छूट जानेपर स्त्री, पुत्र, पशु भी इस संसारमें स्थिर नहीं रहते, अतः शोक करना व्यर्थ है। जिस प्रकार जलप्रवाहमें बहते हुए दो काष्ठ कभी जुड़ जाते हैं, तो कभी अलग हो जाते हैं, वैसे ही [प्रारब्धके कारण] विवश हुआ प्राणी [दूसरे प्राणीके साथ] कभी संयोग तो कभी वियोग प्राप्त करता है। जिस प्रकार बहुत-से पक्षीगण रात्रिमें एक वृक्षका आश्रय लेते हैं और प्रातःकाल दसों दिशाओंमें उड़ जाते हैं, उसी प्रकार संसारमें जीवोंका संयोग और वियोग होता रहता है, इसमें दुःख एवं विलाप करनेकी क्या आवश्यकता ? * ॥ २६-२८ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे दुर्गीको [सखियों तथा नागरिकोंने] समझाया, इसके अनन्तर [सभासद्] जनोंसे समन्वित वह सिन्धु बलपूर्वक शोकको रोककर अपने आसनमें बैठ गया ॥ २९ ॥ उन्होंने विचार किया कि यदि हम रोते रहेंगे तो शत्रुजन हमारा उपहास करेंगे। उस दुर्गीको सहारा देकर लोग बलपूर्वक अन्तःपुरमें ले गये ॥ ३० ॥ शोकसे अत्यन्त व्याकुल वह दुर्गी दीर्घ निःश्वास लेती हुई पलंगपर गिर पड़ी। दैत्यराज सिन्धुने अत्यन्त क्रुद्ध होते हुए शस्त्रोंके समूहोंको धारण किया ॥ ३१ ॥
- मृत्युलोके चिरं स्थाता नेक्षितो न श्रुतोऽपि च। विहाय हनुमन्तं च कृपं शारद्वतं बलिम् ॥ व्यासं परशुरामं च विभीषणमथापि च। द्रौणिं नान्यश्चिरं स्थायी न भूतो न भविष्यति ॥ ब्रह्मादीनां भवेन्मृत्युः का तत्र गणनात्मनः। रोदनं तेन कर्तव्यं न स्यान्मृत्युः कदास्य चेत् ॥ क्षीणे ऋणानुबन्धे च स्त्री पुत्रः पशुरेव च । न तिष्ठति ध्रुवं तत्र कृतः शोको वृथा भवेत् ॥ यथा काष्ठं काष्ठगतं पूरे स्याच्च वियुज्यते। तद्वज्जन्तुर्वियोगं च योगं च प्राप्नुतेऽवशः ॥ नानापक्षिगणा रात्रावेकवृक्षगता यथा। प्रातर्दशदिशो यान्ति तत्र का परिदेवना ॥ (श्रीगणेशपु०, क्रीडाखण्ड १२० । २३-२८)