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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 563, कुल 656 में से

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पृष्ठ 563

क्री०ख०-अ० १२० ] * दूतोंका धर्म एवं अधर्मकी मृत्युका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना * ५६१ अपने दोनों पुत्रोंके वधका बदला लेनेके लिये वह अश्वपर आरूढ़ होकर युद्ध करने चल पड़ा। उसके प्रस्थान करते ही उसकी रणोन्मत्त विशाल चतुरंगिणी सेना भी निकल पड़ी। सबसे आगे पैदल सैनिक उछलते- उछलते हुए जा रहे थे। वे सभी नानावर्णके तथा समान स्वरूपवाले थे, उन्होंने अपने हाथोंमें विविध प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको धारण किया हुआ था॥ ३२-३३ ॥ पैदल सेनाके पीछे हाथियोंके झुण्ड चल रहे थे, वे गैरिक आदि अनेक धातुओंसे चित्रित किये गये थे, घण्टा तथा आभूषणोंसे सुसज्जित थे। उनके गण्डस्थलसे मदरूपी जलकी धारा प्रवाहित हो रही थी और वे चिंग्घाड़ रहे थे। वे हाथी अपनी चीत्कारसे शत्रुसेनाको भयभीत कर रहे थे और अत्यन्त भयंकर ध्वनि कर रहे थे। हाथियोंकी सेनाके अनन्तर घुड़सवारोंसहित घोड़े चल रहे थे। जो युद्धमें वायुके समान वेगवाले थे॥ ३४-३५ ॥ उन घोड़ोंके खुरोंके आघातसे भूतलपरसे अग्निकी चिनगारियाँ निकलकर गिर रही थीं। उन घोड़ोंके ऊपर हाथोंमें ढाल, भाले तथा खड्ग लिये हुए अश्वारोही सैनिक सुशोभित हो रहे थे। वे सैनिक शरीरमें चन्दन तथा अगरुका अनुलेप किये हुए थे। विविध प्रकारकी मालाओंसे विभूषित थे। सभीने शरीरकी रक्षा करनेवाले कवचको धारण कर रखा था और मस्तकपर मुकुट धारण करनेसे वे बहुत सुशोभित हो रहे थे॥ ३६-३७॥ वे मानो आकाशको निगलते हुए और दसों दिशाओंको निनादित करते हुए चल रहे थे। उस अश्वसेनाके पीछे रथ चल रहे थे, जिनपर महान् वीर योद्धा बैठे हुए थे॥ ३८ ॥ वे रथ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थे और उनमें धनुष एवं तरकस रखे हुए थे। उस सेनाके मध्यमें दैत्यराज सिन्धु सुशोभित हो रहा था, जो विशाल मुकुट तथा कुण्डलोंको धारण किये हुए था॥ ३९ ॥ वह अपने हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र तथा धनुषको लिये हुए था और कन्धेमें धारण किये तरकससे सुशोभित हो रहा था। वह युद्धोचित उत्तम कंकणोंकी शोभासे समन्वित तथा करधनी और बाजूबन्दसे शोभायमान था ॥ ४० ॥ क्रुद्ध होनेसे उसके नेत्र ऐसे लाल-लाल हो रहे थे मानो वह तीनों लोकोंको खा जाना चाहता हो। उस समय सभी प्रकारके वाद्योंके बजते हुए और बन्दीजनोंद्वारा स्तुतिगान होते हुए जब राजा सिन्धु बड़े वेगसे चल रहा था, तभी एक दूत वहाँ आकर दैत्यराजसे बोला- हे दैत्यराज ! हे सुव्रत ! आपके पिता आ रहे हैं, आप उनकी प्रतीक्षा करें ॥ ४१-४२॥ जब सिन्धुने पीछे मुड़कर देखा तो उसने अपने पिताको समीपमें आया देखा। वे अश्वपर आरूढ़ थे। सिन्धुने अपने पिताको प्रणाम किया और पिताने भी उसे आशीर्वाद प्रदान किया ॥ ४३ ॥ तदनन्तर [वात्सल्यवश] सेनाके मध्यमें पुत्रको सुरक्षित करके उसके पिताने उसे इस लोक तथा परलोकमें सुख प्राप्त करनेके लिये उपदेश प्रदान किया ॥ ४४ ॥ चक्रपाणि बोले- हे पुत्र ! तुम अभिमानके वशीभूत हो बर्ताव कर रहे हो, ऐश्वर्यके मदमें उन्मत्त होकर तुम भला-बुरा कुछ भी जान नहीं पा रहे हो। जो अपने कल्याणकी कामना रखता हो, उसे अपने कार्यकी सिद्धिके लिये वृद्धजनोंसे पूछना चाहिये। जो भविष्यमें अपने कल्याणकी कामना रखता हो, उसे चाहिये कि वह वर्तमानमें अशुभ कर्म न करे। थोड़ेसे भी अशुभ कर्मके द्वारा महान् पुण्य विनष्ट हो जाता है ॥ ४५-४६॥ हे पुत्र ! जिस प्रकार अग्निकी एक चिनगारीमात्र सब कुछ जला डालती है, उसी प्रकार थोड़ा-सा भी दोष सम्पूर्ण संचित पुण्यको विनष्ट कर डालता है। हे पुत्र ! देवताओंको बन्दी बनाये रखनेमें तुम्हारा कहीं भी कोई भी लाभ दिखायी नहीं देता है ॥ ४७ ॥ वही पुत्र सत्पुत्र कहलाता है, जो सदा ही माता- पिताकी आज्ञाका पालन करता है, उनकी आज्ञाका उल्लंघन करनेपर पुण्य विनष्ट हो जाता है और हे पुत्र ! वह अनेकों नरकोंको प्रदान करनेवाले पापसमूहों तथा मोहके पाशमें ग्रस्त हो जाता है। अतः हे पुत्र ! तुम मेरा यह कल्याणकारी वचन सुनो-तुम शीघ्र ही देवताओंको मुक्त कर दो ॥ ४८-४९॥