श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 564, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 देवताओंके बन्धनमुक्त हो जानेपर वह मयूरेश | हे तात! आप मूर्खोंकी भाँति बोल रहे हैं, अब तुम्हारा मित्र हो जायगा, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण | आप अपना मुख काला करके यहाँसे चले जायें। हे करनेवाला है। इस पृथ्वीपर द्वेष रखते हुए कोई भी | पिता! जिसने मेरी परार्ध संख्यावाली सेनाको मार डाला किसी प्रकार सुख नहीं प्राप्त कर सकता*। द्वेष रखनेके | है, उसके साथ अब मैं कैसे अपयश प्रदान करनेवाली कारण ही देवताओंके द्वारा हिरण्याक्ष आदि असुरोंका | सन्धि कर सकता हूँ? हाथमें कुश एवं अक्षमालाको विनाश हुआ॥ ५०१/२॥ | धारण करना क्षत्रियधर्ममें शोभित नहीं होता ॥ ५३-५४ ॥ ब्रह्माजी बोले-पिताके इस प्रकारके वचनोंको | इसी कारण राजाको चाहिये कि वह शत्रुओंके साथ सुनकर पुत्र सिन्धु अत्यधिक कुपित हो उठा और वह | दयाका बर्ताव न करे। नीतिमें बताया गया है कि युद्ध- अपने पिताको धिक्कारते हुए उनसे कहने लगा-मुझे | स्थलमें शत्रुके प्रति निर्दयतापूर्ण व्यवहार ही करना चाहिये। अभीतक यह भ्रम बना हुआ था कि मेरे पिता आप बहुत | ऐसा कहनेके अनन्तर दैत्यराज सिन्धुने पिताको प्रणाम चतुर हैं, किंतु इस समय आपका वह सब चातुर्य | किया और उन्हें बलपूर्वक वापस लौटाकर वह युद्धकी भलीभाँति प्रकट हो गया है ॥ ५१-५२ ॥ | अभिलाषासे युद्धके लिये निकल पड़ा ॥ ५५-५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'पिताके साथ सिन्धुदैत्यके संवादका वर्णन' नामक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२० ॥ एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय राक्षसराज सिन्धुकी सेनाके साथ कार्तिकेय, वीरभद्र आदि देववीरोंकी सेनाओंका भयंकर संग्राम, सिन्धुसेनाकी पराजय, दैत्यराज सिन्धुका स्वयं युद्धके लिये प्रस्थान, मयूरेशके परशुसे उत्पन्न कालपुरुषद्वारा दैत्य सैनिकोंका भक्षण किया जाना, चिन्तित होकर दैत्य सिन्धुका घरमें आकर छिपकर रहना ब्रह्माजी बोले-जब वीरभद्र आदि वीरोंके साथ | उठे और [युद्धहेतु] तैयार होकर उन्होंने उस सेनाको गणेश्वर सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए थे, उसी समय | देखा। तब उन्होंने उस सिन्धुको अपनेको मारनेके लिये भयभीत देवता हाँफते हुए बड़े वेगपूर्वक वहाँ आये ॥ १॥ | आया हुआ साक्षात् काल ही समझा ॥ २-३ ॥ उन्होंने गुणेश्वरको समाचार दिया कि युद्ध करनेके | तदनन्तर मयूरेशने अपने चारों हाथोंमें चार आयुधोंको लिये वह दैत्यराज सिन्धु अब स्वयं ही आ गया है। | धारण किया और वे बड़े ही आनन्दित होते हुए अपने सिन्धु (सागर)-के समान अपार सैन्य होनेके कारण | वाहन मयूरपर आरूढ़ हुए, उस समय उन्होंने भीषण उस दैत्यका 'सिन्धु' यह नाम [वास्तविक अर्थोंमें] | गर्जना की ॥ ४ ॥ प्रसिद्ध हुआ है। तब (यह समाचार पाकर) वे सभी वीर | वे मयूरेश भगवान् शिवको प्रणाम करके दसों
- चक्रपाणिरुवाच गर्वेण वर्तसे पुत्र श्रिया मत्तो न बुध्यसे। अर्थज्ञाने महावृद्धाः प्रष्टव्या भूतिमिच्छता ॥ अग्रे शुभेच्छया पूर्वमशुभं न समाचरेत्। अल्पेन कर्मणा नाशं पुण्यमेत्यशुभेन ह ॥ अगुरग्निर्दहेत्सर्वं पुण्यं दोषस्तथा सुत। न लाभो दृश्यते पुत्र बद्धेषु तेषु ते क्वचित् ॥ स एव पुत्रो यो मातृपितृवाक्यकरोऽनिशम्। तस्य चोल्लङ्घने पुण्यं नाशमेति च जायते ॥ दोषजालं मोहजालं नाना निरयदं सुत। अतः शृणु हितं वाक्यं मोचयाशु सुरान् सुत ॥ मुक्तेषु तु भवेन्मित्रं मयूरेशोऽखिलार्थदः। न चेह द्वेषतः कश्चित्सुखं प्राप्तो धरातले ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १२०। ४५-५०)