श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 565, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१२१] * राक्षसराज सिन्धुकी सेनाके साथ कार्तिकेय आदिका भयंकर संग्राम * ५६३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
दिशाओंको प्रकाशित करते हुए बड़े ही वेगपूर्वक निकल पड़े। उन्हें भगवान् शिवका आशीर्वादरूपी कवच प्राप्त था। वे वीरोंको साथ लेकर सेनासहित चल रहे थे ॥ ५ ॥ जब वे दैत्यराज सिन्धुको मारनेके लिये आगे जाने लगे तो उसी समय षडानन कार्तिकेयने उपस्थित होकर उनसे कहा—हे विघ्नराज! उस सिन्धुसे युद्ध करनेके लिये मैं जाता हूँ। बहुतसे वीरोंके रहते हुए आप क्यों युद्धके लिये जाते हैं ? पहले हम सभीका बल-पराक्रम देख लीजिये, फिर यदि हमारा पौरुष नष्ट हो जाय, तब आप युद्ध करें। ऐसा कहकर और उन मयूरेशको प्रणाम करके कार्तिकेय चतुरंगिणी सेना साथ लेकर युद्धके लिये निकल पड़े। फिर उन्होंने राक्षसराज सिन्धुकी सेनाका वध आरम्भ किया ॥ ६-८ ॥ उस सिन्धुने भी नाना प्रकारके शस्त्रों तथा बाणोंके जालसे उस देवसेनापर प्रहार किया। 'अरे ! आज सहन करो, मुझपर प्रहार करो, मैं तुम्हें मारता हूँ, आओ मेरे सम्मुख आओ' इस प्रकारसे उस युद्धमें युद्ध करनेवाले वीरोंका कोलाहल हो रहा था। कई वीर शस्त्रोंके द्वारा आहत हो गये थे, तो कई वीर बाणोंके समूहोंके प्रहारसे प्राणशून्य हो गये थे ॥ ९-१० ॥ तलवारों, भिन्दिपालों, भालों तथा मुद्गरोंके प्रहारसे कुछ वीरोंके अंग कट गये थे, कईके पैर कट गये थे, और किसी-किसीके बाहु, जाँघें और मस्तक कट चुके थे। शत्रुपक्षके युद्धोन्मत्त सैनिकोंको मारते हुए वे वीर उन्हीं सैनिकोंके समूहमें मिल जा रहे थे। उस समय वीरोंकी सिंहगर्जना, घोड़ोंकी हिनहिनाहटकी ध्वनि, हाथियोंके चिंघाड़ तथा रथोंके पहियोंकी धुरियों और वाद्योंकी ध्वनि-प्रतिध्वनियोंसे महान् कोलाहल हो रहा था। दोनों सेनाओंके बीच अनियन्त्रित युद्ध होने लगा ॥ ११-१३ ॥ वे वीर सैनिक अपनी-अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार दूसरे पक्षके वीरोंके मस्तक, मुख, नेत्रों, बाहुओं, उदर, नाभि, दोनों पैरों, दोनों गुल्फों तथा जानुओंपर आघात करने लगे। कोई वीर अपने हाथ, कोई पैरसे और कोई तलवारसे दूसरेको मार रहे थे। घनघोर अन्धकार छा जानेपर भी कोई-कोई वीर अपने शत्रुओंको तलवारके प्रहारसे मार रहे थे ॥ १४-१५ ॥ सूर्यके अस्त हो जानेपर वे वीर सैनिक एक- दूसरेको देखकर उससे भलीभाँति पूछकर, यदि वह शत्रुपक्षका होता तो उसे मार डाल रहे थे। असुर लोग जब यह जान ले रहे थे कि ये देवपक्षके हैं, तो उन्हें मार रहे थे और जब देवता लोग पहचान ले रहे थे कि ये असुरपक्षके हैं, तो उन्हें मार डाल रहे थे ॥ १६ ॥ उस भयंकर संग्राममें रक्तकी नदियाँ प्रवाहित होने लगीं, उनमें मृत सैनिक बह रहे थे। जिनमें कुछ प्राण शेष था, उनको दूसरे वीरोंने हुंकार करते हुए बलपूर्वक उस नदीसे बाहर निकाला और उनके शरीरोंमें लगे हुए बाणोंको निकाला। युद्धसन्नद्ध उन दोनों पक्षोंकी सेनाके सैनिकोंने पाँच दिनतक युद्ध करते हुए चिर विश्राम नहीं लिया ॥ १७-१८॥ इस प्रकारके उस युद्धमें देवताओंने दैत्यराज सिन्धुके करोड़ों पैदल सैनिकोंको मार डाला। इसके बाद उस दैत्य सिन्धुकी असंख्य मात्रामें शस्त्रोंसे सुसज्जित गजारोही सेना आयी। उन हाथियोंके ऊपर नाना प्रकारके युद्धकी कलाओंमें कुशल गजारोही वीर बैठे हुए थे। तब वीरभद्र आदि देवोंने कठिनाईसे जीती जा सकनेवाली दैत्य सिन्धुकी उस गजसेनाका संहार किया ॥ १९-२० ॥ उन वीरोंमेंसे किसीके मस्तक फट गये थे, तो किसीके हाथ और दाँत टूट गये थे। अग्निसम्बन्धी शस्त्रोंको धारण किये हुए कुछ देवोंने हाथियोंपर सवार वीरोंको गिरा डाला था ॥ २१ ॥ वीरभद्रने अत्यन्त बलपूर्वक एक हाथीको दूसरे हाथीसे टकरा डाला, उस आघातके कारण वे दोनों हाथी आठ टुकड़ोंमें होकर गिर पड़े ॥ २२ ॥ षडानन कार्तिकेय हाथियोंकी उस सेनाको मारते हुए अत्यन्त शोभा पा रहे थे। उन्होंने अपने छह धनुषोंसे छोड़े गये अनेकों बाणोंके द्वारा शक्तिपूर्वक दैत्य सिन्धुके वीर सैनिकोंसहित असंख्य मदोन्मत्त हाथियोंके समूहोंको मार गिराया। हिरण्यगर्भने भी अनेक वीरोंसे समन्वित उन हाथियोंको मार गिराया ॥ २३-२४ ॥ भूतराजने नाराचकी मारसे जीवित बचे हुए विविध