श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 566, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
प्रकारके उन हाथियोंको, जिनमें वीर दैत्य सैनिक बैठे हुए थे, अपने शस्त्रोंसे युद्धमें मार डाला ॥ २५ ॥ पुष्पदन्तने सिंहका रूप धारण करके उन हाथियोंको विदीर्ण कर डाला। नन्दीने तो स्वयं हाथीका रूप धारण करके उन बहुतसे हाथियोंको भग्न कर डाला ॥ २६ ॥ दूसरे देवगणोंने अपने बाणसमूहोंसे उन सभी हाथियोंको गिरा दिया। किसीने एक हाथीकी पूँछ पकड़कर घुमानेके अनन्तर दूसरे हाथीके ऊपर उसे फेंक दिया तो अत्यन्त सुदृढ़ आघातके कारण दोनों हाथी टकराकर चूर-चूर हो गये ॥ २७१/२ ॥ इस प्रकार हाथियोंकी सेनाके समाप्त हो जानेपर वे दैत्य वीर अश्वोंपर आरूढ़ होकर युद्ध करने लगे। उन्होंने उस युद्धमें उन असंख्य देवताओंको अपने आयुधोंके द्वारा मार गिराया, किंतु मूर्च्छित हुए वे देवता फिर सचेत हो गये ॥ २८-२९ ॥ तदनन्तर उन देवताओंने अत्यन्त क्रुद्ध होकर घोड़ोंपर आरूढ़ दैत्यवीरों तथा घोड़ोंको बाणोंसे विद्ध कर दिया। उधर घोड़ोंपर आरूढ़ उन महान् असुरोंने क्रोध करते हुए देवताओंपर प्रहार किया ॥ ३० ॥ उन्होंने अपने शस्त्रों, अस्त्रों तथा बाणोंकी वर्षासे उन देवताओंका अन्त कर डाला। तदनन्तर युद्धमें देवताओंके मारे जानेका समाचार सुनकर मयूरेशकी सेनाके छः वीर युद्धके लिये पुनः आये ॥ ३१ ॥ तब उन वीरोंने अश्वोंपर सवार उन दैत्योंपर पुनः प्रहार किया। उनमेंसे चार वीर चारों दिशाओंमें बड़ा भयंकर युद्ध करने लगे ॥ ३२ ॥ शेष बचे दो वीर देवगणोंसे समन्वित अपनी देवसेनाकी रक्षा करने लगे। देवसेनाके उन चारों वीरोंने अश्वों तथा अश्वोंपर सवार दैत्य वीरोंको मार गिराया ॥ ३३ ॥ उन्होंने पैदल चलकर ही शत्रुपक्षके बहुतसे वीरोंको मार डाला। बाणोंकी मारसे घायल करोड़ों करोड़की संख्यामें उस युद्धस्थलमें दैत्य सैनिक गिर पड़े ॥ ३४ ॥ नन्दी और भृंगीके द्वारा अश्वोंको मरा हुआ तथा घुड़सवार सैनिकोंको गिरा हुआ देखकर पुनः नन्दिकेश्वरने अपने पैरोंके आघातसे उनपर प्रहार किया ॥ ३५ ॥ वीरभद्रने भी असंख्य संख्यावाले उन अश्वारोही योद्धाओंको गिरा डाला। कार्तिकेय आदि चार वीरोंके द्वारा दैत्य सेनाके प्रधान-प्रधान योद्धाओंके मार दिये जानेपर अवशिष्ट असुरगण सभी दिशाओं-विदिशाओंमें भाग चले। तब वे कार्तिकेयादि चारों वीर असुरोंका पीछा करते हुए उनका संहार करने लगे। उस रणस्थलमें युद्धनिरत दैत्योंकी कल्पान्तकालीन प्रलय-जैसी स्थिति हो गयी। तदनन्तर कुछ दैत्य देवगणोंकी शरणमें चले गये ॥ ३६-३७ ॥ दैत्यसेनाके घुड़सवार सैनिकोंका वहाँ महान् कोलाहल होने लगा। इस प्रकारसे सम्पूर्ण दैत्यसेनाका वध करके कार्तिकेय आदि वे छः वीर अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त हुए। उस समय सभी प्रकारके वाद्य बजने लगे। सभी वीर विजय-गर्जना करते हुए उन प्रभु मयूरेशकी स्तुति करने लगे। वे कहने लगे-मयूरेशके प्रभावसे, उनका स्मरण करनेसे तथा उनको प्रणाम करनेसे हमें विजय प्राप्त हुई है ॥ ३८-३९ ॥ तदनन्तर दैत्यराज सिन्धुने अपनी शरणमें आये हुए सैनिकोंके मुखसे अपनी सेनाके वधका वृत्तान्त जानकर गजारोही, अश्वारोही तथा रथारोही वीरों, अमात्यों और अन्य सभी वीरोंसे अपनी युद्धकी लालसाको प्रकट करते हुए कहा ॥ ४०१/२ ॥ सिन्धु बोला-जो-जो भी योद्धा युद्धके लिये जाते हैं, उन्हें शत्रुपक्षके द्वारा मारे जानेका ही समाचार मैं अभीतक सुनता आया हूँ, अब इस समय मैं स्वयं ही बलपूर्वक उस गुणेशको मारनेके लिये जाता हूँ ॥ ४११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-ऐसा कहकर उसने अपनी गर्जनासे आकाश, दसों दिशाओं और तीनों लोकोंको इस प्रकार निनादित कर डाला, जैसे कि वह पृथ्वी तथा स्वर्ग- मण्डलको ग्रसनेके लिये जा रहा हो। तदनन्तर उसने धनुषमें बाणका संधान करके और कानतक उस धनुषकी प्रत्यंचा खींचकर बड़े ही वेगसे उस बाणको महान् बलशाली वीरभद्र आदि देवोंद्वारा संरक्षित देवसेनामें फेंका ॥ ४२-४३१/२ ॥ उस दैत्यराज सिन्धुने अस्त्रमन्त्रका सौ बार जप